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20 किमी से लंबे बड़े हाईवे प्रोजेक्ट में AI-MC अनिवार्य, NHAI का नया फैसला

NHAI ने 20 किलोमीटर से लंबी और ₹500 करोड़ से अधिक लागत वाली राजमार्ग परियोजनाओं में Automated and Intelligent Machine-Aided Construction तकनीक का इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया है।

20 किमी से लंबे बड़े हाईवे प्रोजेक्ट में AI-MC अनिवार्य, NHAI का नया फैसला
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: TOI

20 किमी से लंबे और ₹500 करोड़ से महंगे हाईवे प्रोजेक्ट में AI-MC अनिवार्य, NHAI ने बदले निर्माण नियम

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी NHAI ने बड़े हाईवे प्रोजेक्ट की गुणवत्ता और निगरानी बेहतर करने के लिए महत्वपूर्ण तकनीकी बदलाव किया है। नए निर्देश के तहत 20 किलोमीटर से लंबी और ₹500 करोड़ से अधिक लागत वाली राजमार्ग परियोजनाओं में Automated and Intelligent Machine-Aided Construction यानी AI-MC का इस्तेमाल अनिवार्य होगा।

ठेकेदारों को यह तकनीक केवल सड़क की अंतिम परत बिछाने के समय नहीं, बल्कि जमीन तैयार करने से लेकर आधारभूत परतों के निर्माण तक पूरे प्रोजेक्ट में लगातार इस्तेमाल करनी होगी।

इस फैसले का उद्देश्य राजमार्ग निर्माण में मानवीय त्रुटियों को कम करना, अलग-अलग हिस्सों में एक समान गुणवत्ता सुनिश्चित करना और निर्माण के प्रत्येक चरण का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना है।

किन परियोजनाओं पर लागू होगा नया नियम?

नया आदेश उन NHAI राजमार्ग परियोजनाओं पर लागू होगा जिनमें दोनों शर्तें पूरी होती हैं:

  • परियोजना की लंबाई 20 किलोमीटर से अधिक हो।

  • परियोजना की लागत ₹500 करोड़ से अधिक हो।

इन परियोजनाओं में AI-MC को पूरे निर्माण क्षेत्र में शुरू से अंत तक लागू करना होगा। इसका मतलब यह है कि ठेकेदार किसी सीमित हिस्से या केवल चुनिंदा निर्माण चरणों में तकनीक का प्रयोग करके अनिवार्यता पूरी नहीं कर पाएंगे।

तकनीक का इस्तेमाल तटबंध यानी एम्बैंकमेंट, कॉम्पैक्ट की गई मिट्टी की सबग्रेड परत और क्रश्ड स्टोन, रेत तथा बजरी से बनने वाली ग्रैन्युलर सब-बेस जैसी प्रमुख परतों में किया जाएगा।

AI-MC तकनीक क्या है?

नाम में “AI” होने के बावजूद यह व्यवस्था केवल किसी सॉफ्टवेयर या जेनेरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल पर निर्भर नहीं है। इसमें सड़क निर्माण की भारी मशीनों को सेंसर, GPS या अन्य पोजिशनिंग तकनीक, ऑन-बोर्ड कंप्यूटर और मशीन-कंट्रोल सिस्टम से जोड़ा जाता है।

इस व्यवस्था में मुख्य रूप से निम्न मशीनों का इस्तेमाल किया जा सकता है:

  • GPS से नियंत्रित मोटर ग्रेडर

  • इंटेलिजेंट कॉम्पैक्शन रोलर

  • स्ट्रिंगलेस पेवर

  • सेंसर और कंप्यूटर से लैस डोजर

  • मशीन-गाइडेड निर्माण उपकरण

डिजिटल डिजाइन और निर्धारित ऊंचाई, ढलान तथा मोटाई के आधार पर मशीनें अधिक सटीक तरीके से काम कर सकती हैं। इंटेलिजेंट कॉम्पैक्टर यह रिकॉर्ड कर सकता है कि मिट्टी या सड़क की परत पर कितनी बार रोलर चलाया गया और कॉम्पैक्शन निर्धारित स्तर तक पहुंचा या नहीं।

