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‘जवान-पठान को पैन-इंडिया नहीं कहते, फिर हमारी फिल्मों को क्यों?’ नानी ने उठाया बड़ा सवाल

अपनी नई फिल्म ‘द पैराडाइज’ की रिलीज से पहले अभिनेता नानी ने ‘पैन-इंडिया’ शब्द पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि कई भाषाओं में सफल हिंदी फिल्मों को आम तौर पर हिंदी फिल्म ही कहा जाता है, जबकि दक्षिण भारतीय फिल्मों के लिए अलग ठप्पा लगा दिया जाता है।

‘जवान-पठान को पैन-इंडिया नहीं कहते, फिर हमारी फिल्मों को क्यों?’ नानी ने उठाया बड़ा सवाल
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: JantaScope

तेलुगु अभिनेता नानी अपनी नई फिल्म ‘द पैराडाइज’ की रिलीज से पहले केवल फिल्म की कहानी या उसके बड़े पैमाने की चर्चा नहीं कर रहे हैं। उन्होंने भारतीय फिल्म उद्योग में पिछले कुछ वर्षों में बेहद आम हो चुके एक शब्द—‘पैन-इंडिया’—पर ही सवाल खड़ा कर दिया है।

चेन्नई में फिल्म के प्रचार के दौरान नानी से पूछा गया कि उन्हें अपनी फिल्मों के लिए ‘पैन-इंडिया’ शब्द पसंद क्यों नहीं है। जवाब में उन्होंने कहा कि वह आदर्श रूप से किसी भी फिल्म को इस नाम से पुकारना नहीं चाहते। उनका तर्क था कि अगर कोई हिंदी फिल्म तमिल, तेलुगु या मलयालम में बड़ी सफलता हासिल करती है, तब भी उसे सामान्यतः हिंदी फिल्म ही कहा जाता है। लेकिन जब कोई तेलुगु या दूसरी दक्षिण भारतीय फिल्म देश के अलग-अलग हिस्सों में सफल होती है, तो उसके साथ ‘पैन-इंडिया’ का विशेष ठप्पा जोड़ दिया जाता है।

नानी ने इसी संदर्भ में शाहरुख खान की ‘जवान’ और ‘पठान’ का उदाहरण दिया।

उनका सवाल सीधा था—अगर ये फिल्में तमिल और तेलुगु में भी अच्छा प्रदर्शन करती हैं और फिर भी उन्हें हिंदी फिल्म कहा जाता है, तो दक्षिण से आने वाली किसी बहुभाषी फिल्म के लिए अलग श्रेणी बनाने की जरूरत क्यों पड़ती है?

नानी की आपत्ति किसी एक फिल्म तक सीमित नहीं है। उनके बयान ने भारतीय सिनेमा में भाषा, पहचान और बाजार के बीच बनी उस नई व्यवस्था पर बहस खोल दी है, जिसमें फिल्में पहले से कहीं अधिक आसानी से अपनी मूल भाषा की सीमाएं पार कर रही हैं।

नानी ने वास्तव में क्या कहा?

नानी ने कहा कि वह नहीं चाहते कि उनकी फिल्म को ‘पैन-इंडियन’ कहा जाए क्योंकि उनके अनुसार किसी भी फिल्म के लिए इस शब्द की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कोई हिंदी फिल्म तेलुगु, तमिल या मलयालम संस्करण में सफल होती है तो उसे फिर भी हिंदी फिल्म कहा जाता है। वहीं तेलुगु फिल्म पूरे देश में सफल हो जाए तो उसके साथ ‘पैन-इंडियन’ शब्द जोड़ दिया जाता है।

उनका कहना था कि वह तमिल, हिंदी, मलयालम और कन्नड़ दर्शकों तक पहुंचने की कोशिश करते रहेंगे, लेकिन उसके लिए फिल्म की पहचान बदलना जरूरी नहीं है।

इससे कुछ दिन पहले भी नानी ने इसी विषय पर बात की थी। द पैराडाइज के प्रचार के दौरान उन्होंने ‘पैन-इंडिया’ को जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द बताया था और स्पष्ट किया था कि फिल्म कई भाषाओं में आएगी, लेकिन इसका मूल आधार तेलुगु सिनेमा ही है।

यानी यह टिप्पणी अचानक आया कोई प्रचारात्मक बयान नहीं है। नानी लगातार फिल्म की भाषा और उसके बाजार को दो अलग चीजों के रूप में देखने की बात कर रहे हैं।

‘द पैराडाइज’ खुद कई भाषाओं में आ रही है

यहीं इस बहस का सबसे दिलचस्प हिस्सा सामने आता है।

नानी जिस ‘पैन-इंडिया’ शब्द से दूरी बना रहे हैं, उनकी अपनी फिल्म द पैराडाइज का प्रदर्शन बहुत बड़े बहुभाषी स्तर पर होने वाला है।

