पश्चिम एशिया में तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेजी
गुरुवार, 22 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में खरीदारी का दबाव बढ़ा। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, सुबह ब्रेंट क्रूड 110.11 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचा। इसके बाद कीमतों में और उछाल आया और भारतीय समयानुसार दोपहर से पहले यह 111.64 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। इस दौरान अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड का भाव भी बढ़कर 99.39 डॉलर प्रति बैरल हो गया।
तेल बाजार में यह तेजी अचानक मांग बढ़ने के कारण नहीं, बल्कि आपूर्ति से जुड़ी अनिश्चितताओं के चलते देखने को मिली। निवेशकों को डर है कि पश्चिम एशिया में संघर्ष और बढ़ा तो तेल उत्पादन, भंडारण केंद्रों तथा समुद्री परिवहन मार्गों पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है।
सऊदी अरब में हमलों के बाद बढ़ी वैश्विक चिंता
तेल की बढ़ती कीमतों के पीछे सऊदी अरब में हुई हालिया घटनाओं की बड़ी भूमिका मानी जा रही है। यमन के हूती समूह से जुड़े क्षेत्रीय तनाव के बीच सऊदी अरब के ऊर्जा प्रतिष्ठानों और अन्य ठिकानों पर हमलों की खबरें सामने आई हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक, एक तेल क्षेत्र पर ड्रोन हमले में दो लोगों की जान गई। वहीं दम्माम के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुए हमले में भी लोगों की मौत और कई अन्य के घायल होने की खबर है।
इन घटनाओं के बाद अमेरिका ने सुरक्षा संबंधी चिंताओं को देखते हुए क्षेत्र में अपने कुछ राजनयिक मिशनों से कर्मचारियों और उनके परिवारों को हटाने के कदम उठाए हैं।
सऊदी अरब दुनिया के प्रमुख तेल निर्यातकों में शामिल है। इसलिए उसके ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर किसी भी बड़े खतरे को वैश्विक तेल बाजार गंभीरता से लेता है। हालांकि, हमलों से वास्तविक तेल आपूर्ति कितनी प्रभावित हुई है, इसका आकलन अलग से करना जरूरी है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी बाजार की नजर
पश्चिम एशिया के तनाव में होर्मुज जलडमरूमध्य एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद जरूरी है। इसके आसपास जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका भी तेल की कीमतों में अस्थिरता बढ़ाती है।
हालिया घटनाओं के बीच ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड की ओर से कुछ समुद्री घटनाओं और जहाजों को नुकसान पहुंचने के दावे सामने आए हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और वास्तविक नुकसान का स्पष्ट आकलन जरूरी है।
अगर क्षेत्र में समुद्री परिवहन बाधित होता है, तो तेल की ढुलाई महंगी हो सकती है। इससे बीमा और परिवहन लागत बढ़ने के साथ आयातक देशों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है।
भारत का तेल आयात बिल पहले ही बढ़ चुका है
महंगे कच्चे तेल का भारत की अर्थव्यवस्था पर असर समझने के लिए आयात के आंकड़ों को देखना जरूरी है।
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच भारत का कच्चा तेल आयात बिल बढ़कर 90.6 अरब डॉलर पहुंच गया। पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में यह लगभग 46.3 प्रतिशत अधिक है।
दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान आयात किए गए तेल की मात्रा में बहुत बड़ा बदलाव नहीं हुआ। भारत ने लगभग 12.27 करोड़ टन कच्चा तेल खरीदा, जबकि पिछले वर्ष समान अवधि में यह आंकड़ा करीब 12.18 करोड़ टन था। इन आंकड़ों से साफ होता है कि देश को लगभग उतना ही तेल खरीदने के लिए कहीं ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है। ऐसे में कीमतों में लगातार बढ़ोतरी विदेशी मुद्रा खर्च बढ़ा सकती है और व्यापार घाटे पर दबाव डाल सकती है।
क्या पेट्रोल-डीजल की कीमतों में होगा बदलाव?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने के बाद आम लोगों की सबसे बड़ी चिंता पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर रहती है।