रियल-टाइम डेटा साझा करना होगा

नए निर्देश का महत्वपूर्ण हिस्सा रियल-टाइम डेटा शेयरिंग है। ठेकेदारों को निर्माण मशीनों से प्राप्त जानकारी NHAI अधिकारियों के लिए उपलब्ध करानी होगी।

इस डेटा से यह देखा जा सकेगा कि किस स्थान पर कौन-सी परत तैयार हुई, उसकी ऊंचाई और मोटाई क्या थी, कॉम्पैक्शन किस स्तर का रहा और काम निर्धारित डिजाइन के अनुसार किया गया या नहीं।

डिजिटल रिकॉर्ड होने से केवल अंतिम निरीक्षण पर निर्भरता कम हो सकती है। यदि किसी हिस्से में तकनीकी कमी सामने आती है, तो उसे अगली परत बिछने से पहले पहचाना और सुधारा जा सकता है। NHAI का उद्देश्य निर्माण की पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है।

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर हुआ था परीक्षण

AI-MC तकनीक को पहले लखनऊ-कानपुर ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे परियोजना में पायलट आधार पर इस्तेमाल किया गया था। वहां GPS आधारित मोटर ग्रेडर, इंटेलिजेंट कॉम्पैक्टर और स्ट्रिंगलेस पेवर जैसी मशीनें लगाई गई थीं।

सरकार ने इस तकनीक के संभावित लाभों में निर्माण समय की बचत, उत्पादकता में वृद्धि, वास्तविक समय की डिजिटल निगरानी और सतह को समान रूप से समतल तथा कॉम्पैक्ट बनाने की क्षमता गिनाई थी।

हालांकि, लखनऊ-कानपुर परियोजना में तकनीक का इस्तेमाल पूरे मार्ग और सभी निर्माण स्तरों पर नहीं किया गया था। नए आदेश में इसी सीमा को दूर करते हुए चयनित बड़ी परियोजनाओं में एंड-टू-एंड प्रयोग अनिवार्य किया गया है।

पारंपरिक गुणवत्ता जांच बंद नहीं होगी

AI-MC से मिलने वाला डिजिटल डेटा पारंपरिक गुणवत्ता परीक्षणों का विकल्प नहीं होगा। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की पूर्व नीति के अनुसार, कॉम्पैक्शन और दूसरी परतों के लिए निर्धारित भौतिक परीक्षण पहले की तरह जारी रहेंगे।

ठेकेदारों को मशीन से तैयार रिपोर्ट के साथ पारंपरिक गुणवत्ता नियंत्रण के परिणाम भी प्रस्तुत करने होंगे। तकनीक का उद्देश्य मौजूदा जांच व्यवस्था को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे अतिरिक्त डेटा और बेहतर निगरानी से मजबूत करना है।

यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि सेंसर या सॉफ्टवेयर में तकनीकी समस्या आने पर केवल डिजिटल रिकॉर्ड पर निर्भर रहना जोखिमपूर्ण हो सकता है।

यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता तथा समय से पहले होने वाले नुकसान को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। सड़क की निचली परतों में असमान मोटाई या अपर्याप्त कॉम्पैक्शन जैसी कमियां निर्माण के समय तुरंत दिखाई नहीं देतीं, लेकिन बाद में धंसाव, दरार और ऊबड़-खाबड़ सतह का कारण बन सकती हैं।

AI-MC प्रत्येक स्थान का डिजिटल निर्माण रिकॉर्ड तैयार कर सकती है। इससे यह निर्धारित करना आसान होगा कि काम अनुबंध और डिजाइन के अनुसार हुआ या नहीं।

प्राधिकरण के लिए यह तकनीक दूर से निगरानी और जवाबदेही का माध्यम बन सकती है। ठेकेदारों के लिए डिजिटल रिकॉर्ड यह प्रमाणित करने में मदद कर सकता है कि किसी हिस्से में निर्धारित प्रक्रिया और गुणवत्ता मानकों का पालन किया गया था।

ठेकेदारों के सामने क्या चुनौतियां होंगी?

