पोप लियो XIV ने शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 को वेटिकन में आयोजित एक विशेष बैठक को संबोधित करते हुए यह बात कही। इस बैठक का विषय था- 'द फ्यूचर ऑफ AI: ए डायलॉग बिटवीन द वेटिकन एंड द साइंटिफिक वर्ल्ड ऑन द डेवलपमेंट्स एंड एप्लिकेशन्स ऑफ इंटेलिजेंट टेक्नोलॉजीज'। इसका आयोजन पोंटिफिकल एकेडमी फॉर लाइफ और फ्यूचर ऑफ लाइफ इंस्टीट्यूट ने संयुक्त रूप से किया था। इसमें अलग-अलग देशों से आए AI विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने हिस्सा लिया।
AI के लिए साझा अंतरराष्ट्रीय मानकों की जरूरत
अपने संबोधन में पोप ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल को लेकर दुनिया के सामने कई नैतिक सवाल हैं। इन सवालों के जवाब देने के लिए केवल सिद्धांतों और घोषणाओं से काम नहीं चलेगा। ऐसे संस्थानों की जरूरत है, जो इन सिद्धांतों को व्यवहार में लागू कर सकें और यह सुनिश्चित करें कि AI का विकास पूरी मानवता के हित में हो।
उन्होंने तीन महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं पर जोर दिया- साझा अंतरराष्ट्रीय मानक, स्वतंत्र निगरानी और जवाबदेही तय करने के स्पष्ट तरीके। पोप के मुताबिक, AI से जुड़े फैसलों की जांच की जा सके, जरूरत पड़ने पर उन्हें चुनौती दी जा सके और तकनीक के कारण किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचने पर उसे उचित राहत मिलनी चाहिए।
उनका मानना है कि AI से जुड़े नियम किसी एक देश या कंपनी तक सीमित नहीं रहने चाहिए। तकनीक की सीमाएं राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़ चुकी हैं, इसलिए इसके सुरक्षित और जिम्मेदार इस्तेमाल के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी जरूरी है।
मशीनें इंसान नहीं, केवल एक उपकरण हैं
पोप लियो XIV ने AI को लेकर एक और महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि मशीनों को इंसान या व्यक्ति के समान नहीं माना जाना चाहिए। उनके अनुसार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक उपकरण है, जो इंसानों द्वारा बनाया और इस्तेमाल किया जाता है। मशीनों के पास इंसानों की तरह शरीर, भावनाएं, अनुभव और रिश्तों को समझने की क्षमता नहीं होती।
उन्होंने AI सिस्टम को कानूनी व्यक्ति का दर्जा देने या उन्हें अलग अधिकार देने के प्रस्तावों पर भी चिंता जताई। पोप के मुताबिक, ऐसा करने से मशीनों के फैसलों के लिए इंसानी जिम्मेदारी धुंधली हो सकती है। अगर किसी AI सिस्टम के कारण किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचता है, तो जवाबदेही उसके निर्माता, संचालक या इस्तेमाल करने वाले लोगों और संस्थाओं की तय होनी चाहिए।
यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब AI का इस्तेमाल केवल सवालों के जवाब देने या तस्वीरें बनाने तक सीमित नहीं है। कई क्षेत्रों में AI आधारित एजेंट और स्वचालित सिस्टम ऐसे काम करने लगे हैं, जिनमें फैसले लेने और कार्रवाई करने की क्षमता शामिल है।
इंसानी जीवन से जुड़े फैसले AI के हवाले न हों
अपने भाषण में पोप ने कहा कि कुछ फैसले ऐसे होते हैं, जिन्हें कभी भी पूरी तरह मशीनों के हवाले नहीं किया जाना चाहिए। इनमें मानव जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और बल प्रयोग से जुड़े फैसले शामिल हैं।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम किसी टारगेट लिस्ट में शामिल किया जाता है या उसे सीमा नियंत्रण से जुड़े डेटाबेस में दर्ज किया जाता है, तो इस बात का खतरा रहता है कि उसे एक इंसान के बजाय केवल आंकड़ों के रूप में देखा जाए। ऐसे मामलों में जिम्मेदार इंसानी निगरानी बेहद जरूरी है।
