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बॉलीवुड

गांधी जयंती 2026: नीरज काबी ने फिल्मों में बढ़ती हिंसा पर जताई चिंता, बोले—गांधीवादी सोच आज भी जरूरी

गांधी जयंती के अवसर पर अभिनेता नीरज काबी ने भारतीय फिल्मों में हिंसा के बढ़ते चित्रण पर चिंता जताई है। पर्दे पर दो बार महात्मा गांधी की भूमिका निभा चुके काबी का मानना है कि अहिंसा और गांधीवादी विचार आज के दौर में भी प्रासंगिक हैं। उनका यह बयान सिनेमा में हिंसा, दर्शकों की पसंद और कलाकारों की जिम्मेदारी पर व्यापक चर्चा को सामने लाता है।

गांधी जयंती 2026: नीरज काबी ने फिल्मों में बढ़ती हिंसा पर जताई चिंता, बोले—गांधीवादी सोच आज भी जरूरी
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: Hindustan Times interview with actor Neeraj Kabi.

गांधी जयंती पर नीरज काबी ने उठाया सिनेमा में हिंसा का मुद्दा

भारतीय सिनेमा में एक्शन और हिंसा के बढ़ते इस्तेमाल के बीच अभिनेता नीरज काबी ने गांधी जयंती पर महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत की प्रासंगिकता पर बात की है।

Hindustan Times से बातचीत में काबी ने कहा कि गांधी के विचार केवल इतिहास तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी महत्वपूर्ण बने रहेंगे। उन्होंने मौजूदा दौर में फिल्मों में दिखाई जा रही हिंसा को लेकर चिंता जताते हुए गांधीवाद को इसके विपरीत एक वैचारिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया।

‘हिंसा एक ड्रग की तरह, गांधीवाद उसका antidote’

काबी ने इंटरव्यू में फिल्मों में हिंसा की ओर बढ़ते आकर्षण को गंभीर मुद्दा बताया। उनका तर्क है कि जब दर्शक लगातार हिंसक सामग्री देखते हैं, तो ऐसी सामग्री की मांग और अधिक बढ़ सकती है।

इसी संदर्भ में उन्होंने हिंसा की तुलना एक तरह की “drug” से और गांधीवाद को उसके “antidote” के रूप में पेश किया। यह उनकी व्यक्तिगत व्याख्या है, न कि भारतीय फिल्मों या दर्शकों पर किसी वैज्ञानिक अध्ययन का निष्कर्ष।

पर्दे पर दो बार निभा चुके हैं महात्मा गांधी

गांधी के विचारों पर काबी की टिप्पणी उनके अभिनय अनुभव से भी जुड़ी है। उन्होंने एक दशक से अधिक समय पहले टेलीविजन सीरीज Samvidhaan में महात्मा गांधी की भूमिका निभाई थी और अपने करियर में दो बार गांधी का किरदार निभा चुके हैं।

किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को पर्दे पर निभाने के लिए अभिनेता को उसके विचार, सार्वजनिक जीवन और उस समय के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ को समझना पड़ता है। काबी के लिए गांधी की भूमिका निभाने का अनुभव उनके विचारों को करीब से समझने का माध्यम भी रहा।

क्या आज भी प्रासंगिक है गांधी का अहिंसा का सिद्धांत?

काबी का मानना है कि गांधी की प्रासंगिकता किसी एक दौर तक सीमित नहीं हो सकती। गांधी जयंती हर साल 2 अक्टूबर को मनाई जाती है और 2026 उनकी 157वीं जयंती है। संयुक्त राष्ट्र ने भी 2 अक्टूबर को International Day of Non-Violence घोषित किया हुआ है।

गांधी के राजनीतिक और सामाजिक दर्शन में अहिंसा के साथ सत्याग्रह का विशेष स्थान था। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उन्होंने कई आंदोलनों में अहिंसक प्रतिरोध को राजनीतिक रणनीति के रूप में इस्तेमाल किया।

सिनेमा में हिंसा पर बहस क्यों महत्वपूर्ण है?

काबी की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब फिल्मों में हिंसा का स्तर और उसकी प्रस्तुति लगातार सांस्कृतिक बहस का विषय बनी हुई है। हालांकि, किसी फिल्म में हिंसा का होना अपने आप में उसके समर्थन के समान नहीं है। युद्ध, अपराध, सामाजिक संघर्ष या ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित कहानियों में हिंसा कथानक का हिस्सा भी हो सकती है।

इसलिए इस बहस के दो पहलू हैं। एक ओर कलाकारों को अपनी कहानी कहने की रचनात्मक स्वतंत्रता है; दूसरी ओर यह चर्चा भी बनी रहती है कि अत्यधिक या आकर्षक ढंग से प्रस्तुत हिंसा का दर्शकों और लोकप्रिय संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।

काबी की टिप्पणी इस व्यापक बहस में एक कलाकार का दृष्टिकोण है। इसे पूरे फिल्म उद्योग या दर्शकों की सोच के प्रतिनिधि निष्कर्ष के बजाय उनकी व्यक्तिगत राय के रूप में समझना जरूरी है।

गांधीवादी विचार और आधुनिक मनोरंजन

आज के मनोरंजन उद्योग में दर्शकों के पास एक्शन, कॉमेडी, रोमांस, सामाजिक ड्रामा और थ्रिलर सहित कई तरह की सामग्री उपलब्ध है। ऐसे में गांधीवाद को सीधे किसी विशेष फिल्म शैली के मुकाबले खड़ा करने के बजाय काबी की टिप्पणी को हिंसा के विकल्प के रूप में संवाद, सह-अस्तित्व और अहिंसा पर जोर देने वाली सोच के रूप में देखा जा सकता है।

उनका संदेश गांधी जयंती पर इस पुराने लेकिन लगातार प्रासंगिक प्रश्न को फिर सामने लाता है—क्या लोकप्रिय संस्कृति केवल समाज को प्रतिबिंबित करती है, या वह समाज के व्यवहार और मूल्यों को आकार देने में भी भूमिका निभाती है?

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