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बॉलीवुड

सारा अली खान की मंदिर यात्रा पर उठे सवाल, फतवे के बाद धार्मिक स्वतंत्रता पर बहस

बॉलीवुड अभिनेत्री सारा अली खान एक बार फिर अपनी फिल्मों के बजाय धार्मिक आस्था को लेकर चर्चा में हैं। हाल ही में उत्तराखंड स्थित केदारनाथ मंदिर में दर्शन और पूजा करने पहुंचीं सारा को लेकर अब विवाद खड़ा हो गया है। बरेली के मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने उनके मंदिर जाने और वहां धार्मिक गतिविधियों में शामिल होने पर आपत्ति जताते हुए फतवा जारी किया है।

सारा अली खान की मंदिर यात्रा पर उठे सवाल, फतवे के बाद धार्मिक स्वतंत्रता पर बहस
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द्वारा साधना गुप्ता

स्रोत: india today , zee news, abp news, abp live, times of india

25 अक्टूबर को केदारनाथ पहुंची थीं सारा अली खान

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सारा अली खान 25 अक्टूबर 2026 को केदारनाथ मंदिर पहुंची थीं। इस दौरान वह आम श्रद्धालुओं की तरह दर्शन के लिए कतार में खड़ी दिखाई दीं। उन्होंने मंदिर में पूजा-अर्चना की और भगवान केदारनाथ के दर्शन किए। उनकी यात्रा से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद यह मामला चर्चा में आ गया।

सारा का केदारनाथ से पुराना जुड़ाव भी रहा है। साल 2018 में आई उनकी पहली फिल्म 'केदारनाथ' की शूटिंग इसी क्षेत्र में हुई थी। इस फिल्म में उनके साथ दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत नजर आए थे। फिल्म की रिलीज के बाद से ही सारा कई बार केदारनाथ यात्रा पर जा चुकी हैं। वह पहले भी अलग-अलग धार्मिक स्थलों पर जाने को अपनी निजी आस्था और पसंद का विषय बता चुकी हैं।

मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने क्या कहा?

सारा की हालिया यात्रा के बाद ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने समाचार एजेंसी ANI से बातचीत में कहा कि इस्लामिक शरीयत के अनुसार किसी मुस्लिम व्यक्ति का दूसरे धर्म के धार्मिक रीति-रिवाजों में शामिल होना और वहां पूजा करना जायज नहीं है।

मौलाना के मुताबिक, उन्हें कई युवाओं ने सारा के केदारनाथ जाने और पूजा करने को लेकर सवाल पूछे थे। इसके जवाब में उन्होंने अभिनेत्री के इस कदम को शरीयत के विरुद्ध बताया। उन्होंने कहा कि यदि सारा ने अपनी इच्छा से मंदिर में पूजा और धार्मिक अनुष्ठान किए हैं, तो उन्हें अल्लाह से माफी मांगनी चाहिए और तौबा करनी चाहिए।

उनके इस बयान को मीडिया रिपोर्ट्स में सारा के खिलाफ फतवा जारी करने के रूप में बताया गया है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि फतवा किसी अदालत का फैसला या सरकारी आदेश नहीं होता। यह धार्मिक कानून से जुड़े सवाल पर किसी इस्लामी विद्वान की धार्मिक राय होती है। इसका अपने आप में कोई कानूनी दंडात्मक अधिकार नहीं होता।

बयान के बाद उठे धार्मिक स्वतंत्रता के सवाल

मौलाना के बयान के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसका विरोध किया। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि किसी वयस्क व्यक्ति को अपनी धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक पसंद के अनुसार किसी भी धार्मिक स्थल पर जाने का अधिकार होना चाहिए। लोगों का कहना है कि किसी कलाकार के मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या चर्च जाने को लेकर इस तरह की सार्वजनिक टिप्पणी करना उसकी निजी स्वतंत्रता में दखल देने जैसा है।

कई सोशल मीडिया यूजर्स ने यह भी कहा कि भारत की पहचान अलग-अलग धर्मों और परंपराओं के सह-अस्तित्व से है। ऐसे में किसी व्यक्ति की पूजा-पद्धति या धार्मिक स्थल पर जाने की पसंद को लेकर विवाद खड़ा करने के बजाय आपसी सम्मान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

