बुधवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 0.5 प्रतिशत मजबूत होकर *94.46 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ।कारोबार के दौरान यह 94.43 तक पहुंच गया था, जो सितंबर की शुरुआत के बाद इसका सबसे मजबूत स्तर है। महीने की शुरुआत में रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंचने वाली भारतीय मुद्रा के लिए यह सुधार महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जियो प्लेटफॉर्म्स के IPO ने बदला विदेशी मुद्रा बाजार का रुख
रुपये में आई मजबूती की एक बड़ी वजह जियो प्लेटफॉर्म्स का आईपीओ है। मुकेश अंबानी की कंपनी का यह सार्वजनिक निर्गम 21 अक्टूबर को निवेशकों के लिए खुला और शुरुआती दो घंटे से भी कम समय में पूरी तरह सब्सक्राइब हो गया।
करीब 30,213 करोड़ रुपये के इस आईपीओ* को भारतीय शेयर बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा सार्वजनिक निर्गम बताया जा रहा है। कंपनी ने शेयरों के लिए 1,065 से 1,119 रुपये का प्राइस बैंड तय किया है। निवेशक 23 अक्टूबर तक इसमें आवेदन कर सकते हैं।
आईपीओ को लेकर घरेलू निवेशकों के साथ विदेशी संस्थागत निवेशकों में भी उत्साह दिखाई दिया। इससे पहले 19 अक्टूबर को एंकर निवेशकों के लिए रखे गए लगभग 8,110 करोड़ रुपये के हिस्से के मुकाबले करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये की बोलियां प्राप्त हुई थीं। यह मांग उपलब्ध हिस्से की लगभग 31 गुना थी।
विदेशी निवेशकों की इसी भागीदारी का असर मुद्रा बाजार पर भी दिखाई दिया। जब विदेशी संस्थाएं भारतीय शेयरों में निवेश के लिए डॉलर बेचकर रुपये खरीदती हैं, तो बाजार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ती है। डॉलर की उपलब्धता बढ़ने से रुपये को मजबूती मिल सकती है।
हालांकि आईपीओ से जुड़े कुछ निवेशक अल्पकालिक मुद्रा स्वैप का भी उपयोग करते हैं। इसलिए इस तरह के निवेश प्रवाह को रुपये में स्थायी मजबूती की गारंटी नहीं माना जा सकता।
RBI के फैसलों ने भी रुपये को दिया सहारा
भारतीय रुपये की रिकवरी केवल जियो आईपीओ तक सीमित नहीं है। रिजर्व बैंक ने अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में विदेशी मुद्रा बाजार का दबाव कम करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए थे।
केंद्रीय बैंक ने सरकारी तेल कंपनियों के लिए डॉलर खरीदने की विशेष सुविधा शुरू की। इस व्यवस्था के तहत इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम जैसी कंपनियां अपनी जरूरत के लिए सीधे रिजर्व बैंक से डॉलर प्राप्त कर सकती हैं।
इस कदम का उद्देश्य खुले विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की भारी मांग को कम करना है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है और तेल कंपनियों को नियमित रूप से डॉलर खरीदने पड़ते हैं।
इसके अलावा रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा से जुड़े कुछ डेरिवेटिव सौदों पर नियम सख्त किए हैं। निर्धारित श्रेणी के बड़े हेजिंग सौदों के लिए 20 प्रतिशत विदेशी मुद्रा जोखिम रिजर्व रखने की व्यवस्था लागू की गई है। इससे डॉलर की संभावित महंगाई के विरुद्ध सुरक्षा लेने की लागत बढ़ी है।
इन उपायों और मुद्रा बाजार में केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप से रुपये को समर्थन मिला। अक्टूबर की शुरुआत में रिकॉर्ड कमजोरी के करीब पहुंचने के बाद रुपये में दो प्रतिशत से अधिक सुधार दर्ज किया गया है।
कच्चे तेल की महंगाई बनी सबसे बड़ी चुनौती
रुपये की तेजी के बावजूद अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं। बुधवार को ब्रेंट क्रूड का भाव बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया।
मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ा दी है। ऐसे माहौल में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
भारत दुनिया के प्रमुख तेल आयातक देशों में शामिल है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का सीधा असर देश के आयात बिल और डॉलर की मांग पर पड़ता है। यदि तेल महंगा बना रहता है, तो रुपये की मौजूदा रिकवरी की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
महंगे तेल से परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ने की आशंका भी रहती है। इसका असर आगे चलकर महंगाई और घरेलू आर्थिक गतिविधियों पर दिखाई दे सकता है।
शेयर बाजार में गिरावट ने सीमित किया फायदा
बुधवार को विदेशी मुद्रा बाजार और शेयर बाजार की चाल में भी अंतर दिखाई दिया। शुरुआती कारोबार में घरेलू शेयर बाजार में तेजी रही, लेकिन बाद में बिकवाली का दबाव बढ़ गया।
दिन के दौरान निफ्टी 50 में लगभग 0.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। वहीं, अमेरिकी डॉलर सूचकांक करीब 101.8 के स्तर पर बना रहा।
इन परिस्थितियों के बावजूद रुपये का मजबूत बंद होना यह संकेत देता है कि जियो आईपीओ से जुड़े विदेशी निवेश और रिजर्व बैंक के उपायों ने मुद्रा को महत्वपूर्ण समर्थन दिया है।
ब्याज दर और महंगाई पर बाजार की नजर
रुपये की आगे की दिशा तय करने में रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति भी अहम भूमिका निभाएगी।
केंद्रीय बैंक ने 7 अक्टूबर को चार वर्षों में पहली बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी की थी। दूसरी ओर सितंबर में भारत की खुदरा महंगाई बढ़कर 5.54 प्रतिशत पहुंच गई, जिससे भविष्य में ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की संभावनाएं बनी हुई हैं।
अब निवेशकों की नजर रिजर्व बैंक की अक्टूबर मौद्रिक नीति बैठक के विवरण पर है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि महंगाई और रुपये की स्थिरता को लेकर केंद्रीय बैंक आगे क्या रणनीति अपना सकता है।
क्या आने वाले दिनों में और मजबूत होगा रुपया?
विदेशी मुद्रा बाजार के जानकारों के मुताबिक रुपये के लिए फिलहाल स्थितियां पहले की तुलना में बेहतर हुई हैं। सीआर फॉरेक्स के प्रबंध निदेशक अमित पबारी के अनुसार डॉलर-रुपया विनिमय दर में 94.80 के नीचे स्थिरता बनी रहने पर आने वाले सप्ताहों में 94 रुपये प्रति डॉलर की दिशा में बढ़ने की संभावना बन सकती है।
हालांकि यह केवल बाजार का अनुमान है। तेल की कीमतों में बदलाव, विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री और डॉलर की वैश्विक चाल से विनिमय दर में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।
फिलहाल जियो का आईपीओ भारतीय पूंजी बाजार के साथ-साथ विदेशी मुद्रा बाजार में भी चर्चा का केंद्र बन गया है। छह सप्ताह के उच्च स्तर पर पहुंचा रुपया राहत जरूर दे रहा है, लेकिन इस सुधार के लंबे समय तक टिके रहने के लिए विदेशी निवेश का निरंतर प्रवाह और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का अनुकूल रहना आवश्यक होगा।
