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TRAI की AI पर नई पहल: टेलीकॉम कंपनियों के लिए बन सकती हैं सख्त जवाबदेही और निगरानी की व्यवस्था ।

भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। टेलीकॉम कंपनियां नेटवर्क संचालन, ग्राहकों की पहचान, धोखाधड़ी रोकने और सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए AI आधारित तकनीक अपना रही हैं। लेकिन इस तकनीक के बढ़ते उपयोग के साथ डेटा सुरक्षा, गलत फैसलों और नेटवर्क की विश्वसनीयता से जुड़े जोखिम भी सामने आ रहे हैं। इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने टेलीकॉम सेक्टर में AI के जिम्मेदार इस्तेमाल के लिए नई ड्राफ्ट गाइडलाइंस पेश की हैं।

TRAI की AI पर नई पहल: टेलीकॉम कंपनियों के लिए बन सकती हैं सख्त जवाबदेही और निगरानी की व्यवस्था ।
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द्वारा साधना गुप्ता

स्रोत: TRAI, PIB, business standard, the tribune

टेलीकॉम कंपनियों को बनानी होगी AI नीति

TRAI के प्रस्ताव के अनुसार, AI का इस्तेमाल करने वाली टेलीकॉम कंपनियों और संबंधित अधिकृत संस्थाओं को अपनी आंतरिक AI नीति तैयार करनी होगी। इस नीति को कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स या संबंधित उच्चस्तरीय प्रशासनिक निकाय से मंजूरी दिलाना प्रस्तावित है।

इस नीति में कई महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल करना होगा। इनमें AI सिस्टम के जोखिम का आकलन, नई तकनीक को लागू करने की मंजूरी, डेटा प्रबंधन, सुरक्षा उपाय, मानवीय निगरानी और ग्राहकों की शिकायतों के समाधान की व्यवस्था शामिल है।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कंपनियां केवल तकनीक लागू करके अपनी जिम्मेदारी से पीछे न हटें, बल्कि उसके इस्तेमाल से होने वाले प्रभावों पर भी नजर रखें।

AI सिस्टम को तीन जोखिम श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव

ड्राफ्ट गाइडलाइंस का एक प्रमुख हिस्सा AI सिस्टम का जोखिम के आधार पर वर्गीकरण करना है। TRAI ने AI सिस्टम को तीन श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव दिया है:

  1. हाई रिस्क: ऐसे AI सिस्टम जिनका नेटवर्क संचालन, ग्राहकों या महत्वपूर्ण सेवाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

  2. मीडियम रिस्क: ऐसे सिस्टम जिनसे परिचालन या वित्तीय स्तर पर प्रभाव पड़ने की आशंका हो सकती है।

  3. लो रिस्क: ऐसे AI सिस्टम जिनका संभावित प्रभाव तुलनात्मक रूप से कम हो।

जोखिम का आकलन करते समय यह देखा जाएगा कि संबंधित AI सिस्टम नेटवर्क के संचालन, वित्तीय और परिचालन नतीजों तथा उपभोक्ताओं को किस स्तर तक प्रभावित कर सकता है। इस वर्गीकरण से कंपनियों को हर AI सिस्टम के लिए उचित सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था तय करने में मदद मिलेगी।

गंभीर AI गड़बड़ियों की जानकारी TRAI को देनी होगी

AI तकनीक में तकनीकी खराबी, गलत परिणाम या साइबर हमले जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। टेलीकॉम सेक्टर में ऐसी घटनाओं का असर केवल किसी एक ग्राहक तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बड़े नेटवर्क और जरूरी सेवाओं को भी प्रभावित कर सकता है।

इसी को ध्यान में रखते हुए TRAI ने AI से जुड़ी घटनाओं को चार स्तरों में बांटने का प्रस्ताव रखा है- क्रिटिकल, हाई, मॉडरेट और लो।

मसौदे के मुताबिक, क्रिटिकल और हाई-सीवेरिटी वाली घटनाओं की जानकारी नियामक को निर्धारित प्रारूप, तरीके और समयसीमा के भीतर देनी होगी। इससे गंभीर समस्याओं की पहचान और उनके समाधान की प्रक्रिया को मजबूत बनाने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, प्रस्ताव में इन घटनाओं की रिपोर्टिंग से जुड़े विस्तृत मानदंड और समयसीमा को लेकर आगे स्पष्टता की जरूरत है।