पोप ने घातक स्वायत्त हथियारों यानी ऐसे हथियारों के इस्तेमाल पर भी चिंता जताई, जो इंसानी हस्तक्षेप के बिना लक्ष्य चुनकर हमला कर सकते हैं। उन्होंने नवंबर में जिनेवा में होने वाली बैठक में शामिल देशों से ऐसे हथियारों पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में ठोस कदम उठाने की अपील की।
AI का फायदा कुछ कंपनियों तक सीमित न रहे
पोप लियो XIV ने कहा कि AI और दूसरी आधुनिक तकनीकों का उद्देश्य केवल मुनाफा कमाना या कुछ बड़ी कंपनियों और ताकतवर लोगों को फायदा पहुंचाना नहीं होना चाहिए। इनका इस्तेमाल समाज के व्यापक हित, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, ज्ञान और समान अवसरों को बढ़ावा देने के लिए होना चाहिए।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि तकनीकी विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचना चाहिए, खासकर उन लोगों तक जो आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर हैं। अगर AI का फायदा केवल चुनिंदा लोगों तक सीमित रह जाता है, तो इससे समाज में असमानता और बढ़ सकती है।
पोप ने यह भी कहा कि AI का भविष्य पहले से तय नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि इंसान आज इसके विकास और इस्तेमाल को लेकर कौन-से फैसले लेते हैं। इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि AI क्या कर सकता है, बल्कि यह भी होना चाहिए कि उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जाना चाहिए।
AI पर पहले भी चिंता जता चुके हैं पोप
पोप लियो XIV ने इससे पहले भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नैतिक और सामाजिक प्रभावों पर चिंता जताई है। 25 मई 2026 को प्रकाशित उनके पहले एनसाइक्लिकल यानी पोप के औपचारिक धार्मिक-सामाजिक दस्तावेज 'मैग्निफिका ह्यूमनिटास' में भी AI के दौर में मानव गरिमा की रक्षा पर जोर दिया गया था।
इस दस्तावेज में उन्होंने कहा था कि तकनीक का विकास मानवता की सेवा के लिए होना चाहिए, न कि इंसानों को तकनीक के नियंत्रण में लाने के लिए। उन्होंने रोजगार, सामाजिक न्याय, निजता, डिजिटल असमानता और AI के बढ़ते प्रभाव जैसे मुद्दों पर भी ध्यान दिलाया था।
दुनिया के सामने बढ़ती चुनौती
AI का इस्तेमाल स्वास्थ्य, शिक्षा, बैंकिंग, सरकारी सेवाओं, सुरक्षा और संचार जैसे क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहा है। इससे कामकाज आसान होने के साथ नई संभावनाएं भी खुल रही हैं। हालांकि, गलत जानकारी, भेदभावपूर्ण एल्गोरिदम, निजी डेटा के दुरुपयोग और स्वचालित हथियारों जैसे मुद्दे चिंता बढ़ा रहे हैं।
पोप लियो XIV का ताजा संदेश इसी व्यापक बहस का हिस्सा है। उन्होंने साफ किया कि AI के विकास को रोकना उद्देश्य नहीं है, बल्कि इसे इस तरह आगे बढ़ाना जरूरी है कि इंसानी गरिमा, स्वतंत्रता और सुरक्षा प्रभावित न हो।
उनकी मांग है कि दुनिया के देश, वैज्ञानिक, तकनीकी कंपनियां और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं मिलकर ऐसे नियम बनाएं, जिनसे AI के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इन सुझावों को नीतियों और ठोस नियमों में बदलने के लिए क्या कदम उठाता है।