श्रीकांत ओडेला निर्देशित फिल्म 24 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में आने वाली है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसे तेलुगु के साथ हिंदी, तमिल, कन्नड़, मलयालम, बंगाली, अंग्रेजी और स्पेनिश सहित आठ भाषाओं में प्रदर्शित करने की योजना है।

नानी और श्रीकांत ओडेला इससे पहले दसरा में साथ काम कर चुके हैं।

लेकिन नानी के लिए कई भाषाओं में फिल्म प्रदर्शित करना और उसे ‘पैन-इंडिया फिल्म’ कहना एक ही बात नहीं है।

उनके तर्क का सार यही है: फिल्म तेलुगु हो सकती है और फिर भी हिंदी, तमिल, मलयालम या किसी दूसरे भाषाई बाजार के दर्शकों तक पहुंच सकती है। व्यापक प्रदर्शन के लिए उसकी मूल सिनेमाई पहचान को किसी नई श्रेणी में रखने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

लेकिन ‘जवान’ को लेकर एक जरूरी तथ्य

नानी के उदाहरण को समझते समय एक महत्वपूर्ण तथ्य जोड़ना जरूरी है।

उन्होंने जवान और पठान को उदाहरण बनाकर कहा कि ऐसी हिंदी फिल्मों को सामान्य बातचीत में ‘पैन-इंडिया’ नहीं कहा जाता। आज की फिल्मी भाषा में उनकी बात समझ में आती है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह कहना सही नहीं होगा कि जवान के लिए यह शब्द कभी इस्तेमाल ही नहीं किया गया।

Red Chillies Entertainment ने जून 2022 में जवान की आधिकारिक घोषणा करते समय उसे शाहरुख खान की पहली “Pan India film” कहा था। शुरुआती घोषणा में फिल्म को पांच भाषाओं में लाने की बात कही गई थी। बाद में सितंबर 2023 में फिल्म हिंदी, तमिल और तेलुगु में सिनेमाघरों में आई।

इसी तरह यशराज फिल्म्स ने पठान को 25 जनवरी 2023 को हिंदी, तमिल और तेलुगु में प्रदर्शित करने की आधिकारिक घोषणा की थी।

इसलिए नानी के बयान को शाब्दिक ऐतिहासिक दावा मानने के बजाय उद्योग की मौजूदा भाषा पर टिप्पणी के रूप में पढ़ना ज्यादा उचित है।

उनका व्यापक सवाल फिर भी बना रहता है—क्या ‘पैन-इंडिया’ शब्द का इस्तेमाल अलग-अलग भाषाई फिल्म उद्योगों के लिए समान तरीके से होता है?

आखिर ‘पैन-इंडिया’ शब्द इतना बड़ा कैसे हुआ?

भारतीय सिनेमा में अलग-अलग भाषाओं में फिल्में प्रदर्शित करना नई बात नहीं है। डबिंग भी दशकों से होती रही है।

बदलाव तब आया जब दक्षिण भारतीय फिल्मों ने अपनी मूल भाषा से बाहर बहुत बड़े स्तर पर दर्शक हासिल करना शुरू किया।

बाहुबली फिल्मों की सफलता ने तेलुगु सिनेमा को हिंदी पट्टी में अभूतपूर्व पहुंच दी। बाद के वर्षों में केजीएफ, पुष्पा, आरआरआर और कांतारा जैसी फिल्मों ने यह साबित किया कि किसी फिल्म का मूल भाषा बाजार अब उसकी राष्ट्रीय व्यावसायिक सीमा तय नहीं करता।

इसके बाद ‘पैन-इंडिया’ फिल्म अपने आप में प्रचार की एक श्रेणी बन गई।

निर्माता फिल्म की घोषणा से ही कई भाषाओं में प्रदर्शन, अलग-अलग राज्यों में प्रचार और देशव्यापी वितरण को उसकी पहचान का हिस्सा बनाने लगे।

लेकिन यही वह जगह है जहां नानी की आपत्ति शुरू होती है।

अगर दर्शक भाषाई सीमाएं पहले ही तोड़ रहे हैं, तो क्या हर दक्षिण भारतीय फिल्म के राष्ट्रीय विस्तार को अलग नाम देने की जरूरत है?

