सात सप्ताह में करीब 66 अरब डॉलर घटा विदेशी मुद्रा भंडार
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 4 सितंबर 2026 को समाप्त सप्ताह में 785.71 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। इसके बाद से इसमें लगातार गिरावट देखने को मिली है। 23 अक्टूबर तक यह घटकर 719.75 अरब डॉलर रह गया। यानी सात सप्ताह के दौरान कुल भंडार में करीब 65.96 अरब डॉलर की कमी आई है।
ताजा सप्ताह में ही भंडार 1.27 अरब डॉलर कम हुआ। इससे पहले 16 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में इसमें लगभग 5.01 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी। लगातार हो रही इस कमी के कारण विदेशी मुद्रा भंडार अपने हालिया रिकॉर्ड स्तर से काफी नीचे आ गया है।
सोने के भंडार में गिरावट बनी सबसे बड़ी वजह
RBI के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस बार विदेशी मुद्रा भंडार में कमी का सबसे बड़ा कारण सोने के भंडार के मूल्य में गिरावट रही। 23 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में भारत के गोल्ड रिजर्व का मूल्य लगभग 2.65 अरब डॉलर घटकर 103.15 अरब डॉलर रह गया।
इसके विपरीत, विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों यानी Foreign Currency Assets (FCA) में बढ़ोतरी हुई। इस अवधि में FCA करीब 1.36 अरब डॉलर बढ़कर 593.20 अरब डॉलर पर पहुंच गया। इसका अर्थ है कि विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में वृद्धि के बावजूद सोने के मूल्य में आई बड़ी गिरावट ने कुल भंडार को नीचे खींच लिया।
यहां समझना जरूरी है कि विदेशी मुद्रा भंडार में शामिल सोने का मूल्य अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों के आधार पर बदलता रहता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत घटती है, तो भारत के पास मौजूद सोने की मात्रा समान रहने के बावजूद डॉलर में उसका मूल्य कम हो सकता है। इसलिए कुल विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि देश से उतनी ही मात्रा में विदेशी मुद्रा बाहर चली गई है।
RBI क्यों कर रहा है डॉलर का इस्तेमाल?
विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार कमी की एक अन्य महत्वपूर्ण वजह RBI के विदेशी मुद्रा बाजार में किए जा रहे कदम हैं। अक्टूबर में रुपये पर दबाव के बीच केंद्रीय बैंक ने मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया और डॉलर की उपलब्धता बढ़ाने के लिए विशेष व्यवस्था भी की।
Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, RBI ने तीन सरकारी तेल विपणन कंपनियों की रोजाना डॉलर की जरूरत पूरी करने के लिए विशेष व्यवस्था की थी। इसके तहत केंद्रीय बैंक इन कंपनियों को सीधे डॉलर उपलब्ध करा रहा है। सामान्य तौर पर तेल कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से कच्चा तेल खरीदने के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर की जरूरत होती है।
जब ये कंपनियां बाजार से डॉलर खरीदती हैं, तो रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में RBI की ओर से सीधे डॉलर उपलब्ध कराने का उद्देश्य बाजार में अतिरिक्त मांग और मुद्रा की अस्थिरता को नियंत्रित करना है। हालांकि, इस व्यवस्था में विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल होता है।
इसके अलावा RBI ने रुपये में उतार-चढ़ाव को सीमित रखने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप और डॉलर-रुपया स्वैप जैसे कदम भी उठाए हैं। इन गतिविधियों का असर केंद्रीय बैंक के भंडार पर पड़ सकता है।
विदेशी मुद्रा भंडार में क्या-क्या शामिल होता है?
विदेशी मुद्रा भंडार किसी देश की आर्थिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण संसाधन होता है। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में मुख्य रूप से चार हिस्से शामिल होते हैं।
पहला, विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां, जिनमें विदेशी मुद्राओं और संबंधित वित्तीय परिसंपत्तियों का मूल्य शामिल होता है। दूसरा, सोने का भंडार। तीसरा, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की ओर से आवंटित स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स यानी SDRs। चौथा, IMF में भारत की रिजर्व ट्रेंच पोजीशन।
23 अक्टूबर 2026 को समाप्त सप्ताह के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां 593.20 अरब डॉलर, सोने का भंडार 103.15 अरब डॉलर, SDRs 18.60 अरब डॉलर और IMF में रिजर्व ट्रेंच पोजीशन 4.79 अरब डॉलर रही। इन सभी को मिलाकर कुल विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 719.75 अरब डॉलर बैठता है।
क्या विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट से बढ़ेगा आर्थिक दबाव?
विदेशी मुद्रा भंडार में कमी का असर देश की अर्थव्यवस्था पर कई तरीकों से पड़ सकता है। भारत कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, मशीनरी और कई अन्य जरूरी वस्तुओं का आयात करता है। इनका भुगतान बड़े पैमाने पर डॉलर में किया जाता है। ऐसे में पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार होने से देश को अंतरराष्ट्रीय भुगतान करने और मुद्रा बाजार में अचानक आने वाले दबाव का सामना करने में मदद मिलती है।
जब रुपये पर दबाव बढ़ता है, तो RBI विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करके अस्थिरता कम करने की कोशिश कर सकता है। हालांकि, लगातार हस्तक्षेप करने पर भंडार पर दबाव पड़ सकता है। दूसरी तरफ, यदि वैश्विक बाजार में सोने या अन्य विदेशी मुद्राओं का मूल्य बदलता है, तो बिना किसी वास्तविक डॉलर निकासी के भी भंडार का आंकड़ा प्रभावित हो सकता है।
इसलिए केवल सात सप्ताह की गिरावट के आधार पर देश की अर्थव्यवस्था को संकट में बताना सही नहीं होगा। विदेशी मुद्रा भंडार का मूल्यांकन करते समय आयात जरूरतों, बाहरी कर्ज, पूंजी प्रवाह और भविष्य के भुगतान दायित्वों को भी देखना जरूरी है।
आगे किन बातों पर रहेगी बाजार की नजर?
आने वाले सप्ताहों में निवेशकों और आर्थिक विशेषज्ञों की नजर RBI की मुद्रा नीति, कच्चे तेल की कीमतों, सोने के अंतरराष्ट्रीय भाव और विदेशी निवेश के प्रवाह पर रहेगी। यदि डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव बना रहता है, तो केंद्रीय बैंक को बाजार में हस्तक्षेप जारी रखना पड़ सकता है।
दूसरी ओर, विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ने और वैश्विक बाजार में स्थिरता आने से विदेशी मुद्रा भंडार को सहारा मिल सकता है। फिलहाल भारत के पास 719.75 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, लेकिन लगातार सात सप्ताह की गिरावट यह संकेत देती है कि वैश्विक बाजार और घरेलू मुद्रा प्रबंधन पर नजर बनाए रखना जरूरी है।
