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वित्त

बैंकों का तेजी से बढ़ रहा कर्ज, GDP से लगभग दोगुनी रफ्तार ने बढ़ाई महंगाई की चिंता; RBI के सामने नई चुनौती।

नई दिल्ली: भारत की बैंकिंग व्यवस्था में कर्ज देने की रफ्तार तेजी से बढ़ रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2026 के अंत तक बैंकों का नॉन-फूड क्रेडिट सालाना आधार पर 19.1 प्रतिशत बढ़ गया। पिछले साल इसी अवधि में यह वृद्धि 11.2 प्रतिशत थी। यानी एक साल के भीतर बैंक कर्ज की रफ्तार में उल्लेखनीय तेजी आई है। इस बीच देश की अनुमानित नॉमिनल GDP ग्रोथ करीब 10 से 11 प्रतिशत रहने की बात कही जा रही है।

बैंकों का तेजी से बढ़ रहा कर्ज, GDP से लगभग दोगुनी रफ्तार ने बढ़ाई महंगाई की चिंता; RBI के सामने नई चुनौती।
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द्वारा साधना गुप्ता

स्रोत: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की Sectoral Deployment of Bank Credit रिपोर्ट, NDTV Profit; The Financial Express; ETBFSI; CRISIL Ratings और Business Standard।

विशेषज्ञों की चिंता है कि अगर बैंकिंग सिस्टम से तेजी से पैसा बाजार में पहुंचता है और उसके मुकाबले वस्तुओं तथा सेवाओं की आपूर्ति नहीं बढ़ती, तो आने वाले समय में महंगाई का दबाव बन सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में महंगाई निश्चित रूप से बढ़ने वाली है। इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कर्ज किस क्षेत्र में जा रहा है और उससे अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता कितनी बढ़ रही है।

बैंक कर्ज की रफ्तार 19.1% तक पहुंची

RBI की 30 अक्टूबर 2026 को जारी सेक्टोरल डिप्लॉयमेंट ऑफ बैंक क्रेडिट रिपोर्ट के अनुसार, 30 सितंबर 2026 तक नॉन-फूड बैंक क्रेडिट में सालाना आधार पर 19.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई। पिछले वर्ष की समान अवधि में यह आंकड़ा 11.2 प्रतिशत था।

यह आंकड़ा बताता है कि उद्योग, सेवाओं, कृषि और व्यक्तिगत जरूरतों के लिए बैंक से कर्ज लेने की मांग में तेजी आई है। RBI के आंकड़े 41 चुनिंदा अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के सेक्टोरल क्रेडिट डेटा पर आधारित हैं। ये बैंक देश के कुल नॉन-फूड क्रेडिट का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा कवर करते हैं।

सेक्टर के हिसाब से देखें तो सेवाओं के क्षेत्र में कर्ज की वृद्धि सबसे तेज रही। यहां सालाना आधार पर 28.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। उद्योग क्षेत्र में बैंक कर्ज 19.5 प्रतिशत और कृषि एवं उससे जुड़ी गतिविधियों में भी 19.5 प्रतिशत बढ़ा। वहीं, व्यक्तिगत कर्ज की वृद्धि दर 17.3 प्रतिशत रही।

किन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा बढ़ा कर्ज?

सेवा क्षेत्र में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) को दिए जाने वाले कर्ज में बड़ी तेजी देखने को मिली। सितंबर 2026 में NBFCs को बैंक ऋण सालाना आधार पर 41.8 प्रतिशत बढ़ा। कंप्यूटर सॉफ्टवेयर क्षेत्र में कर्ज 45.8 प्रतिशत और एविएशन सेक्टर में 42.7 प्रतिशत बढ़ा।

रियल एस्टेट से जुड़े कमर्शियल प्रॉपर्टी कारोबार में भी बैंक कर्ज की मांग मजबूत रही। इस क्षेत्र में सालाना आधार पर 23.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

औद्योगिक क्षेत्र में मीडियम इंडस्ट्रीज को दिए गए कर्ज में 33.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। माइक्रो और स्मॉल इंडस्ट्रीज के लिए कर्ज 24.4 प्रतिशत बढ़ा, जबकि बड़ी कंपनियों को दिए गए कर्ज में 16 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

कृषि क्षेत्र में भी बैंक फाइनेंसिंग बढ़ी है। कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए कर्ज की वृद्धि दर 19.5 प्रतिशत रही, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 8.9 प्रतिशत थी। व्यक्तिगत कर्ज में 17.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इससे पता चलता है कि कर्ज की मांग केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों में विस्तार कर रही है।

महंगाई बढ़ने की आशंका क्यों जताई जा रही है?

