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₹96 प्रति डॉलर के करीब रुपया: तेल के झटके के बीच RBI के दखल से थमी गिरावट

भारतीय रुपया कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और आयातकों की डॉलर मांग के दबाव के बावजूद ₹96 प्रति डॉलर के अहम स्तर से नीचे फिसलने से बचा हुआ है। 21 अगस्त को रुपया करीब ₹95.69 प्रति डॉलर पर बंद हुआ और सप्ताह में लगभग 0.3% कमजोर रहा। बाजार प्रतिभागियों के मुताबिक, विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रिजर्व बैंक की लगातार मौजूदगी ने रुपये की गिरावट और उतार-चढ़ाव को सीमित रखने में अहम भूमिका निभाई।

₹96 प्रति डॉलर के करीब रुपया: तेल के झटके के बीच RBI के दखल से थमी गिरावट
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: TOI

तेल के झटके के बावजूद ₹96 के आसपास टिका रुपया

भारतीय मुद्रा पर एक बार फिर वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों का दबाव दिखाई दे रहा है। मध्य पूर्व से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव और तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका के कारण Brent crude में सप्ताह के दौरान 5% से ज्यादा की तेजी आई और कीमत लगभग 93 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। इसलिए तेल महंगा होने पर भारतीय कंपनियों को अधिक डॉलर की जरूरत पड़ती है। इससे विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बढ़ सकती है और रुपये पर कमजोरी का दबाव आता है।

इन प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद 21 अगस्त को रुपया 95.69 प्रति डॉलर पर बंद हुआ और मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण ₹96/$ स्तर के मजबूत पक्ष में बना रहा।

RBI ने कैसे बनाई रुपये के लिए ‘सुरक्षा दीवार’?

हाल के कारोबारी सत्रों में सरकारी बैंकों को डॉलर बेचते हुए देखा गया है। ट्रेडर्स ने इसे RBI की ओर से संभावित हस्तक्षेप से जोड़ा है। केंद्रीय बैंक आमतौर पर किसी निश्चित विनिमय दर की आधिकारिक रक्षा की घोषणा नहीं करता, लेकिन वह अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है।

अगस्त में RBI की लगातार मौजूदगी ने रुपये को अपेक्षाकृत संकरे दायरे में रखने में मदद की है। रुपये की दो सप्ताह की realised volatility 2% से नीचे पहुंच गई, जो एशिया की प्रमुख मुद्राओं में सबसे कम स्तरों में शामिल थी।

इसका अर्थ यह नहीं है कि रुपये पर दबाव खत्म हो गया है। बल्कि फिलहाल केंद्रीय बैंक बाजार में अचानक और तेज गिरावट को सीमित करने में सफल दिखाई देता है।

क्यों कमजोर हो रहा है रुपया?

रुपये पर मौजूदा दबाव के पीछे सबसे बड़ा कारण महंगा कच्चा तेल है। इसके साथ कंपनियों और आयातकों की लगातार डॉलर मांग भी मुद्रा पर दबाव बढ़ा रही है। 19 अगस्त को रुपया तीन सप्ताह के निचले स्तर ₹95.7525 प्रति डॉलर तक बंद हुआ था।

दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान अमेरिकी डॉलर व्यापक स्तर पर कमजोर हुआ और कुछ दूसरी एशियाई मुद्राओं को इसका फायदा मिला। इसके बावजूद रुपये में बड़ी मजबूती नहीं आई। इससे संकेत मिलता है कि भारत से जुड़े तेल और आयात संबंधी दबाव वैश्विक डॉलर कमजोरी से मिलने वाली राहत को काफी हद तक सीमित कर रहे हैं।

तेल की कीमतें रुपये के लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों हैं?

भारत दुनिया के बड़े कच्चा तेल आयातकों में शामिल है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ती है, तो देश का आयात बिल भी बढ़ सकता है।

तेल कंपनियों और दूसरे आयातकों को भुगतान के लिए अधिक डॉलर खरीदने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और सामान्य परिस्थितियों में रुपया कमजोर हो सकता है।

इसके आर्थिक प्रभाव केवल मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहते। लंबे समय तक महंगा तेल परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ा सकता है और इसका असर महंगाई तथा कंपनियों के मार्जिन तक पहुंच सकता है।

इसी वजह से रुपये की मौजूदा स्थिति को केवल USD/INR की चाल के रूप में देखने के बजाय व्यापक आर्थिक जोखिम के संदर्भ में समझना महत्वपूर्ण है।

RBI को डॉलर बेचने की ताकत कहां से मिल रही है?