हालांकि, सोशल मीडिया पर सामने आई प्रतिक्रियाएं पूरे समाज की राय का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। इस मुद्दे पर अलग-अलग विचार सामने आ रहे हैं और बहस का केंद्र व्यक्तिगत आस्था तथा धार्मिक मान्यताओं के बीच का अंतर बन गया है।

सारा के समर्थन में आए धार्मिक और सामाजिक चेहरे

इस विवाद में कुछ धार्मिक हस्तियों ने सारा अली खान का समर्थन भी किया है। जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने अभिनेत्री के पक्ष में बयान देते हुए कहा कि भारत के संविधान में प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था रखने, पूजा करने या नास्तिक रहने की स्वतंत्रता है। उन्होंने सारा को साहसी बताते हुए उनके केदारनाथ जाने का समर्थन किया।

वहीं, ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने भी इस मामले में फतवे पर सवाल उठाए। इस तरह विवाद केवल एक अभिनेत्री की मंदिर यात्रा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अलग-अलग धार्मिक विचारों के बीच सार्वजनिक बहस का विषय बन गया।

धार्मिक स्वतंत्रता पर क्या कहता है भारतीय संविधान?

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 25 के तहत सभी व्यक्तियों को अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म को मानने, उसका पालन करने तथा उसका प्रचार करने का अधिकार प्राप्त है। हालांकि, यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है।

इसका अर्थ है कि भारत में व्यक्ति अपनी धार्मिक मान्यताओं और आस्था के अनुसार जीवन जी सकता है, लेकिन धार्मिक स्थलों के प्रवेश से जुड़े वैध नियमों और लागू कानूनों का पालन करना भी जरूरी है। किसी व्यक्ति के धार्मिक विश्वास या पूजा के तरीके पर अलग-अलग समुदायों के भीतर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन किसी धार्मिक राय को अपने आप कानूनी आदेश नहीं माना जा सकता।

इस मामले में एक और पहलू सामने आया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ने गैर-हिंदू श्रद्धालुओं के लिए मंदिर में पूजा करने से पहले एक हलफनामा देने की व्यवस्था लागू की है। रिपोर्ट में समिति के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि सारा की टीम ने भी जरूरी हलफनामा जमा कराया था। इस पहलू को मंदिर प्रशासन के नियमों के संदर्भ में देखना जरूरी है।

पहले भी धार्मिक स्थलों पर जाने को लेकर चर्चा में रही हैं सारा

यह पहली बार नहीं है जब सारा अली खान की मंदिर यात्रा को लेकर विवाद हुआ हो। इससे पहले भी उनके उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों पर जाने को लेकर सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं आई थीं। साल 2023 में उन्होंने अपनी धार्मिक यात्राओं पर सवाल उठाने वालों को जवाब देते हुए कहा था कि वह अजमेर शरीफ, बंगला साहिब और महाकाल में समान श्रद्धा के साथ जाना जारी रखेंगी। उनका यह पुराना बयान मौजूदा विवाद के बीच फिर से चर्चा में आ रहा है।

फिलहाल सारा अली खान की ओर से मौलाना के ताजा बयान और फतवे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में उनकी तरफ से कोई जवाब आने से पहले उनके विचारों या इस विवाद पर उनके रुख को लेकर अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।

निजी आस्था या सार्वजनिक बहस?

सारा अली खान का केदारनाथ जाना अब एक बड़ी सामाजिक बहस का रूप ले चुका है। एक ओर धार्मिक मान्यताओं के आधार पर मौलाना ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई है, तो दूसरी ओर कई लोग इसे अभिनेत्री की निजी पसंद और धार्मिक स्वतंत्रता का मामला मान रहे हैं।

भारत जैसे बहुधार्मिक देश में अलग-अलग मान्यताओं का होना स्वाभाविक है। लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति की आस्था को लेकर असहमति जताते समय सम्मान और संवैधानिक मूल्यों का ध्यान रखना भी जरूरी है। फिलहाल यह विवाद इस सवाल को फिर सामने लाता है कि किसी व्यक्ति की धार्मिक पसंद पर सार्वजनिक टिप्पणी की सीमा क्या होनी चाहिए और क्या किसी को अपनी आध्यात्मिक यात्रा के लिए दूसरों से अनुमति लेने की जरूरत होनी चाहिए?

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