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डॉलर के मुकाबले ₹95.92 तक गिरा रुपया, एक महीने से ज्यादा का निचला स्तर; RBI ने संभाली गिरावट?

भारतीय रुपया मंगलवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.4% गिरकर ₹95.92 तक पहुंच गया, जो एक महीने से अधिक का सबसे कमजोर स्तर है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और अमेरिका में ब्याज दर बढ़ने की उम्मीद ने रुपये पर दबाव बढ़ाया, जबकि traders के मुताबिक RBI की ओर से सरकारी बैंकों ने डॉलर बेचकर गिरावट को सीमित करने की कोशिश की।

डॉलर के मुकाबले ₹95.92 तक गिरा रुपया, एक महीने से ज्यादा का निचला स्तर; RBI ने संभाली गिरावट?
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: Janta Scope

Rupee में तेज गिरावट, डॉलर के मुकाबले ₹95.92 तक पहुंचा

भारतीय रुपये पर एक बार फिर वैश्विक बाजारों का दबाव बढ़ गया है।

मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 0.4% कमजोर होकर ₹95.92 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। यह एक महीने से अधिक समय का इसका सबसे कमजोर स्तर है।

रुपये की कमजोरी के पीछे सबसे बड़ा दबाव अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और अमेरिकी Federal Reserve द्वारा ब्याज दर बढ़ाए जाने की बढ़ती संभावना को माना जा रहा है।

हालांकि रुपये की गिरावट और ज्यादा हो सकती थी। Currency-market traders के मुताबिक सरकारी बैंकों की ओर से डॉलर की बिक्री देखी गई, जिसे बाजार ने Reserve Bank of India के संभावित intervention से जोड़ा।

RBI ने इस specific intervention की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

कच्चा तेल बना रुपये के लिए सबसे बड़ी चिंता

भारत दुनिया के बड़े crude-oil importers में शामिल है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेज वृद्धि रुपये के लिए महत्वपूर्ण जोखिम बन सकती है।

मंगलवार को Brent crude करीब 2% चढ़कर $107.7 प्रति barrel के आसपास पहुंच गया।

सितंबर में अब तक तेल की कीमतों में लगभग 20% की बढ़ोतरी हो चुकी है।

तेल में तेजी के पीछे Saudi Arabian energy infrastructure पर हमलों के बाद supply disruption की आशंका प्रमुख कारणों में रही।

भारत के लिए महंगा crude दोहरी चुनौती पैदा करता है।

पहली, तेल आयात करने वाली कंपनियों को अधिक डॉलर की जरूरत पड़ सकती है, जिससे foreign-exchange market में dollar demand बढ़ती है।

दूसरी, महंगा crude भारत के import bill और domestic inflation पर दबाव बढ़ा सकता है।

इन दोनों परिस्थितियों में रुपया कमजोर होने का जोखिम बढ़ जाता है।

RBI ने रुपये को संभाला? Traders का क्या कहना है

Market participants के मुताबिक मंगलवार को state-run banks डॉलर बेचते दिखाई दिए।

Traders का मानना है कि यह बिक्री संभवतः RBI की ओर से की गई थी ताकि रुपये में अचानक और अत्यधिक गिरावट को रोका जा सके।

एक अलग intraday report में रुपया करीब ₹95.79 प्रति डॉलर के आसपास था और उस समय भी सरकारी बैंकों की dollar selling देखी गई थी।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

RBI आमतौर पर अपने रोजाना foreign-exchange intervention की real-time पुष्टि नहीं करता। इसलिए किसी विशेष trading session में सरकारी बैंकों की dollar selling को RBI intervention मानना market participants का assessment होता है।

इसलिए यह कहना अधिक सटीक है कि RBI के हस्तक्षेप के संकेत मिले, न कि RBI ने आधिकारिक तौर पर intervention की घोषणा की।

Fed की संभावित Rate Hike से Dollar को ताकत

रुपये पर दबाव केवल crude oil से नहीं आया।

अमेरिका में उम्मीद से अधिक inflation ने Federal Reserve की monetary policy को लेकर बाजार की सोच बदल दी है।

Reuters poll में 85% economists ने अनुमान लगाया है कि Fed अपनी 15-16 सितंबर की बैठक में ब्याज दर 25 basis points बढ़ाकर 3.75%-4.00% कर सकता है।

अगर अमेरिकी ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो dollar-denominated assets की relative attractiveness बढ़ सकती है।

इससे emerging-market currencies पर दबाव पड़ सकता है क्योंकि global investors को अमेरिकी assets में बेहतर returns मिलने की संभावना दिखाई देती है।

इसी expectation ने डॉलर को support किया और रुपये सहित कई currencies पर दबाव बढ़ाया।

US Bond Yields भी बढ़ा रहे चिंता

Global bond market भी currency investors के लिए चिंता का कारण बना हुआ है।

अमेरिका की 10-year Treasury yield 5.02% के ऊपर पहुंच गई, जो 2007 के बाद का उच्च स्तर है।

