मुंबई: भारतीय रुपये ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूत वापसी की है। अगस्त के आखिरी कारोबारी दिन रुपया 0.2% मजबूत होकर 95.1625 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ, जो 5 अगस्त के बाद इसका सबसे मजबूत क्लोजिंग स्तर था। पिछले कारोबारी सत्र में रुपया 95.3775 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था।
रुपये की मजबूती के पीछे शेयर बाजार से जुड़े विदेशी फंड फ्लो, MSCI इंडेक्स रीबैलेंसिंग और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के हस्तक्षेप को प्रमुख कारण माना जा रहा है।
अगस्त में रुपये ने करीब 0.2% की मासिक बढ़त दर्ज की, जबकि जुलाई में भारतीय मुद्रा लगभग 0.8% कमजोर हुई थी।
1 सितंबर को भी रुपये में मजबूती
रुपये की तेजी केवल अगस्त के आखिरी कारोबारी दिन तक सीमित नहीं रही। मंगलवार, 1 सितंबर को शुरुआती कारोबार से पहले भी रुपये में मजबूती देखने को मिली।
ट्रेडर्स और एक फॉरेक्स ब्रोकर के अनुसार, RBI ने स्थानीय स्पॉट मार्केट खुलने से पहले संभवतः डॉलर की बिक्री की। इसके बाद इंटरबैंक ऑर्डर-मैचिंग सिस्टम पर रुपया 95.0250 प्रति डॉलर तक मजबूत हुआ, जबकि पिछला क्लोज 95.1625 था।
इस कदम से रुपया मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण 95 रुपये प्रति डॉलर के स्तर के करीब पहुंच गया।
MSCI रीबैलेंसिंग से आया विदेशी पैसा
रुपये की तेजी में एक महत्वपूर्ण भूमिका MSCI इंडेक्स रीबैलेंसिंग से जुड़े फंड फ्लो की रही।
विदेशी बैंकों की ओर से डॉलर की बिक्री बढ़ने से बाजार में अमेरिकी मुद्रा की सप्लाई बढ़ी और रुपये को समर्थन मिला। बाजार विश्लेषकों ने MSCI रीबैलेंसिंग से लगभग 1 अरब डॉलर के नेट इनफ्लो का अनुमान लगाया है, जिसके बदलाव 1 सितंबर से प्रभावी हो रहे हैं।
MSCI द्वारा कुछ भारतीय शेयरों के इंडेक्स वेट में बदलाव से विदेशी पोर्टफोलियो फंडों को अपनी होल्डिंग एडजस्ट करनी पड़ती है। ऐसे बदलावों के दौरान भारत में डॉलर आने पर घरेलू मुद्रा को अल्पकालिक समर्थन मिल सकता है।
RBI के हस्तक्षेप ने रुपये को दिया सहारा
रुपये की मजबूती के पीछे RBI की भूमिका भी अहम रही।
डीलरों के अनुसार, केंद्रीय बैंक की ओर से डॉलर की बिक्री ने रुपये पर बाहरी दबाव को सीमित करने में मदद की। 31 अगस्त को शुरुआती कमजोरी के बाद दोपहर के आसपास रुपये ने दिशा बदली और तेजी दर्ज की।
हालांकि RBI आमतौर पर किसी निश्चित एक्सचेंज रेट को लक्ष्य बनाने के बजाय मुद्रा बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप करता है।
कच्चे तेल की तेजी के बावजूद मजबूत हुआ रुपया
रुपये की बढ़त इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक परिस्थितियां पूरी तरह उसके पक्ष में नहीं थीं।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और अमेरिका-ईरान तनाव ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बनाने की आशंका पैदा की थी। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, इसलिए महंगा कच्चा तेल आम तौर पर डॉलर की मांग बढ़ाकर रुपये पर दबाव डाल सकता है।
इसके अलावा अमेरिकी फेडरल रिजर्व के चेयरमैन Kevin Warsh की सख्त मौद्रिक नीति से जुड़ी टिप्पणियों के बाद सितंबर में अमेरिकी ब्याज दर बढ़ने की संभावना को लेकर बाजार की उम्मीदें बढ़ी हैं।
इसके बावजूद घरेलू बाजार में डॉलर की बिक्री और विदेशी फंड फ्लो ने रुपये को मजबूती दी।
चार सप्ताह के उच्च स्तर तक कैसे पहुंचा रुपया?
रुपये की हालिया तेजी के पीछे मुख्य रूप से तीन कारकों का मेल दिखाई देता है—MSCI रीबैलेंसिंग से जुड़े विदेशी निवेश प्रवाह, RBI की डॉलर बिक्री और विदेशी बैंकों की ओर से डॉलर की बढ़ी हुई सप्लाई।
इन परिस्थितियों ने कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव जैसे नकारात्मक कारकों के असर को फिलहाल सीमित किया है।
आगे रुपये की चाल किन बातों पर निर्भर करेगी?
रुपये की मौजूदा मजबूती के बावजूद आगे की दिशा कई घरेलू और वैश्विक कारकों पर निर्भर करेगी।
सबसे महत्वपूर्ण संकेत अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति, अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश और RBI की मुद्रा बाजार में रणनीति से मिलेंगे।
De-Risk Forex Consultancy के संस्थापक और मैनेजिंग डायरेक्टर Dhaval Shah के मुताबिक, USD/INR के तकनीकी चार्ट में कमजोरी के संकेत दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने आने वाले कुछ महीनों में 93.50 के आसपास के स्तर को संभावित मजबूत सपोर्ट के रूप में बताया है।
हालांकि यह एक विश्लेषक का बाजार अनुमान है, कोई निश्चित पूर्वानुमान नहीं। तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी, मजबूत अमेरिकी डॉलर या विदेशी पूंजी की निकासी रुपये की मौजूदा तेजी को सीमित कर सकती है।
रुपये की मजबूती का आम लोगों और कंपनियों पर क्या असर?
रुपये में मजबूती जारी रहती है तो आयात आधारित क्षेत्रों को कुछ राहत मिल सकती है। भारत डॉलर में कच्चा तेल और कई अन्य वस्तुएं आयात करता है, इसलिए मजबूत रुपया आयात लागत पर दबाव कम करने में मदद कर सकता है।
इसके विपरीत, डॉलर में कमाई करने वाली निर्यात कंपनियों के लिए बहुत तेज रुपये की मजबूती मुद्रा रूपांतरण से होने वाली आय को प्रभावित कर सकती है।
इसलिए आने वाले दिनों में केवल डॉलर-रुपया स्तर ही नहीं, बल्कि कच्चे तेल, विदेशी निवेश और अमेरिकी मौद्रिक नीति की दिशा भी भारतीय मुद्रा की चाल तय करने में महत्वपूर्ण रहेगी।
