करण जौहर ने ‘Kabhi Alvida Naa Kehna’ पर फिर की बात
करण जौहर की फिल्मों में रिश्ते, परिवार और प्रेम लंबे समय से महत्वपूर्ण विषय रहे हैं। हालांकि 2006 में रिलीज हुई ‘Kabhi Alvida Naa Kehna’ ने उनके सिनेमा में रिश्तों को देखने का एक अपेक्षाकृत अलग नजरिया पेश किया था।
फिल्म ने ऐसे वैवाहिक रिश्तों और भावनात्मक उलझनों को कहानी के केंद्र में रखा, जहां पात्र अपने विवाह में असंतोष का सामना करते हैं और उनके जीवन में विवाह से बाहर नए रिश्ते बनते हैं।
इसी विषय के कारण रिलीज के समय फिल्म पर काफी चर्चा हुई थी। अब करण जौहर ने स्पष्ट किया है कि कहानी का उद्देश्य बेवफाई को सही ठहराना या उसका समर्थन करना नहीं था।
‘फिल्म ने बेवफाई को बढ़ावा नहीं दिया’
करण जौहर के मुताबिक, ‘Kabhi Alvida Naa Kehna’ को इस तरह नहीं देखा जाना चाहिए कि वह विवाहेतर संबंधों को स्वीकार करने या उनका समर्थन करने का संदेश देती है।
उनका पक्ष यह संकेत देता है कि फिल्म का मकसद जटिल रिश्तों और असंतुष्ट विवाहों को कहानी के माध्यम से सामने रखना था, न कि किरदारों के हर फैसले को नैतिक रूप से सही घोषित करना।
किसी विषय को पर्दे पर दिखाने और उसका समर्थन करने के बीच अंतर होता है। ‘Kabhi Alvida Naa Kehna’ को लेकर लंबे समय से चली आ रही बहस का एक बड़ा हिस्सा भी इसी अंतर से जुड़ा रहा है।
बीच फिल्म से उठकर चला गया था एक कपल
करण जौहर ने फिल्म से जुड़ा एक दिलचस्प अनुभव भी याद किया। उनके मुताबिक, एक शो के दौरान एक कपल फिल्म पूरी होने से पहले ही बीच में उठकर बाहर चला गया था।
यह घटना बताती है कि फिल्म में दिखाए गए रिश्तों और बेवफाई जैसे संवेदनशील विषयों ने दर्शकों में तीखी और व्यक्तिगत प्रतिक्रियाएं पैदा की थीं।
हर दर्शक किसी फिल्म को अपने अनुभवों और मूल्यों के आधार पर देखता है। ऐसे में रिश्तों से जुड़े विवादास्पद विषय पर बनी फिल्म अलग-अलग दर्शकों पर बिल्कुल अलग प्रभाव डाल सकती है।
क्यों विवादों में रही थी ‘Kabhi Alvida Naa Kehna’?
2006 में आई ‘Kabhi Alvida Naa Kehna’ में शाहरुख खान, रानी मुखर्जी, अभिषेक बच्चन, प्रीति जिंटा, अमिताभ बच्चन और किरण खेर जैसे कलाकार प्रमुख भूमिकाओं में थे।
फिल्म की कहानी शादी, भावनात्मक असंतोष, प्रेम और विवाहेतर संबंधों के इर्द-गिर्द घूमती है। उस दौर के मुख्यधारा हिंदी सिनेमा में विवाह को अक्सर आदर्श रिश्ते के रूप में पेश किया जाता था। इसके मुकाबले करण जौहर की इस फिल्म ने असफल या अधूरे विवाह के सवाल को ज्यादा सीधे तरीके से उठाया।
यही वजह रही कि फिल्म ने दर्शकों को दो हिस्सों में बांट दिया। कुछ लोगों ने रिश्तों की जटिलताओं को दिखाने के प्रयास की सराहना की, जबकि दूसरे वर्ग को किरदारों के फैसलों और विवाहेतर संबंधों के चित्रण पर आपत्ति थी।
क्या किसी विषय को दिखाना उसका समर्थन करना है?
करण जौहर की टिप्पणी एक बड़ी सिनेमाई बहस की ओर भी ध्यान खींचती है—क्या किसी विवादास्पद व्यवहार को कहानी में प्रमुखता से दिखाने का मतलब फिल्मकार द्वारा उसका समर्थन करना है?
फिक्शन में कई बार ऐसे पात्र और परिस्थितियां दिखाई जाती हैं जिनके फैसले नैतिक रूप से जटिल होते हैं। दर्शक उन किरदारों से सहमत भी हो सकते हैं और असहमत भी।
इस नजरिए से ‘Kabhi Alvida Naa Kehna’ को केवल बेवफाई की कहानी मानने के बजाय असंतुष्ट विवाह, व्यक्तिगत इच्छाओं और रिश्तों में ईमानदारी से जुड़े सवाल उठाने वाली फिल्म के रूप में भी देखा जा सकता है।
इसके विपरीत, फिल्म की आलोचना करने वाले दर्शकों का यह मानना भी समझने योग्य है कि लोकप्रिय सिनेमा जिस तरह किसी रिश्ते या व्यवहार को प्रस्तुत करता है, उसका दर्शकों की धारणा पर प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए संवेदनशील विषयों की प्रस्तुति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
करीब दो दशक बाद भी क्यों होती है फिल्म की चर्चा?
‘Kabhi Alvida Naa Kehna’ की रिलीज को लंबा समय बीत चुका है, लेकिन फिल्म के रिश्तों और बेवफाई से जुड़े विषय आज भी चर्चा पैदा करते हैं।
इसका एक कारण यह है कि विवाह, प्रेम, भावनात्मक असंतोष और व्यक्तिगत खुशी जैसे मुद्दों पर सामाजिक नजरिया लगातार बदलता रहता है। समय के साथ नई पीढ़ी पुरानी फिल्मों को नए सामाजिक संदर्भ में देखती और उनका दोबारा मूल्यांकन करती है।
करण जौहर का ताजा बयान इसी बहस को फिर सामने लाता है—फिल्म की कहानी को उसके किरदारों के फैसलों का समर्थन समझा जाए या कठिन रिश्तों को लेकर असहज सवाल उठाने की कोशिश के रूप में देखा जाए।
