केंद्र सरकार और राज्यों के बीच विकास के लिए धन जुटाने, कृषि में बदलाव, ऊर्जा परिवर्तन और वस्तु एवं सेवा कर सुधारों के प्रभाव जैसे बड़े आर्थिक मुद्दों पर आज से नई दिल्ली में दो दिन की महत्वपूर्ण बैठक शुरू हो रही है।
केंद्रीय वित्त मंत्रालय 18 और 19 सितंबर 2026 को राज्यों और विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेशों के वित्त मंत्रियों तथा वित्त सचिवों का सम्मेलन आयोजित कर रहा है। सम्मेलन का विषय “विकसित भारत की ओर भारत की यात्रा का वित्तपोषण” रखा गया है। केंद्रीय वित्त एवं कंपनी मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण इसमें मौजूद रहेंगी। कई राज्यों के मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी भी इसमें भाग लेंगे।
यह बैठक केवल राज्यों की वित्तीय जरूरतों पर चर्चा तक सीमित नहीं है। आधिकारिक कार्यसूची से पता चलता है कि केंद्र और राज्य इस बात पर विचार करेंगे कि आने वाले वर्षों में तेज आर्थिक वृद्धि के लिए आवश्यक पूंजी कहां से आएगी और सरकारी संसाधनों के साथ निजी पूंजी की भूमिका कैसे बढ़ाई जा सकती है।
बैठक का समय भी महत्वपूर्ण है। केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष में राज्यों के लिए बड़े पैमाने पर कर हस्तांतरण और पूंजीगत सहायता का प्रावधान किया है। दूसरी ओर, राज्यों को कृषि, ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और सामाजिक योजनाओं पर बढ़ती वित्तीय जरूरतों का सामना करना पड़ रहा है।
तीन बड़े विषयों पर केंद्रित रहेगा सम्मेलन
वित्त मंत्रालय के मुताबिक सम्मेलन को तीन मुख्य विषयगत सत्रों में बांटा गया है।
पहला सत्र व्यापक आर्थिक स्थिति पर होगा। इसमें भारत की अर्थव्यवस्था के दीर्घकालीन लक्ष्यों, विकास के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों और विकसित भारत की दिशा में आर्थिक पड़ावों पर चर्चा होगी।
दूसरा सत्र कृषि परिवर्तन के वित्तपोषण पर केंद्रित होगा। इसमें कृषि बाजार और विपणन व्यवस्था के लिए धन जुटाने के साथ ऐसी कृषि व्यवस्था विकसित करने पर चर्चा होगी जो बदलती परिस्थितियों और संसाधनों से जुड़ी चुनौतियों का बेहतर सामना कर सके।
तीसरा बड़ा विषय ऊर्जा परिवर्तन का वित्तपोषण होगा। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा, बिजली पारेषण परिसंपत्तियों और कार्बन को पकड़ने, उपयोग करने तथा भंडारण से जुड़ी तकनीकों के लिए पूंजी की जरूरत पर विचार किया जाएगा।
इसका अर्थ है कि बैठक में केवल सरकारी बजट से पैसा खर्च करने पर चर्चा नहीं होगी। असली सवाल यह भी है कि भारत की दीर्घकालीन विकास जरूरतों में सरकारी और निजी पूंजी को किस तरह जोड़ा जाए।
वस्तु एवं सेवा कर सुधारों का राज्यों पर प्रभाव भी चर्चा में
सम्मेलन के लिए प्रतिभागियों को कई पृष्ठभूमि पत्र दिए गए हैं। इनमें वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था में हुए नए बदलावों का राज्यों पर प्रभाव भी शामिल है।
इसके अलावा विकसित भारत के लिए निजी वित्तपोषण, कृषि बाजारों के वित्तपोषण, टिकाऊ कृषि, नवीकरणीय ऊर्जा, बिजली पारेषण और कार्बन प्रबंधन जैसे विषयों पर भी पृष्ठभूमि सामग्री तैयार की गई है।
यह पहलू राज्यों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि उनकी वित्तीय क्षमता का बड़ा हिस्सा कर राजस्व, केंद्र से मिलने वाले कर हस्तांतरण और विभिन्न अनुदानों पर निर्भर करता है।
कर व्यवस्था में किसी बड़े बदलाव का सवाल केवल उपभोक्ताओं या उद्योगों पर पड़ने वाले असर तक सीमित नहीं रहता। राज्यों के लिए यह भी देखना जरूरी होता है कि उससे उनके राजस्व संग्रह और खर्च करने की क्षमता पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
हालांकि सम्मेलन शुरू होने से पहले यह मान लेना सही नहीं होगा कि किसी विशेष कर परिवर्तन या राज्यों के लिए नए वित्तीय पैकेज पर फैसला होना तय है। वित्त मंत्रालय ने इसे नीतिगत चर्चा का विषय बताया है, किसी पूर्वनिर्धारित निर्णय के रूप में नहीं।
राज्यों को इस साल कितना पैसा मिलना है?
केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों को समझने के लिए 2026-27 के केंद्रीय बजट के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं।
सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 में राज्यों को केंद्रीय करों में हिस्सेदारी के रूप में करीब ₹15.26 लाख करोड़ देने का अनुमान रखा है। संशोधित अनुमान के अनुसार 2025-26 में यह राशि लगभग ₹13.93 लाख करोड़ थी।
इसके अलावा वित्त आयोग के माध्यम से राज्यों को दिए जाने वाले अनुदान का अनुमान करीब ₹1.40 लाख करोड़ है।
इस तरह कर हस्तांतरण और वित्त आयोग के अनुदानों को मिलाकर 2026-27 में राज्यों के साथ करीब ₹16.56 लाख करोड़ के संसाधन साझा किए जाने का अनुमान है।
ये आंकड़े बताते हैं कि केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय समन्वय भारत की विकास रणनीति का कितना बड़ा हिस्सा है।
राज्यों के पास स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, सड़क, बिजली और स्थानीय बुनियादी ढांचे जैसी कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं। इसलिए विकसित भारत जैसे दीर्घकालीन लक्ष्य को केवल केंद्र सरकार के खर्च के आधार पर हासिल करना व्यावहारिक नहीं होगा।
पूंजीगत खर्च में भी राज्यों की भूमिका बड़ी
केंद्र सरकार ने 2026-27 के लिए कुल खर्च लगभग ₹53.47 लाख करोड़ रखा है। इसमें लगभग ₹12.22 लाख करोड़ पूंजीगत खर्च के लिए निर्धारित है।
इसके भीतर राज्यों को पूंजीगत खर्च के लिए विशेष सहायता योजना के तहत ₹2 लाख करोड़ का प्रावधान भी शामिल है।
केंद्र सरकार का प्रभावी पूंजीगत खर्च 2026-27 में करीब ₹17.15 लाख करोड़ रहने का अनुमान है। इसमें प्रत्यक्ष पूंजीगत खर्च के साथ ऐसी अनुदान सहायता भी शामिल है जिससे पूंजीगत परिसंपत्तियां बनाई जाती हैं।
यह पृष्ठभूमि मौजूदा सम्मेलन को ज्यादा महत्वपूर्ण बनाती है।
सड़क, बिजली, जल व्यवस्था, शहरी ढांचा, कृषि भंडारण और ऊर्जा परियोजनाओं जैसी परिसंपत्तियों का बड़ा हिस्सा राज्यों के स्तर पर तैयार होता है। इसलिए केंद्र की ओर से पूंजीगत खर्च बढ़ाने के बावजूद परियोजनाओं को जमीन पर उतारने की क्षमता राज्यों की वित्तीय स्थिति और प्रशासनिक क्षमता पर निर्भर करती है।
निजी पूंजी पर चर्चा क्यों अहम है?
