रुपयों में गिरावट का कारण?
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपयों में कमजोरी उस समय आई है, जब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने अपनी मौद्रिक नीति में बड़ा बदलाव किया। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने रेपो रेट में 0.25 % से बढ़ोतरी की है जिस कारण रेपोरेट 5.25% से बढ़कर 5.50% जा पहुंचा है। वहीं एमपीसी ने रेपो रेट बढ़ाने के बाद कहा, उन्होंने इस बार नीतिगत सख्ती को अपनाया है, भविष्य में यह रेट फिर से बढ़ सकता है। फरवरी 2023 के बाद भारतीय रिजर्व बैंक ने पहली बार रेपोरेट में बढ़ोतरी की है। वहीं यह कदम देश में बढ़ने वाली महंगाई और पश्चिम एशिया में हो रहे युद्ध के कारण कच्चे तेल के बढ़ते दाम को देखते हुए उठाया गया है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से देश की अर्थव्यवस्था पर खतरा, रुपया पर भारी दबाव।
भारतीय रुपया कमजोर होने के पीछे कच्चे तेल का बढ़ता दाम भी बड़ी वजह है, बता दें कि, 8 अक्टूबर 2026 को ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 102 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, तेल की कीमतों का बढ़ने का एक मात्र कारण है पश्चिम एशिया में तेल का सप्लाई और शिपिंग को लेकर बढ़ती चिंता, इन्हीं कारणों से तेल की कीमत में भारी उछाल हो रहा है। वहीं भारत 80% से ज्यादा तेल आयात करता है। जिससे देश का आयात बिल और व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है।
कॉरपोरेट और सरकारी कर्ज की बढ़ोतरी रुपया की कमजोरी का बड़ा कारण बन गया है।
जब सरकारी और कॉरपोरेट कर्ज में बढ़ोतरी होती है, तो रुपया कमजोर होता है। राजकोषीय घाटा, बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और क्रेडिट रेटिंग का जोखिम और कॉरपोरेट कर्ज का असर इन सब के कारण भी रुपया पर भारी प्रभाव पड़ता है। क्योंकि, कहीं न कहीं फॉरेन फंडर्स भारी मात्रा में भारतीय बाजार में निवेश करते हैं। लेकिन जब उन्हें कर्ज का प्रभाव बढ़ता दिखाई देता है तो वह अपना पैसा बाजार से उठा लेते हैं, और उसे अमेरिकी डॉलर जैसे सुरक्षित संपत्तियों में निवेश करते हैं। वहीं वर्तमान में रुपया के कमजोर होने के 3 बड़े कारण है, वैश्विक डॉलर की मजबूती, , कच्चे तेल की ऊंची कीमत और विदेशी मुद्रा की निकासी।
रुपया पर बढ़ते दबाव के पीछे लगाए जा रहे अनुमान।
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी के ट्रेजरी प्रमुख अनिल कुमार भंसाली का कहना है कि, “ निर्यात की जाने वाली वस्तुओं के भाव में तेजी आने पर बिक्री को रोकना नहीं है। बिक्री बढ़ानी चाहिए, जबकि जब सामान आयात करने की बारी आए तो आयातकों को डॉलर की अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए कीमत में गिरावट का इंतजार करना चाहिए। फिलहाल रुपया के उतार-चढ़ाव जारी रहने की उम्मीद है।, डीलर ऊपर की ओर 96.75 के स्तर पर नजर रखे है और 96 रुपये को ही भविष्य में समर्थन स्तर मान रहे है।
वहीं दूसरी तरफ ट्रेडर्स ने रॉयटर्स को बताया कि, भविष्य में रूपया 96.75 से बढ़कर संभावितः 97 पहुंच सकता है। और कहा कि इस सीमा को पार करने से आयातकों को हेजिंग बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है, जबकि निर्यातक पीछे हट सकते हैं।
गोल्डमैन सैक्स ने आरबीआई के इस कदम को सख्त ब्याज दर वृद्धि करार दिया है, और केंद्रीय बैंक के इस कदम में बदलाव और उसके संचार की ओर इशारा किया है। वहीं ब्रोकरेज फर्म का अनुमान है कि, आरबीआई द्वारा बढ़ाया गया रेपो रेट भविष्य में 0.25 % से और बढ़ सकता है। जिससे रुपया और भारतीय शेयर बाजार में दबाव बढ़ने की संभावना है।
रुपया कमजोर होने का एक और मुख्य कारण है। इसी साल 2026 में भारी मात्रा में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से अपने पैसे निकाले है। रॉयटर्स के अनुसार, 2026 में विदेशी निवेशकों ने equity से लगभग 30 अरब डॉलर निकाले है, जो भारतीय मुद्रा में (करंट रेट के बेस पर) 2 लाख 90 हजार, 520 करोड़ रुपये होते है।
क्या रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर को छू सकता है?
भारतीय रुपया अभी अपने ऐतिहासिक निचले स्तर के काफी ज्यादा करीब था। रॉयटर्स के मुताबिक, 7 अक्टूबर को रुपये का स्तर 96.75 रिकॉर्ड किया गया था, वहीं मौजूदा समय में यह 96.83 है। जोकि 97 को छूने में बस 17 पैसे कम है।
रुपया के कमजोर होने का आम लोगों पर क्या असर होगा?
रुपया के कमजोर होने से आम लोगों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है। अगर रुपया पर लंबे समय पर ऐसे ही प्रभाव पड़ता रहा और गिरावट आती रही तो इलेक्ट्रॉनिक, मशीनरी, कच्चा तेल, और आयात करके आने वाली हर चीज महंगी हो जाएगी। इसका असर आगे चलकर पेट्रोल डीजल, परिवहन लागत, और अन्य कीमती वस्तुओं पर पड़ सकता है।
वहीं दूसरी तरफ कमजोर हो रहा रुपया निर्यातकों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है, क्योंकि विदेशों से मिलने वाली डॉलर की कमाई को रुपये में बदलने पर ज्यादा पैसे मिलते है।
अब रुपया और निचले स्तर पर जाएगा या अमेरिकी डॉलर के कंपेयर में रुपया में उछाल देखने को मिलेगा। यह तो आने वाला समय, कच्चे तेल की कीमत और विदेशी निवेशकों द्वारा ही तय होगा।