हालांकि, वैश्विक स्तर पर कीमतें बढ़ने से भारत में तत्काल ईंधन महंगा होना जरूरी नहीं है। खुदरा कीमतें तय होने में कई दूसरे कारण भी महत्वपूर्ण होते हैं।
इनमें तेल खरीदने की औसत लागत, रिफाइनिंग का खर्च, डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति, केंद्र और राज्य सरकारों के कर तथा तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति शामिल हैं।
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है, तो तेल विपणन कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में कंपनियां बढ़े हुए खर्च का कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचा सकती हैं। हालांकि, कीमतों को लेकर अंतिम स्थिति कंपनियों और सरकार के फैसलों पर निर्भर करेगी।
खाने-पीने की चीजों से लेकर उद्योगों तक पड़ सकता है असर
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर केवल वाहन चलाने वाले लोगों तक सीमित नहीं रहता। डीजल महंगा होने पर ट्रकों और अन्य मालवाहक वाहनों का परिचालन खर्च बढ़ सकता है। इससे सब्जियां, फल, अनाज और दूसरी आवश्यक वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने की लागत प्रभावित हो सकती है।
प्लास्टिक, पैकेजिंग, पेंट, रसायन और विमानन जैसे क्षेत्रों में भी पेट्रोलियम उत्पादों का महत्वपूर्ण इस्तेमाल होता है। इनकी लागत बढ़ने पर कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है।
हालांकि, यह जरूरी नहीं कि प्रत्येक उत्पाद की कीमत तुरंत बढ़ जाए। कंपनियां कितनी अतिरिक्त लागत खुद वहन करती हैं और कितनी ग्राहकों से वसूलती हैं, इसी पर वास्तविक असर निर्भर करेगा।
RBI के सामने महंगाई नियंत्रित करने की चुनौती
देश में महंगाई की स्थिति पहले से ही रिजर्व बैंक के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। अक्टूबर 2026 की मौद्रिक नीति बैठक में भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट 0.25 प्रतिशत अंक बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया था। वहीं सितंबर में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत दर्ज की गई।
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए RBI ने औसत महंगाई दर 5.2 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। अब कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से इस अनुमान के सामने अतिरिक्त जोखिम खड़ा हो सकता है।
अगर ईंधन और परिवहन की लागत के कारण महंगाई लगातार बढ़ती है, तो केंद्रीय बैंक को आने वाली बैठकों में ब्याज दरों को लेकर और सतर्क रुख अपनाना पड़ सकता है।
शेयर बाजार और रुपये के लिए भी बढ़ी मुश्किलें
ऊर्जा की कीमतों में तेजी का असर भारतीय वित्तीय बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। गुरुवार को शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में गिरावट दर्ज की गई।
तेल की ऊंची कीमतें विमानन, पेंट, टायर और पेट्रोलियम आधारित उत्पाद बनाने वाली कंपनियों के खर्च को बढ़ा सकती हैं। दूसरी ओर, विदेश से तेल खरीदने के लिए डॉलर की मांग बढ़ने पर रुपये पर दबाव बनने की भी आशंका रहती है।
हालांकि, शेयर बाजार और रुपये की चाल कई आर्थिक तथा वैश्विक कारणों से प्रभावित होती है। इसलिए इनकी हर गिरावट के लिए केवल तेल की कीमतों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
आगे तेल बाजार की दिशा क्या होगी?
आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतें काफी हद तक पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर निर्भर करेंगी।
अगर तनाव कम होता है और तेल आपूर्ति तथा समुद्री व्यापार सामान्य बने रहते हैं, तो कीमतों में राहत देखने को मिल सकती है। इसके विपरीत, ऊर्जा प्रतिष्ठानों या महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर नए हमले बाजार की चिंता और बढ़ा सकते हैं।
भारत के लिए असली चुनौती केवल ब्रेंट क्रूड का 110 डॉलर पार करना नहीं, बल्कि लंबे समय तक तेल की ऊंची कीमतों का बने रहना है। ऐसी स्थिति में देश का आयात खर्च बढ़ने के साथ महंगाई, कारोबारी लागत और घरेलू बजट पर भी असर पड़ सकता है।