AI सिस्टम पर इंसानी निगरानी भी जरूरी

TRAI ने प्रस्तावित किया है कि कंपनियां अपने AI सिस्टम को पूरी तरह स्वचालित तरीके से बिना उचित निगरानी के न चलाएं। जोखिम कम करने के लिए एक तय व्यवस्था के तहत मानवीय निगरानी जरूरी होगी।

इसके अलावा, कंपनियों को AI Governance and Safety Committee (AGSC) जैसी विशेष समिति गठित करनी होगी। यह समिति AI सिस्टम के इस्तेमाल, संभावित जोखिमों और सुरक्षा से जुड़े मामलों पर नजर रखने का काम करेगी।

कंपनियों को अपने सभी AI सिस्टम का एक अपडेटेड रिकॉर्ड भी रखना होगा। इसमें सक्रिय, निष्क्रिय और इस्तेमाल से हटाए जा चुके सिस्टम की जानकारी, उनके स्रोत, उद्देश्य और जोखिम श्रेणी का विवरण शामिल होगा। प्रस्ताव के अनुसार, किसी AI सिस्टम को इस्तेमाल करने से पहले उसे इस सूची में दर्ज करना जरूरी होगा।

थर्ड पार्टी AI इस्तेमाल करने पर भी कंपनी की जिम्मेदारी

आज कई कंपनियां अपनी जरूरत के अनुसार बाहरी टेक्नोलॉजी कंपनियों से AI सिस्टम खरीदती हैं या उनकी सेवाएं लेती हैं। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि अगर किसी बाहरी कंपनी के AI सिस्टम से नुकसान होता है, तो जवाबदेही किसकी होगी?

TRAI के प्रस्ताव में इस मुद्दे को स्पष्ट करने की कोशिश की गई है। मसौदे के अनुसार, टेलीकॉम सेवा देने वाली संबंधित संस्था AI सिस्टम के नतीजों के लिए जिम्मेदार होगी, चाहे वह सिस्टम खुद विकसित किया गया हो या किसी तीसरे पक्ष से खरीदा अथवा आउटसोर्स किया गया हो।

इसका मतलब है कि कंपनियां केवल यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकेंगी कि AI तकनीक किसी बाहरी वेंडर ने तैयार की थी।

ग्राहकों की सुरक्षा और शिकायतों पर भी ध्यान

AI का इस्तेमाल ग्राहकों की पहचान, सेवाओं के प्रबंधन और धोखाधड़ी रोकने जैसे कामों में किया जा रहा है। ऐसे में गलत डेटा, पक्षपातपूर्ण परिणाम या तकनीकी गड़बड़ी का सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।

प्रस्तावित नीति में डेटा गवर्नेंस और उपभोक्ता शिकायतों के समाधान को भी शामिल किया गया है। कंपनियों को AI से जुड़ी घटनाओं और उपभोक्ताओं को हुए संभावित नुकसान की शिकायतों का रिकॉर्ड रखने तथा उनकी जांच और समाधान के लिए व्यवस्था विकसित करनी होगी।

अभी लागू नहीं हुई हैं नई गाइडलाइंस

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि TRAI ने फिलहाल अंतिम नियम लागू नहीं किए हैं। 30 अक्टूबर को जारी दस्तावेज एक ड्राफ्ट है, जिस पर उद्योग से जुड़े पक्षों की राय मांगी गई है। सुझाव मिलने और परामर्श प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही आगे की नियामक कार्रवाई तय होगी।

भारत सरकार ने फरवरी 2026 में India AI Governance Guidelines जारी की थीं। इन्हीं व्यापक सिद्धांतों के अनुरूप टेलीकॉम क्षेत्र के लिए अलग दिशा-निर्देश तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। सरकार की इस पहल में भरोसा, मानव-केंद्रित विकास, निष्पक्षता, जवाबदेही और सुरक्षा जैसे सिद्धांतों पर जोर दिया गया है।

टेलीकॉम सेक्टर में AI के भविष्य के लिए अहम कदम

TRAI की यह पहल ऐसे समय आई है जब भारत का डिजिटल नेटवर्क अर्थव्यवस्था, कारोबार, सरकारी सेवाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। AI से नेटवर्क की क्षमता और सेवाओं की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है, लेकिन इसके गलत इस्तेमाल से बड़े स्तर पर परेशानी भी पैदा हो सकती है।

प्रस्तावित गाइडलाइंस का असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम नियम किस रूप में सामने आते हैं और कंपनियां उन्हें कितनी प्रभावी तरीके से लागू करती हैं। फिलहाल 27 नवंबर 2026 तक मिलने वाले सुझाव इस प्रक्रिया का अगला महत्वपूर्ण चरण होंगे।

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