हाल के महीनों में भारत की बाहरी वित्तीय स्थिति को विदेशी मुद्रा प्रवाह से समर्थन मिला है।

RBI द्वारा जून में घोषित उपायों के बाद विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ा। 21 अगस्त तक विशेष व्यवस्था के तहत FCNR(B) deposits, External Commercial Borrowings और Overseas Foreign Currency Borrowings जैसे माध्यमों से 72.8 अरब डॉलर के डॉलर inflows आने की रिपोर्ट है।

इससे केंद्रीय बैंक के पास बाजार की अस्थिरता से निपटने के लिए अतिरिक्त सहारा मिला है।

14 अगस्त तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 716.9 अरब डॉलर तक पहुंचने की सूचना थी।

बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार केंद्रीय बैंक को बाहरी झटकों के समय बाजार में डॉलर की आपूर्ति करके अत्यधिक मुद्रा अस्थिरता रोकने की क्षमता देता है।

₹96 का स्तर क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

₹96 प्रति डॉलर मुख्य रूप से बाजार के लिए एक मनोवैज्ञानिक स्तर बन गया है।

मुद्रा बाजार में ऐसे स्तर निवेशकों और ट्रेडर्स की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं। यदि कोई मुद्रा महत्वपूर्ण सीमा को तेजी से पार करती है तो speculative positions और hedging demand बढ़ सकती हैं, जिससे उतार-चढ़ाव और तेज हो सकता है।

यही वजह है कि बाजार RBI की गतिविधियों पर बारीकी से नजर रख रहा है।

हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि RBI ने ₹96 को कोई औपचारिक exchange-rate target घोषित नहीं किया है। उपलब्ध रिपोर्टों में यह धारणा मुख्य रूप से ट्रेडर्स और बाजार प्रतिभागियों के आकलन पर आधारित है।

आम लोगों पर कमजोर रुपये का क्या असर पड़ सकता है?

रुपये की कमजोरी का असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकता है।

महंगा डॉलर कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरी आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ा सकता है। विदेश में पढ़ाई, विदेशी यात्रा और डॉलर में भुगतान की जाने वाली सेवाएं भी भारतीय उपभोक्ताओं के लिए महंगी हो सकती हैं।

इसके विपरीत, IT services और अन्य निर्यात-उन्मुख कंपनियों को डॉलर में होने वाली कमाई रुपये में बदलने पर कुछ फायदा मिल सकता है।

इसलिए कमजोर रुपया अपने आप में पूरी तरह नकारात्मक या सकारात्मक घटना नहीं है—उसका प्रभाव अर्थव्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों पर अलग होता है।

आगे रुपये की दिशा किससे तय होगी?

निकट भविष्य में रुपये की दिशा मुख्य रूप से कच्चे तेल की कीमतों, मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक स्थिति, आयातकों की डॉलर मांग, विदेशी पूंजी प्रवाह, अमेरिकी डॉलर की चाल और RBI की intervention strategy पर निर्भर करेगी।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि केंद्रीय बैंक का मुख्य उद्देश्य रुपये को किसी निश्चित मूल्य पर बनाए रखने के बजाय अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकना हो सकता है। अगस्त के मध्य में बाजार विश्लेषकों ने सितंबर के अंत तक रुपये के लिए लगभग ₹94.50-₹96 की संभावित ट्रेडिंग रेंज का अनुमान भी दिया था।

हालांकि तेल की कीमतों में अचानक तेज उछाल या विदेशी पूंजी के बड़े बहिर्वाह से यह समीकरण बदल सकता है।

संतुलित विश्लेषण: स्थिर रुपया राहत है, लेकिन दबाव खत्म नहीं हुआ

RBI की सक्रियता ने फिलहाल रुपये में तेज गिरावट को रोकने और मुद्रा बाजार में अस्थिरता कम करने में मदद की है। बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार और हालिया डॉलर inflows भारत को बाहरी झटकों से मुकाबला करने के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करते हैं।

लेकिन रुपये की कम volatility को यह संकेत नहीं माना जाना चाहिए कि मूल आर्थिक दबाव समाप्त हो गए हैं।

यदि कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है, तो भारत के आयात बिल और डॉलर मांग पर दबाव बना रह सकता है। लगातार हस्तक्षेप की अपनी लागत भी होती है क्योंकि इसके लिए विदेशी मुद्रा संसाधनों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।

इसलिए आने वाले हफ्तों में असली सवाल केवल यह नहीं होगा कि रुपया ₹96 के पार जाता है या नहीं। ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि तेल का झटका कितना लंबा चलता है और RBI को मुद्रा बाजार में कितनी देर तक सक्रिय रहना पड़ता है।


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