निजी क्षेत्र को आगे आने की जरूरत: सीतारमण
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारतीय कंपनियों से देश के अगले निवेश चक्र का नेतृत्व करने का आह्वान किया है। उनका कहना है कि अब निजी क्षेत्र को केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि रिसर्च और इनोवेशन में भी अधिक पूंजी लगानी चाहिए।
नई दिल्ली में Kautilya Economic Conclave 2026 को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में जारी अनिश्चितता को नीति निर्माण के लिए एक स्थायी चुनौती के रूप में रेखांकित किया।
उनका संदेश था कि भारत को आने वाले वर्षों के लिए ऐसी आर्थिक क्षमता तैयार करनी होगी जो बाहरी झटकों के बावजूद विकास जारी रख सके।
R&D में भारत के सामने बड़ी चुनौती
वित्त मंत्री ने भारत के रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) निवेश को लेकर महत्वपूर्ण आंकड़े सामने रखे।
उनके अनुसार, भारत का R&D खर्च GDP के करीब 0.83% के बराबर है। इसके मुकाबले OECD देशों का औसत लगभग 2.7% है।
भारत में कुल R&D खर्च में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी भी केवल 36% है।
इन आंकड़ों के जरिए वित्त मंत्री ने यह संकेत दिया कि यदि भारत वैश्विक स्तर पर तकनीकी और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाना चाहता है, तो कंपनियों को अनुसंधान पर अधिक खर्च करना होगा।
₹1 लाख करोड़ की योजना से निजी निवेश को बढ़ावा
सरकार ने निजी क्षेत्र को रिसर्च और इनोवेशन की ओर आकर्षित करने के लिए ₹1 लाख करोड़ की Research, Development and Innovation Scheme पर भी जोर दिया है।
इस पहल का उद्देश्य ऐसी परियोजनाओं में निजी निवेश को प्रोत्साहित करना है जिनमें नई तकनीक विकसित करने और भारत की दीर्घकालिक औद्योगिक क्षमता बढ़ाने की संभावना हो।
वित्त मंत्री ने इसे भारत को केवल “Made in India” से आगे बढ़ाकर “Imagined and Made in India” की दिशा में ले जाने की रणनीति से जोड़ा।
सरकारी निवेश के बाद निजी पूंजी पर फोकस क्यों?
पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने सड़क, रेल, ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स और दूसरे बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में पूंजीगत खर्च को विकास रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।
लेकिन किसी अर्थव्यवस्था में निवेश का अगला बड़ा चरण केवल सरकारी खर्च के सहारे लंबे समय तक नहीं चल सकता। निजी कंपनियों द्वारा नई फैक्ट्रियों, मशीनरी, तकनीक, डेटा सेंटर, ऊर्जा परियोजनाओं और अनुसंधान में निवेश बढ़ना भी आवश्यक होता है।
यही कारण है कि अब नीति का फोकस निजी पूंजी को अधिक सक्रिय करने पर बढ़ रहा है।
निजी Capex में अभी भी क्यों है हिचकिचाहट?
हालांकि निजी क्षेत्र को आगे आने के लिए कहा जा रहा है, लेकिन कॉरपोरेट निवेश के सामने कुछ वास्तविक चुनौतियां भी मौजूद हैं।
अगस्त में सामने आए SBI Caps के एक विश्लेषण के मुताबिक, असमान मांग, कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव, व्यापार से जुड़ी अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और सस्ते आयात जैसी परिस्थितियां कंपनियों के बड़े निवेश फैसलों को प्रभावित कर रही हैं।
विश्लेषण में FY27 से FY31 के निवेश चक्र में औसत सालाना व्यय जरूरत करीब ₹30 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था, जबकि FY22-FY26 में यह करीब ₹20 लाख करोड़ थी।
इसलिए सवाल केवल कंपनियों के पास पैसा उपलब्ध होने का नहीं है। भविष्य की मांग और निवेश पर मिलने वाले रिटर्न को लेकर भरोसा भी निजी Capex की गति तय करेगा।
सेमीकंडक्टर और रणनीतिक संसाधनों पर भी जोर
सीतारमण ने आर्थिक मजबूती को केवल निवेश की मात्रा से नहीं जोड़ा। उन्होंने महत्वपूर्ण संसाधनों और सप्लाई चेन में भारत की निर्भरता कम करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
सरकार National Critical Mineral Mission, Rare Earth Corridors और India Semiconductor Mission 2.0 जैसी पहलों के जरिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू क्षमता मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
वित्त मंत्री का तर्क है कि केवल कम लागत के आधार पर तैयार की गई वैश्विक सप्लाई चेन संकट के समय कमजोर साबित हो सकती हैं। इसलिए रणनीतिक संसाधनों की उपलब्धता को भी व्यापक आर्थिक नीति का हिस्सा बनाना जरूरी है।
वैश्विक व्यापार पर क्या कहा?
वैश्विक व्यापार को लेकर वित्त मंत्री ने बातचीत और समझौतों के जरिए मतभेद सुलझाने पर जोर दिया।
उनका कहना था कि भू-राजनीतिक मतभेदों को व्यापार और निवेश के रास्ते में अनावश्यक बाधाओं में बदलने के बजाय देशों को संवाद तथा बातचीत से समाधान तलाशना चाहिए।
यह संदेश ऐसे दौर में महत्वपूर्ण है जब व्यापारिक तनाव, सप्लाई चेन में बदलाव और भू-राजनीतिक संघर्ष कंपनियों के निवेश निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं।
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए इसका क्या मतलब है?
वित्त मंत्री का बयान सरकार की आर्थिक रणनीति में एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता को दर्शाता है—सरकार बुनियादी ढांचे और नीतिगत समर्थन का आधार तैयार करे, लेकिन अगली बड़ी निवेश लहर में निजी कंपनियां अधिक जिम्मेदारी लें।
यदि निजी Capex बढ़ता है तो इससे नई उत्पादन क्षमता, रोजगार, तकनीकी विकास और उत्पादकता को समर्थन मिल सकता है।
हालांकि, केवल कंपनियों से अधिक निवेश की अपील पर्याप्त नहीं होगी। स्थिर मांग, नीतिगत स्पष्टता, वित्त की उपलब्धता और वैश्विक व्यापार का माहौल भी कंपनियों के फैसलों को प्रभावित करेगा।
इसलिए भारत के अगले निवेश चक्र की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सार्वजनिक निवेश से तैयार आधार को निजी क्षेत्र कितनी तेजी से वास्तविक परियोजनाओं और नवाचार में बदलता है।
निष्कर्ष
निर्मला सीतारमण का संदेश स्पष्ट है: भारत की अगली विकास यात्रा में निजी क्षेत्र को निवेश और इनोवेशन का बड़ा इंजन बनना होगा।
सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे और रिसर्च के लिए वित्तीय ढांचा तैयार किए जाने के बाद अब भारतीय कंपनियों के सामने चुनौती पूंजी को नई क्षमता, तकनीक और अनुसंधान में लगाने की है।
अगर निजी निवेश में मजबूत तेजी आती है, तो यह भारत की दीर्घकालिक विकास दर और वैश्विक प्रतिस्पर्धा दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
