शेयर बाजार में गिरावट, सेंसेक्स और निफ्टी लाल निशान में बंद
भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार, 11 अगस्त को निवेशकों का रुख सतर्क दिखाई दिया। कारोबारी सत्र के अंत में प्रमुख बेंचमार्क सूचकांक गिरावट के साथ बंद हुए। सेंसेक्स 388.19 अंक यानी करीब 0.49% कमजोर होकर 78,154.25 पर बंद हुआ। दूसरी ओर निफ्टी 50 करीब 112.10 अंक यानी 0.46% गिरकर 24,471.70 पर आ गया।
बाजार पर दबाव की प्रमुख वजहों में वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी शामिल रही। तेल महंगा होने से भारत जैसी बड़ी ऊर्जा आयातक अर्थव्यवस्था के लिए महंगाई और आयात लागत से जुड़ी चिंताएं बढ़ सकती हैं।
कच्चे तेल की तेजी ने बढ़ाई चिंता
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने घरेलू इक्विटी बाजार की धारणा को प्रभावित किया। ब्रेंट क्रूड करीब 89 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया और कीमतों में 2% से अधिक की तेजी दर्ज की गई।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का असर देश के आयात बिल, रुपये और महंगाई के दृष्टिकोण पर पड़ सकता है।
इसी वजह से तेल की कीमतों में अचानक होने वाली बड़ी हलचल पर शेयर बाजार के निवेशकों की नजर रहती है।
किन सेक्टर्स पर दिखा दबाव?
मंगलवार के कारोबार में कमजोरी पूरे बाजार में एक समान नहीं रही। एफएमसीजी, मेटल और रियल्टी जैसे क्षेत्रों में दबाव देखा गया, जबकि आईटी और फार्मा शेयरों ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया।
इससे संकेत मिला कि निवेशकों ने बाजार से पूरी तरह दूरी बनाने के बजाय चुनिंदा क्षेत्रों में खरीदारी बनाए रखी।
बैंक और बड़ी कंपनियों के शेयरों ने भी बनाया दबाव
बेंचमार्क सूचकांकों की गिरावट में कुछ बड़े शेयरों की कमजोरी का भी योगदान रहा। भारती एयरटेल, एक्सिस बैंक, एचडीएफसी बैंक, लार्सन एंड टुब्रो, रिलायंस इंडस्ट्रीज और बजाज फाइनेंस जैसे प्रमुख शेयर सेंसेक्स पर दबाव डालने वालों में शामिल रहे।
बड़े बाजार पूंजीकरण वाली कंपनियों में गिरावट का प्रमुख सूचकांकों पर अपेक्षाकृत अधिक असर पड़ सकता है।
महंगा कच्चा तेल भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण?
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए कच्चे तेल की कीमतें कई कारणों से महत्वपूर्ण हैं। देश अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेश से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने से ऊर्जा आयात पर खर्च बढ़ सकता है।
यदि ऊंची कीमतें लंबे समय तक बनी रहती हैं तो परिवहन और उत्पादन लागत से लेकर महंगाई तक पर दबाव बनने की आशंका रहती है। इसके अलावा महंगा तेल रुपये पर भी दबाव बढ़ा सकता है।
इसी कारण वैश्विक तेल बाजार में तेजी को घरेलू शेयर बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम संकेतक के रूप में देखा जाता है।
बाजार के लिए आगे क्या महत्वपूर्ण रहेगा?
आने वाले कारोबारी सत्रों में निवेशकों की नजर सबसे पहले कच्चे तेल की दिशा पर रहने की संभावना है। इसके साथ रुपये की चाल, वैश्विक बाजारों के संकेत, महंगाई से जुड़े आंकड़े और कंपनियों के नतीजे भी बाजार की दिशा तय करने में भूमिका निभा सकते हैं।
यदि तेल की कीमतों में नरमी आती है तो घरेलू बाजार को राहत मिल सकती है। इसके विपरीत, कीमतों में लगातार तेजी महंगाई और आर्थिक लागत से जुड़ी चिंताओं को और बढ़ा सकती है।
संतुलित विश्लेषण
सेंसेक्स और निफ्टी की मंगलवार की गिरावट बाजार में बढ़ी सतर्कता को दर्शाती है, लेकिन एक कारोबारी सत्र की कमजोरी को अपने आप में लंबी अवधि के रुझान का संकेत नहीं माना जा सकता।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल फिलहाल एक महत्वपूर्ण बाहरी जोखिम है। दूसरी ओर आईटी और फार्मा जैसे कुछ क्षेत्रों में मजबूती यह दिखाती है कि बाजार के भीतर सेक्टर आधारित अवसर बने हुए हैं।
आगे की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि तेल की तेजी कितने समय तक रहती है और इसका रुपये, महंगाई तथा व्यापक आर्थिक माहौल पर कितना प्रभाव पड़ता है।