ऊंची US Treasury yields डॉलर को अतिरिक्त समर्थन दे सकती हैं और emerging markets से capital flows के लिए चुनौती पैदा कर सकती हैं।

इसका असर भारत जैसे बाजारों पर currency, bonds और equities—तीनों माध्यमों से पड़ सकता है।

भारत में भी Rate Hike की उम्मीद बढ़ी

महंगे crude और रुपये की कमजोरी का प्रभाव केवल currency market तक सीमित नहीं है।

भारत में August CPI inflation 4.82% रही है। तेल की कीमतों में मौजूदा तेजी के कारण आने वाले महीनों में inflationary pressure बढ़ने की चिंता बनी हुई है।

इसी बीच भारतीय benchmark 10-year government bond yield करीब 7 basis points बढ़कर 7.09% तक पहुंच गई।

Bond yields का बढ़ना इस बात का संकेत है कि बाजार monetary policy और inflation outlook को लेकर अधिक सतर्क हो रहा है।

RBI Liquidity पर भी कर रहा काम

Currency intervention के अलावा RBI banking-system liquidity को नियंत्रित करने के लिए दूसरे उपाय भी कर रहा है।

Central bank लगातार चौथे session में dollar-rupee sell/buy swaps कर रहा है, जिसका उद्देश्य surplus rupee liquidity को manage करना है।

इसके अलावा RBI ने सितंबर के दौरान कुल ₹1 लाख करोड़ के government bonds बेचने की योजना बनाई है।

पहली ₹50,000 करोड़ की bond sale 16 सितंबर के लिए निर्धारित है।

Liquidity कम करने वाले ये कदम इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि banking system में बहुत अधिक surplus liquidity inflation control और monetary transmission को प्रभावित कर सकती है।

RBI के पास कितना Forex Buffer?

रुपये के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच भारत का बड़ा foreign-exchange reserve है।

हालिया आंकड़ों के मुताबिक भारत का forex reserve लगभग $785 billion के record level तक पहुंच चुका है।

यह RBI को जरूरत पड़ने पर currency-market volatility को सीमित करने के लिए पर्याप्त क्षमता देता है।

हालांकि central bank का लक्ष्य आम तौर पर किसी specific exchange rate को स्थायी रूप से तय करना नहीं बल्कि अत्यधिक volatility को नियंत्रित करना होता है।

इसीलिए RBI intervention रुपये की दिशा पूरी तरह बदलने के बजाय अक्सर उसकी गिरावट या तेजी की गति को नियंत्रित करने के रूप में दिखाई देता है।

आगे कहां जा सकता है रुपया?

MUFG के forecast के मुताबिक रुपया आने वाले महीनों में धीरे-धीरे कमजोर हो सकता है।

उसका अनुमान है कि USD/INR:

December 2026 तक ₹95.50
और
June 2027 तक ₹96.50

के आसपास रह सकता है।

लेकिन currency forecasts निश्चित परिणाम नहीं होते। वास्तविक exchange rate crude oil, Federal Reserve policy, RBI intervention, foreign investment flows और geopolitical developments पर निर्भर करेगा।

आम लोगों पर कमजोर रुपये का क्या असर?

रुपये की कमजोरी केवल currency traders की चिंता नहीं है।

अगर डॉलर महंगा होता है तो विदेश से खरीदी जाने वाली कई वस्तुओं और सेवाओं की rupee cost बढ़ सकती है।

इसका असर विशेष रूप से imported crude oil, electronics components, overseas education, foreign travel और dollar-denominated payments पर दिखाई दे सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण indirect impact crude oil के जरिए आता है। अगर महंगा crude लंबे समय तक बना रहता है तो transport और production costs बढ़ सकती हैं, जिससे inflation पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।

दूसरी तरफ, कमजोर रुपया कुछ exporters और dollar revenue कमाने वाली Indian IT companies के लिए currency-conversion benefit दे सकता है।

अब नजर Fed, Oil और RBI पर

रुपये की अगली दिशा तीन बड़े factors तय कर सकते हैं—Federal Reserve का फैसला, crude oil की कीमतें और RBI की intervention strategy

अगर तेल $100 प्रति barrel से काफी ऊपर बना रहता है और अमेरिकी yields ऊंची रहती हैं, तो रुपये पर दबाव जारी रह सकता है।

वहीं RBI के पास record forex reserves होने के कारण market participants उम्मीद कर रहे हैं कि central bank disorderly volatility को नियंत्रित करने के लिए जरूरत पड़ने पर बाजार में सक्रिय रहेगा।

फिलहाल ₹95.92 का स्तर यह संकेत देता है कि crude oil और global interest rates ने भारतीय currency के लिए जोखिम फिर बढ़ा दिया है।


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