पीएमआई के आँकड़ों का क्या मतलब है?
एसएंडपी ग्लोबल द्वारा तैयार यह सर्वे कंपनियों की गतिविधियों में पिछले महीने की तुलना में आए बदलाव को मापता है। पीएमआई में 50 से ऊपर की रीडिंग विस्तार, जबकि इससे नीचे का स्तर संकुचन दर्शाता है। इसलिए 56.7 की रीडिंग को कारोबार में 56.7 प्रतिशत बढ़ोतरी समझना गलत होगा। यह वृद्धि की दिशा और उसके फैलाव का संकेतक है, सकल घरेलू उत्पाद की प्रत्यक्ष वृद्धि दर नहीं।
कंपोजिट सूचकांक विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के उत्पादन को उनकी आर्थिक हिस्सेदारी के अनुसार जोड़ता है। इस वजह से किसी एक क्षेत्र की मजबूती संयुक्त रीडिंग को ऊपर ले जा सकती है। हर उद्योग या हर कंपनी का प्रदर्शन समान होना जरूरी नहीं।
सेवा क्षेत्र की तेजी ने दिया सहारा
अक्टूबर की तेजी में सेवा क्षेत्र की भूमिका प्रमुख रही। इसका बिजनेस एक्टिविटी इंडेक्स सितंबर के 55.2 से बढ़कर 56.2 हो गया। दूसरी तरफ, कारखानों के उत्पादन में भी विस्तार जारी रहा। विनिर्माण उत्पादन सूचकांक 57.5 से मामूली बढ़कर 57.6 पर पहुँचा। दोनों क्षेत्रों के आँकड़े बताते हैं कि कारोबार में सुधार हुआ, लेकिन सेवा गतिविधियों में आया बदलाव अपेक्षाकृत ज्यादा स्पष्ट था।
उत्पादन बढ़ने के बावजूद विनिर्माण पीएमआई में गिरावट
इसी बीच विनिर्माण का मुख्य पीएमआई 55.1 से घटकर 54.9 रह गया। उत्पादन बढ़ने के बावजूद इस सूचकांक का नीचे आना विरोधाभास नहीं है। मुख्य विनिर्माण पीएमआई में उत्पादन के अलावा नए ऑर्डर, रोजगार, आपूर्तिकर्ताओं की डिलीवरी और खरीद के भंडार जैसे पहलू शामिल होते हैं। अक्टूबर में कारखानों की भर्ती धीमी पड़ने का असर मुख्य सूचकांक पर पड़ा, जबकि उत्पादन की रफ्तार लगभग कायम रही।
विदेशी ऑर्डर छह महीने की सबसे तेज रफ्तार से बढ़े
नए ऑर्डर के मोर्चे पर भी सुधार दिखा। कुल नए कारोबार की वृद्धि तेज हुई और विदेशों से मिलने वाले ऑर्डर छह महीने की सबसे तेज रफ्तार से बढ़े। सर्वे में शामिल कंपनियों ने अमेरिका, ब्रिटेन, पश्चिम एशिया और बांग्लादेश जैसे बाजारों से मांग मिलने का उल्लेख किया। हालांकि, निर्यात में सुधार सभी जगह समान नहीं था। वस्तुओं के उत्पादकों को ज्यादा मजबूती मिली, जबकि सेवाओं के विदेशी ऑर्डर की वृद्धि धीमी हुई।
कारोबार में मजबूती, लेकिन नई भर्तियों में सुस्ती
कारोबार की इस मजबूती का असर नई नौकरियों में उसी अनुपात में नहीं दिखा। निजी क्षेत्र में रोजगार केवल मामूली बढ़ा और भर्ती की गति इस वर्ष की सबसे कमजोर रही। सेवा कंपनियों ने कर्मचारियों की संख्या लगभग अपरिवर्तित रखी, जिससे लगातार नौ महीने तक रोजगार बढ़ने का सिलसिला थम गया। विनिर्माण कंपनियों ने भी कर्मचारियों की संख्या में सीमित बढ़ोतरी की।
कंपनियों का कहना था कि मौजूदा कर्मचारी बढ़े हुए काम को संभालने के लिए पर्याप्त हैं। लंबित काम भी घटा, जिससे तत्काल अतिरिक्त भर्ती की जरूरत कम दिखाई दी। इन नतीजों से यह संकेत निकलता है कि कंपनियाँ उपलब्ध क्षमता का इस्तेमाल करके मांग पूरी कर रही हैं। हालांकि, सिर्फ इस सर्वे से भर्ती में सुस्ती के सभी कारण तय नहीं किए जा सकते।
लागत और बिक्री कीमतों में बढ़ोतरी की रफ्तार धीमी
लागत के मोर्चे पर राहत मिली। कच्चे माल और अन्य इनपुट की कीमतों में बढ़ोतरी की रफ्तार लगातार सातवें महीने धीमी हुई और लगभग एक वर्ष के न्यूनतम स्तर पर आ गई। बिक्री कीमतों में वृद्धि भी मार्च 2025 के बाद सबसे धीमी रही। इसका अर्थ कीमतों का सामान्य तौर पर गिरना नहीं, बल्कि उनके बढ़ने की गति कम होना है। कुछ कंपनियों ने स्टील और परिवहन खर्च को दबाव का कारण बताया।
कारोबारी भरोसे में सुधार, सालाना औसत से नीचे
कारोबारी भरोसे में भी सुधार दर्ज हुआ। अगले बारह महीनों की गतिविधियों को लेकर आशावाद मई के बाद सबसे ऊँचे स्तर पर रहा। फिर भी भरोसा और गतिविधियों की वृद्धि दर, दोनों इस वर्ष के अब तक के औसत से नीचे थे। इसलिए चार महीने की सबसे तेज बढ़त को पूरे वर्ष की असाधारण तेजी मानना जल्दबाजी होगी।
आम लोगों के लिए क्या हैं इन आँकड़ों के संकेत?
आम पाठक के लिए इन आँकड़ों का संदेश संतुलित है। कंपनियों को ज्यादा काम मिलना आर्थिक गतिविधियों के लिए अच्छा संकेत है, लेकिन रोजगार में धीमी बढ़ोतरी बताती है कि कारोबार की मजबूती तुरंत व्यापक भर्ती में नहीं बदल रही। इसी तरह कंपनियों की लागत का दबाव घटना अपने आप खुदरा महंगाई में उतनी ही कमी की गारंटी नहीं देता। उपभोक्ता कीमतों की स्थिति अलग आधिकारिक आँकड़ों से समझनी होगी।
नवंबर में आने वाले अंतिम आँकड़ों पर रहेगी नजर
फिलहाल ये फ्लैश, यानी शुरुआती आँकड़े हैं। ऐसे अनुमान अंतिम मासिक सर्वे से पहले जारी किए जाते हैं और बाद में संशोधित हो सकते हैं। अक्टूबर की अंतिम पीएमआई रिपोर्टें नवंबर की शुरुआत में आएँगी। आगे तस्वीर समझने के लिए नए ऑर्डर, वास्तविक उत्पादन, रोजगार और कीमतों को साथ देखना जरूरी होगा। खास नजर इस पर रहेगी कि मौजूदा मांग टिकती है या नहीं और कंपनियाँ अतिरिक्त काम के लिए नई भर्तियाँ कब बढ़ाती हैं।
