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LIC OFS: केंद्र का बड़ा संकेत, अगले 2-3 साल तक LIC में और हिस्सेदारी बेचने की योजना नहीं

भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) में मौजूदा ऑफर फॉर सेल (OFS) के बाद केंद्र सरकार फिलहाल अगले दो से तीन वर्षों तक अपनी हिस्सेदारी में और कटौती करने की योजना नहीं बना रही है। यह संकेत ऐसे समय आया है जब सरकार LIC में अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा बेचकर कंपनी की पब्लिक शेयरहोल्डिंग बढ़ाने की दिशा में कदम उठा रही है।

LIC OFS: केंद्र का बड़ा संकेत, अगले 2-3 साल तक LIC में और हिस्सेदारी बेचने की योजना नहीं
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: Moneycontrol

LIC OFS के बाद लंबा अंतराल संभव

केंद्र सरकार ने LIC में मौजूदा हिस्सेदारी बिक्री के बाद निकट भविष्य में एक और बड़ी शेयर बिक्री की संभावना को फिलहाल खारिज कर दिया है। सरकार की ओर से संकेत है कि अगले दो से तीन वर्षों तक LIC में अतिरिक्त हिस्सेदारी बिक्री की जरूरत नहीं पड़ सकती।

इस रुख का महत्व इसलिए भी है क्योंकि LIC भारत की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी है और इसमें सरकार की हिस्सेदारी अब भी बहुत अधिक है। किसी भी बड़े सरकारी विनिवेश का असर न केवल सरकारी प्राप्तियों पर, बल्कि LIC के शेयरों की बाजार में उपलब्धता और निवेशकों की धारणा पर भी पड़ता है।

मौजूदा OFS क्यों महत्वपूर्ण है?

सरकार ने मौजूदा OFS के जरिए LIC में अधिकतम 6.5% हिस्सेदारी बेचने की योजना बनाई है। पूरी हिस्सेदारी बिकने की स्थिति में सरकार को करीब ₹31,400 करोड़ मिल सकते हैं।

इस बिक्री के बाद LIC में पब्लिक शेयरहोल्डिंग मौजूदा लगभग 3.5% से बढ़कर करीब 10% तक पहुंच सकती है। इससे शेयर बाजार में LIC के शेयरों की उपलब्धता और ट्रेडिंग लिक्विडिटी बढ़ने की संभावना है।

LIC मई 2022 में शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुई थी। उसके बाद यह सरकार की ओर से कंपनी में पहली बड़ी हिस्सेदारी बिक्री है।

निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है फैसला?

यदि सरकार वास्तव में अगले दो से तीन साल तक LIC में कोई अतिरिक्त हिस्सेदारी नहीं बेचती है, तो बाजार में सरकारी शेयरों की नई बड़ी सप्लाई को लेकर बनी अनिश्चितता कुछ समय के लिए कम हो सकती है।

आमतौर पर किसी बड़ी कंपनी में प्रमोटर की ओर से लगातार हिस्सेदारी बिक्री की आशंका शेयर कीमत पर दबाव पैदा कर सकती है। ऐसे में लंबा अंतराल निवेशकों को कंपनी के कारोबारी प्रदर्शन, मुनाफे और भविष्य की रणनीति पर अधिक ध्यान केंद्रित करने का अवसर दे सकता है।

हालांकि, शेयर की दिशा केवल सरकारी हिस्सेदारी बिक्री पर निर्भर नहीं करेगी। LIC के वित्तीय नतीजे, बीमा कारोबार की वृद्धि, नए बिजनेस प्रीमियम, बाजार हिस्सेदारी, निवेश पोर्टफोलियो का प्रदर्शन और व्यापक शेयर बाजार की परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण रहेंगी।

OFS की घोषणा के बाद LIC शेयरों पर दबाव

सरकार की हिस्सेदारी बिक्री की घोषणा के बाद LIC के शेयरों में दबाव देखने को मिला। OFS में बाजार भाव की तुलना में कम फ्लोर प्राइस रखे जाने से निवेशकों की प्रतिक्रिया प्रभावित हुई और शेयर में तेज गिरावट दर्ज की गई।

बड़े OFS में डिस्काउंट निवेशकों को आकर्षित करने में मदद कर सकता है, लेकिन इससे अल्पावधि में खुले बाजार में शेयर की कीमत पर दबाव भी बन सकता है।

सरकार के विनिवेश कार्यक्रम में LIC की भूमिका

LIC जैसी बड़ी सरकारी कंपनी में हिस्सेदारी बिक्री केंद्र की व्यापक विनिवेश रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण है। सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में हिस्सेदारी बिक्री के जरिए राजस्व जुटाने के साथ-साथ बाजार में सार्वजनिक भागीदारी बढ़ाने की कोशिश करती रही है।

LIC के मामले में चुनौती इसके विशाल आकार की है। बहुत बड़ी मात्रा में शेयर एक साथ बाजार में आने से कीमत और निवेशक मांग प्रभावित हो सकती है। इसलिए हिस्सेदारी बिक्री का समय और आकार बाजार परिस्थितियों को देखते हुए तय करना महत्वपूर्ण रहता है।

संतुलित विश्लेषण

अगले दो से तीन वर्षों तक अतिरिक्त हिस्सेदारी बिक्री नहीं करने का संकेत मौजूदा शेयरधारकों के लिए सकारात्मक माना जा सकता है, क्योंकि इससे निकट अवधि में शेयरों की नई सरकारी सप्लाई का जोखिम घटता है।

दूसरी ओर, सरकार को भविष्य में नियामकीय आवश्यकताओं और अपनी विनिवेश नीति को ध्यान में रखते हुए LIC में सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए फिर कदम उठाने पड़ सकते हैं। इसलिए मौजूदा संकेत को स्थायी नीति के बजाय मध्यम अवधि की रणनीति के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

निवेशकों के लिए आगे का प्रमुख सवाल यह होगा कि OFS के बाद बढ़ी हुई सार्वजनिक हिस्सेदारी LIC के शेयरों की लिक्विडिटी और संस्थागत निवेशकों की भागीदारी को किस हद तक बढ़ाती है।

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