इस आंकड़े को समझते समय दो बातें जरूरी हैं। पहली, यह आठ वर्षों का कुल मूल्य लाभ है। दूसरी, इसमें बॉन्ड से मिलने वाला नियमित ब्याज शामिल नहीं है। निवेशक की वास्तविक कमाई उसकी खरीद कीमत और लागू कर व्यवस्था पर भी निर्भर करेगी।
₹3,096 की खरीद कीमत का क्या है आधार?
वित्त मंत्रालय की 12 अक्टूबर 2018 की विज्ञप्ति के अनुसार, इस सीरीज का सामान्य निर्गम मूल्य ₹3,146 प्रति ग्राम था। आवेदन की अवधि 15 से 19 अक्टूबर 2018 रखी गई थी।
ऑनलाइन आवेदन करके डिजिटल माध्यम से भुगतान करने वाले निवेशकों को ₹50 प्रति ग्राम की छूट मिली थी। इससे उनकी खरीद लागत घटकर ₹3,096 प्रति ग्राम रह गई। इसी रियायती कीमत के मुकाबले आज का मोचन मूल्य रखने पर लगभग 366% लाभ निकलता है। इसलिए सभी खरीदारों का प्रतिशत रिटर्न एक जैसा बताना सही नहीं होगा।
करीब 366% लाभ की गणना कैसे हुई?
₹14,425 के अंतिम मूल्य में से ₹3,096 की शुरुआती लागत घटाने पर प्रति यूनिट ₹11,329 का मूल्य लाभ मिलता है। इसे खरीद लागत से भाग देकर 100 से गुणा करने पर रिटर्न लगभग 365.92% निकलता है।
गणना: (₹14,425 − ₹3,096) ÷ ₹3,096 × 100 = लगभग 365.92%।
जिन निवेशकों ने ₹3,146 की सामान्य कीमत पर बॉन्ड खरीदा था, उनका प्रति यूनिट मूल्य लाभ ₹11,279 और प्रतिशत लाभ लगभग 358.52% बनता है। दोनों मामलों में परिपक्वता पर प्रति यूनिट मिलने वाली राशि समान है; अंतर शुरुआती लागत का है। ये गणनाएं प्रकाशित निर्गम और मोचन मूल्यों पर आधारित हैं। Mint
दस ग्राम के निवेश का उदाहरण
मान लीजिए किसी व्यक्ति ने ऑनलाइन छूट के साथ दस यूनिट खरीदी थीं। उसकी शुरुआती लागत ₹30,960 रही होगी। ₹14,425 प्रति यूनिट के हिसाब से अब उसका अंतिम मोचन मूल्य ₹1,44,250 बनता है। इस तरह केवल कीमत बढ़ने से ₹1,13,290 का लाभ हुआ।
इसी अनुपात में ₹1 लाख की लागत का गणितीय मूल्य लगभग ₹4.66 लाख होता है। हालांकि यह तुलना समझाने वाला उदाहरण है, क्योंकि बॉन्ड की खरीद एक ग्राम की यूनिट और उसके गुणकों में होती है। अलग से मिले ब्याज को इसमें नहीं जोड़ा गया है।
सालाना रिटर्न 366% क्यों नहीं है?
पूरे आठ वर्षों की वृद्धि को सालाना रिटर्न समझना बड़ी भूल होगी। ₹3,096 से ₹14,425 तक बढ़ने की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर, यानी सीएजीआर, लगभग 21.21% निकलती है। यह गणना केवल शुरुआती और अंतिम कीमत पर आधारित है।
इसका अर्थ यह भी नहीं है कि निवेश हर साल ठीक इसी दर से बढ़ा। बीच के वर्षों में कीमतें अलग ढंग से चली होंगी। ब्याज सहित वास्तविक वार्षिक प्रतिफल जानने के लिए उसके भुगतान की तारीखें और रकम भी गणना में रखनी पड़ेंगी।
RBI ने ₹14,425 की कीमत कैसे तय की?
आरबीआई की 22 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति के मुताबिक, अंतिम मोचन मूल्य तय करने में 999 शुद्धता वाले सोने के पिछले तीन कारोबारी दिनों के बंद भावों का साधारण औसत लिया गया। ये भाव इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन, यानी आईबीजेए, प्रकाशित करता है।
इस किस्त के लिए 19, 21 और 22 अक्टूबर 2026 के भाव इस्तेमाल किए गए। इसलिए भुगतान का आधार निर्धारित औसत है; किसी स्थानीय ज्वेलर का बिक्री भाव या आभूषणों की खुदरा कीमत नहीं।
सोने की बढ़ी कीमत के अलावा ब्याज भी
इस योजना की शर्तों के अनुसार, बॉन्ड के अंकित मूल्य पर सालाना 2.50% की निश्चित दर से ब्याज मिलता है। भुगतान हर छह महीने में होता है। यह आय सोने की कीमत बढ़ने से मिलने वाले लाभ से अलग है।
ब्याज की गणना परिपक्वता के ₹14,425 वाले भाव पर नहीं होती। इसलिए बढ़ी हुई अंतिम कीमत पर 2.50% लगाकर पिछले वर्षों का ब्याज निकालना गलत होगा।
कर छूट के लिए खरीद का तरीका अहम
वित्त अधिनियम 2026 के संशोधन के अनुसार, मोचन पर पूंजीगत लाभ की छूट के लिए व्यक्ति का बॉन्ड को मूल निर्गम से परिपक्वता तक रखना जरूरी है। इसलिए शेयर बाजार से बाद में खरीदे गए बॉन्ड पर वही छूट स्वतः लागू नहीं मानी जा सकती। ब्याज आय करयोग्य होती है।
क्या आगे भी इतना लाभ मिल सकता है?
सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड सरकार की ओर से आरबीआई द्वारा जारी, सोने के ग्राम में अंकित प्रतिभूतियां हैं। इनमें भौतिक सोना संभालने की जरूरत नहीं होती। लेकिन सोने का बाजार भाव गिरने पर पूंजीगत नुकसान संभव है। इस सीरीज का प्रदर्शन पिछली अवधि का परिणाम है; अगली किसी खरीद पर समान लाभ की गारंटी नहीं है।