तकनीक लागू करने के लिए ठेकेदारों को नई मशीनें खरीदनी या मौजूदा उपकरणों में सेंसर और मशीन-कंट्रोल सिस्टम लगाना पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त प्रशिक्षित ऑपरेटर, तकनीकी सहायता, सॉफ्टवेयर लाइसेंस, विश्वसनीय कनेक्टिविटी और डेटा प्रबंधन की आवश्यकता होगी।

छोटी और मध्यम निर्माण कंपनियों के लिए शुरुआती निवेश चुनौती बन सकता है। अलग-अलग निर्माताओं की मशीनों और सॉफ्टवेयर के बीच डेटा का एक समान प्रारूप बनाए रखना भी जरूरी होगा।

उद्योग के कुछ प्रतिनिधियों ने रियल-टाइम डेटा साझा करने को लेकर ठेकेदारों की हिचकिचाहट का उल्लेख किया है। उनका तर्क है कि तकनीक तभी प्रभावी होगी जब इसका उपयोग लगातार हो और डेटा वास्तव में NHAI तक पहुंचे। टुकड़ों में लागू की गई व्यवस्था से अपेक्षित गुणवत्ता सुधार हासिल करना मुश्किल होगा।

डेटा की विश्वसनीयता भी होगी महत्वपूर्ण

केवल डिजिटल डेटा उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं होगा। सेंसरों की नियमित कैलिब्रेशन, मशीनों की सही सेटिंग और डेटा में बदलाव रोकने वाली सुरक्षा व्यवस्था भी जरूरी होगी।

यदि कोई सेंसर गलत जानकारी दर्ज करता है या मशीन ऑपरेटर सही तकनीकी प्रक्रिया का पालन नहीं करता, तो डिजिटल रिकॉर्ड होने के बावजूद निर्माण में कमी रह सकती है। इसलिए स्वतंत्र निरीक्षण, प्रयोगशाला परीक्षण और मौके पर इंजीनियरों की निगरानी की भूमिका बनी रहेगी।

संतुलित विश्लेषण

NHAI का फैसला भारतीय सड़क निर्माण को अनुभव और मैनुअल निरीक्षण पर आधारित प्रणाली से डेटा-संचालित व्यवस्था की ओर ले जा सकता है। इससे निर्माण की सटीकता, एकरूपता और पारदर्शिता बढ़ने की संभावना है।

लेकिन तकनीक अपने आप बेहतर सड़क की गारंटी नहीं देती। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि मशीनों का इस्तेमाल कितनी गंभीरता से किया जाता है, डेटा कितना विश्वसनीय है और गुणवत्ता में कमी मिलने पर प्राधिकरण कितनी तेजी से कार्रवाई करता है।

शुरुआती चरण में उपकरण और प्रशिक्षण की लागत बढ़ सकती है। दूसरी ओर, यदि तकनीक दोबारा काम करने की जरूरत, सामग्री की बर्बादी और समय से पहले होने वाली मरम्मत को कम करती है, तो लंबी अवधि में परियोजनाओं की लागत और रखरखाव का बोझ घट सकता है। फिलहाल ऐसे संभावित लाभों की वास्तविक मात्रा बड़े स्तर पर लागू होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

निष्कर्ष

बड़ी हाईवे परियोजनाओं में AI-MC को अनिवार्य करना NHAI की निर्माण निगरानी व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव है। अब परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल तैयार सड़क देखकर नहीं, बल्कि निर्माण के दौरान मशीनों से रिकॉर्ड किए गए वास्तविक समय के डेटा के आधार पर भी किया जा सकेगा।

यदि आदेश को पूरे प्रोजेक्ट में समान रूप से लागू किया गया और पारंपरिक गुणवत्ता परीक्षणों के साथ जोड़ा गया, तो यह भारत में अधिक टिकाऊ, सुरक्षित और जवाबदेह राजमार्ग निर्माण की दिशा में मजबूत कदम साबित हो सकता है।

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