भाषा और बाजार एक ही चीज नहीं

नानी का तर्क भारतीय फिल्म उद्योग में एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है।

पहले किसी फिल्म की भाषा और उसका मुख्य बाजार लगभग एक-दूसरे से जुड़े होते थे। हिंदी फिल्म का सबसे बड़ा बाजार हिंदी भाषी राज्य होते थे, जबकि तेलुगु, तमिल, मलयालम या कन्नड़ फिल्मों का कारोबार अपने-अपने क्षेत्रों पर अधिक निर्भर रहता था।

अब यह सीमा कमजोर हो रही है।

यशराज फिल्म्स के अपने वितरण विवरण में पठान सहित कई हिंदी फिल्मों के तमिल और तेलुगु संस्करणों में देशभर में प्रदर्शन का उल्लेख है। इसी तरह दक्षिण की बड़ी फिल्मों के हिंदी संस्करण उत्तर और पश्चिम भारत में व्यापक स्तर पर प्रदर्शित होते हैं।

ऐसे में “मूल भाषा” और “दर्शकों का भूगोल” अलग-अलग बातें बन चुकी हैं।

तेलुगु फिल्म पूरे भारत में देखी जा सकती है और फिर भी तेलुगु फिल्म रह सकती है। ठीक वैसे ही जैसे हिंदी फिल्म दक्षिण भारत में सफल होने के बाद अपनी मूल पहचान नहीं खोती।

क्या ‘पैन-इंडिया’ शब्द केवल दक्षिण की फिल्मों के लिए है?

इसे पूर्ण तथ्य के रूप में कहना मुश्किल है।

जवान की शुरुआती आधिकारिक घोषणा इसका स्पष्ट अपवाद है, जहां खुद निर्माता कंपनी ने ‘पैन इंडिया’ शब्द इस्तेमाल किया था।

इसलिए यह दावा कि हिंदी फिल्मों के लिए यह शब्द “कभी” इस्तेमाल नहीं होता, उपलब्ध प्रमाणों से समर्थित नहीं है।

लेकिन नानी का प्रश्न शब्द के बिल्कुल न इस्तेमाल होने के बारे में कम और उसके असमान प्रचलन के बारे में अधिक दिखाई देता है।

हाल के वर्षों में ‘पैन-इंडिया’ शब्द खास तौर पर तेलुगु, तमिल, कन्नड़ और मलयालम फिल्मों के राष्ट्रीय विस्तार से जुड़ी प्रचार भाषा का प्रमुख हिस्सा बना है। नानी इसी चलन को चुनौती दे रहे हैं।

बड़े बजट से भी जुड़ा है यह ठप्पा

यह बहस केवल पहचान की नहीं, पैसे की भी है।

फिल्म निर्माता रवि शंकर येल्लमंचिली ने हाल में Deccan Chronicle से कहा कि किसी तेलुगु फिल्म को ‘पैन-इंडिया’ बनाने की महत्वाकांक्षा उसके बजट को तेजी से बढ़ा सकती है, क्योंकि फिर निर्माण से लेकर प्रचार और कई बाजारों में वितरण तक का पैमाना बदल जाता है।

इससे एक दूसरी समस्या पैदा होती है।

अगर ‘पैन-इंडिया’ अपने आप में सफलता का वादा बन जाए, तो फिल्म पर कई भाषाई बाजारों में कमाई करने का दबाव भी बढ़ जाता है।

हर बहुभाषी प्रदर्शन राष्ट्रीय सफलता में नहीं बदलता। इसलिए केवल भाषाओं की संख्या किसी फिल्म की वास्तविक पहुंच का सही पैमाना नहीं हो सकती।

जंतास्कोप विश्लेषण: नानी की बहस नाम से ज्यादा पहचान की है

नानी की टिप्पणी को “उत्तर बनाम दक्षिण” विवाद तक सीमित करना उनके तर्क को छोटा कर देगा।

असल सवाल यह है कि भारतीय सिनेमा की पहचान अब किस आधार पर तय की जानी चाहिए—फिल्म की मूल भाषा से, उसके निर्माण उद्योग से, प्रदर्शन की भाषाओं से या उसे देखने वाले दर्शकों से?

द पैराडाइज इसका अच्छा उदाहरण है।

यह मूल रूप से तेलुगु फिल्म है, लेकिन आठ भाषाओं में दर्शकों तक पहुंचने की तैयारी है। नानी चाहते हैं कि इस व्यापक पहुंच के बावजूद उसे अपनी तेलुगु पहचान छोड़कर किसी अलग ‘पैन-इंडिया’ खाने में न जाना पड़े।

उनकी बात में एक विरोधाभास भी है जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए: फिल्म उद्योग खुद वर्षों से ‘पैन-इंडिया’ शब्द को प्रचार के लिए इस्तेमाल करता रहा है, और जवान जैसी हिंदी फिल्म की आधिकारिक घोषणा में भी यह शब्द मौजूद था।

फिर भी आज यह बहस इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि दर्शकों का व्यवहार तेजी से बदल चुका है।

संभव है आने वाले समय में किसी फिल्म के राष्ट्रीय होने का सबसे बड़ा प्रमाण उसके प्रचार में लगा कोई ठप्पा नहीं, बल्कि अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रों के दर्शकों द्वारा उसे अपनाया जाना हो।

नानी की बात आखिरकार इसी अंतर की ओर इशारा करती है—फिल्म को पूरे भारत के लिए घोषित करना और पूरे भारत के दर्शकों द्वारा उसे अपना लेना दो अलग बातें हैं।

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