सम्मेलन की आधिकारिक सामग्री में विकसित भारत के लिए निजी वित्तपोषण को अलग विषय के रूप में शामिल किया गया है।
यह संकेत देता है कि सरकार दीर्घकालीन विकास की पूरी लागत सरकारी बजट से उठाने के बजाय निजी निवेश को भी महत्वपूर्ण मान रही है।
इसकी आवश्यकता ऊर्जा परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में और स्पष्ट हो जाती है। नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन के साथ बिजली पारेषण व्यवस्था, ऊर्जा भंडारण और नई कार्बन प्रबंधन तकनीकों में बड़े निवेश की जरूरत पड़ सकती है।
इसी तरह कृषि परिवर्तन का अर्थ केवल किसानों को सहायता देना नहीं है। कृषि बाजार, भंडारण, आपूर्ति शृंखला, जल प्रबंधन और टिकाऊ खेती से जुड़ी परियोजनाओं के लिए भी दीर्घकालीन निवेश की आवश्यकता होती है।
यही कारण है कि केंद्र और राज्यों के सामने सवाल केवल “कितना खर्च किया जाए” का नहीं, बल्कि “पूंजी कहां से आए और उसका उपयोग कैसे किया जाए” का भी है।
बैठक में कौन रखेगा आर्थिक दृष्टिकोण?
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में आर्थिक मामलों के विभाग की सचिव अनुराधा ठाकुर बैठक के उद्देश्यों की जानकारी देंगी।
15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष रहे और इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ के अध्यक्ष तथा आजीवन न्यासी एन. के. सिंह उद्घाटन सत्र में मुख्य संबोधन देंगे।
महाराष्ट्र सरकार के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव और वित्त सचिव सुधीर श्रीवास्तव राज्यों के दृष्टिकोण से विकसित भारत के वित्तपोषण पर अपनी बात रखेंगे।
इसके अतिरिक्त सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव डॉ. सौरभ गर्ग विकास के परिणामों को मापने के महत्व पर बात करेंगे।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन बेहतर शासन में नई तकनीकों की भूमिका पर विचार रखेंगे।
इससे साफ है कि बैठक में वित्तीय संसाधनों के साथ यह सवाल भी शामिल है कि सरकारी नीतियों के वास्तविक परिणामों को कैसे मापा जाए और तकनीक के जरिए शासन को अधिक प्रभावी कैसे बनाया जाए।
JantaScope विश्लेषण: असली परीक्षा केंद्र-राज्य तालमेल की
इस सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद कोई एक योजना या वित्तीय घोषणा नहीं, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच विकास के लिए धन जुटाने की साझा व्यवस्था तैयार करना है।
केंद्र सरकार के पास राष्ट्रीय स्तर पर कर और उधारी जुटाने की बड़ी क्षमता है, जबकि राज्यों के पास जमीन पर विकास परियोजनाओं को लागू करने की बड़ी जिम्मेदारी है।
2026-27 में राज्यों के लिए कर हस्तांतरण और वित्त आयोग अनुदानों के जरिए ₹16.56 लाख करोड़ के अनुमानित संसाधन तथा पूंजीगत सहायता के लिए ₹2 लाख करोड़ का प्रावधान इस संबंध की वित्तीय गहराई दिखाता है।
लेकिन केवल ज्यादा धन उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं होगा।
कृषि परिवर्तन, स्वच्छ ऊर्जा और बुनियादी ढांचे जैसी जरूरतें कई वर्षों तक लगातार निवेश मांगेंगी। साथ ही केंद्र और राज्यों दोनों को राजकोषीय अनुशासन भी बनाए रखना होगा।
इसलिए 18-19 सितंबर का सम्मेलन किसी एक बजट बैठक की तरह देखने के बजाय लंबी अवधि की वित्तीय रणनीति तैयार करने की कोशिश के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
फिलहाल वित्त मंत्रालय ने किसी नए वित्तीय पैकेज, राज्यों की उधारी सीमा में बदलाव या किसी विशेष धनराशि की घोषणा नहीं की है। इसलिए सम्मेलन से पहले ऐसे किसी संभावित निर्णय को तय मानना उचित नहीं होगा।
दो दिनों की चर्चा के बाद असली संकेत इस बात से मिलेगा कि केंद्र और राज्य विकास के बड़े लक्ष्यों को वित्तीय संसाधनों, निजी निवेश और राज्यों की वास्तविक खर्च क्षमता के साथ जोड़ने के लिए किन ठोस नीतिगत रास्तों पर सहमति बनाते हैं।