Indian School of Business (ISB) के फाइनेंस प्रोफेसर प्रसन्ना तंत्री ने बैंक कर्ज की तेज वृद्धि पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि जब बैंक कर्ज की वृद्धि दर नॉमिनल GDP ग्रोथ से काफी ज्यादा हो जाती है, तो यह देखना जरूरी है कि अतिरिक्त पैसा आखिर किस काम में इस्तेमाल हो रहा है।

उनके अनुसार, बैंक जब कर्ज देते हैं तो बैंकिंग सिस्टम में जमा और मुद्रा आपूर्ति भी बढ़ सकती है। यदि यह पैसा नई फैक्ट्रियां लगाने, मशीनरी खरीदने, इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में इस्तेमाल होता है, तो इससे अर्थव्यवस्था को फायदा मिल सकता है।

लेकिन अगर कर्ज का बड़ा हिस्सा ऐसी मांग को पूरा करने में खर्च होता है, जिसके मुकाबले बाजार में सामान और सेवाओं की उपलब्धता नहीं बढ़ रही है, तो कीमतों पर दबाव आ सकता है। यही वजह है कि उन्होंने कर्ज वृद्धि को नियंत्रित करने और इसे आर्थिक विकास की रफ्तार के साथ संतुलित करने की जरूरत बताई है।

यह प्रोफेसर की आर्थिक व्याख्या और नीति संबंधी सलाह है, RBI की आधिकारिक चेतावनी या महंगाई बढ़ने का घोषित अनुमान नहीं।

RBI के सामने महंगाई और विकास के बीच संतुलन की चुनौती

महंगाई को नियंत्रित रखना और आर्थिक विकास को बनाए रखना RBI की मौद्रिक नीति के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है। अक्टूबर 2026 की मौद्रिक नीति समीक्षा में केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया था। साथ ही नीति रुख को ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ किया गया।

RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.2 प्रतिशत किया था, जबकि GDP ग्रोथ का अनुमान 7.1 प्रतिशत रखा गया। इससे स्पष्ट है कि केंद्रीय बैंक के सामने महंगाई के जोखिम और विकास की जरूरतों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है।

ब्याज दरों में बढ़ोतरी का असर धीरे-धीरे बैंकिंग सिस्टम तक पहुंचता है। यदि बैंक कर्ज महंगा होता है, तो होम लोन, कार लोन और कारोबार के लिए लिए जाने वाले ऋण की EMI बढ़ सकती है। इससे कर्ज की मांग में कुछ कमी आ सकती है। हालांकि, इसका असर तत्काल नहीं दिखता और यह बैंकों की ब्याज दरों तथा ग्राहकों के व्यवहार पर निर्भर करता है।

क्या आम लोगों पर पड़ेगा असर?

अगर कर्ज की तेज वृद्धि के साथ महंगाई का दबाव बढ़ता है, तो इसका असर आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। खाने-पीने की वस्तुओं, घर, परिवहन और रोजमर्रा की सेवाओं की कीमतें बढ़ने पर परिवारों का मासिक बजट प्रभावित हो सकता है।

दूसरी तरफ, बैंक कर्ज की उपलब्धता बढ़ने से छोटे कारोबारियों को पूंजी मिल सकती है। उद्योगों को मशीनरी और विस्तार के लिए पैसा मिल सकता है। इससे रोजगार, उत्पादन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की संभावना भी रहती है।

इसलिए कर्ज की वृद्धि को केवल खतरे के रूप में देखना सही नहीं होगा। महत्वपूर्ण यह है कि कर्ज का इस्तेमाल उत्पादक गतिविधियों में कितना हो रहा है और उसके मुकाबले अर्थव्यवस्था में आपूर्ति कितनी बढ़ रही है।

आगे किन आंकड़ों पर रहेगी नजर?

आने वाले महीनों में RBI के क्रेडिट ग्रोथ, महंगाई, बैंक जमा और औद्योगिक उत्पादन से जुड़े आंकड़े महत्वपूर्ण होंगे। बैंकों के कर्ज और जमा में अंतर, कर्ज की गुणवत्ता और विभिन्न क्षेत्रों में ऋण का इस्तेमाल भी निगरानी के अहम संकेतक होंगे।

कुल मिलाकर, भारत में बैंक कर्ज की 19.1 प्रतिशत वृद्धि आर्थिक गतिविधियों में तेजी का संकेत देती है, लेकिन GDP की तुलना में इसकी ऊंची रफ्तार ने नई आर्थिक बहस शुरू कर दी है। यदि कर्ज उत्पादन और निवेश को बढ़ाता है, तो यह विकास के लिए सकारात्मक साबित हो सकता है। लेकिन यदि मांग तेजी से बढ़े और आपूर्ति पीछे रह जाए, तो महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में RBI के लिए आने वाले समय में कर्ज, तरलता और ब्याज दरों के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण होगा।

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