नेट-जीरो की दिशा में कार्बन क्रेडिट पर बढ़ रहा इंडिया इंक का ध्यान
भारतीय कॉरपोरेट जगत यानी इंडिया इंक नेट-जीरो लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में कार्बन क्रेडिट की भूमिका पर विचार कर रहा है। कंपनियों पर अब केवल लंबी अवधि के पर्यावरणीय लक्ष्य घोषित करने के बजाय उत्सर्जन कम करने की दिशा में ठोस और मापने योग्य प्रगति दिखाने का दबाव भी बढ़ रहा है।
कंपनियों के सामने चुनौती केवल भविष्य के लिए नेट-जीरो लक्ष्य तय करने की नहीं है। उन्हें मैन्युफैक्चरिंग, ऊर्जा खपत, परिवहन, सप्लाई चेन और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के व्यावहारिक रास्ते भी तलाशने होंगे।
इसी प्रक्रिया में कार्बन क्रेडिट एक अतिरिक्त विकल्प के रूप में सामने आ रहे हैं।
क्या होते हैं कार्बन क्रेडिट?
सामान्य रूप से एक कार्बन क्रेडिट ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की उस निर्धारित मात्रा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे किसी योग्य परियोजना या गतिविधि के जरिए कम किया गया हो, रोका गया हो या वातावरण से हटाया गया हो।
कंपनियां अपनी जलवायु रणनीति के हिस्से के रूप में ऐसे क्रेडिट खरीद सकती हैं, खासकर उन उत्सर्जनों के लिए जिन्हें मौजूदा तकनीक या आर्थिक परिस्थितियों के कारण तुरंत समाप्त करना कठिन हो।
कार्बन क्रेडिट से जुड़ी परियोजनाओं में नवीकरणीय ऊर्जा, वन संरक्षण, मीथेन उत्सर्जन में कमी, ऊर्जा दक्षता और वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने जैसी गतिविधियां शामिल हो सकती हैं।
हालांकि, कार्बन क्रेडिट खरीदना किसी कंपनी के अपने परिचालन से होने वाले वास्तविक उत्सर्जन को कम करने के बराबर नहीं माना जा सकता।

भारतीय कंपनियां कार्बन क्रेडिट पर क्यों कर रही हैं विचार?
उत्सर्जन में बड़े स्तर पर कमी लाने के लिए कंपनियों को अपने कामकाज में महत्वपूर्ण बदलाव करने पड़ सकते हैं।
इसमें स्वच्छ ऊर्जा अपनाना, ऊर्जा दक्षता बढ़ाना, उत्पादन प्रक्रियाओं में बदलाव करना, कम कार्बन वाली तकनीकों में निवेश करना और सप्लाई चेन से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए आपूर्तिकर्ताओं के साथ काम करना शामिल हो सकता है।
कुछ उद्योगों में ऐसे उत्सर्जन भी होते हैं जिन्हें मौजूदा तकनीकों के जरिए पूरी तरह समाप्त करना काफी मुश्किल या महंगा हो सकता है।
ऐसी परिस्थितियों में कार्बन क्रेडिट कंपनियों को उन कठिन उत्सर्जनों से निपटने के लिए एक अतिरिक्त माध्यम प्रदान कर सकते हैं, जबकि वे लंबी अवधि में अपने कारोबार को कम-कार्बन मॉडल में बदलने की दिशा में निवेश जारी रखें।
वास्तविक उत्सर्जन कटौती का विकल्प नहीं कार्बन क्रेडिट
कार्बन क्रेडिट में बढ़ती दिलचस्पी के साथ एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि कंपनियां उनका इस्तेमाल किस तरह करती हैं।
यदि कोई कंपनी अपने वास्तविक उत्सर्जन में पर्याप्त कमी किए बिना केवल कार्बन क्रेडिट खरीदकर नेट-जीरो लक्ष्य हासिल करने का दावा करती है, तो उसकी जलवायु रणनीति की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं।
एक मजबूत नेट-जीरो रणनीति में प्रत्यक्ष उत्सर्जन कटौती को प्राथमिकता देना महत्वपूर्ण है।
इसके लिए कंपनियां स्वच्छ बिजली, ऊर्जा दक्षता, कम-कार्बन तकनीक और सप्लाई चेन में बदलाव जैसे कदम उठा सकती हैं। इसके बाद उन उत्सर्जनों के लिए कार्बन क्रेडिट की पूरक भूमिका हो सकती है जिन्हें तत्काल समाप्त करना संभव नहीं है।
कार्बन क्रेडिट की गुणवत्ता और पारदर्शिता महत्वपूर्ण
कार्बन बाजार की विश्वसनीयता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि खरीदे और बेचे जाने वाले क्रेडिट वास्तव में कितने प्रभावी हैं।
कंपनियों के लिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि जिस परियोजना से कार्बन क्रेडिट तैयार हुए हैं, वह वास्तविक, मापने योग्य और टिकाऊ पर्यावरणीय लाभ प्रदान करती हो।
क्रेडिट का स्वतंत्र सत्यापन, सही कार्बन गणना और एक ही उत्सर्जन कटौती को दो बार गिने जाने से रोकना जैसी व्यवस्थाएं इसकी विश्वसनीयता के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
कम गुणवत्ता वाले क्रेडिट कंपनियों के लिए प्रतिष्ठा संबंधी जोखिम भी पैदा कर सकते हैं, खासकर तब जब उनके आधार पर बड़े पर्यावरणीय दावे किए जाएं।
इंडिया इंक के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
भारत के कॉरपोरेट क्षेत्र में नेट-जीरो और कार्बन उत्सर्जन को लेकर बढ़ती सक्रियता व्यापक ऊर्जा बदलाव के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
बड़ी कंपनियां केवल अपने कारखानों और कार्यालयों के जरिए ही पर्यावरण पर प्रभाव नहीं डालतीं। उनकी सप्लाई चेन, परिवहन नेटवर्क, ऊर्जा खरीद और निवेश से जुड़े फैसलों का असर भी व्यापक हो सकता है।
इसलिए प्रमुख कंपनियों द्वारा लिए गए जलवायु संबंधी फैसले पूरे औद्योगिक तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं।
यदि कार्बन क्रेडिट कॉरपोरेट जलवायु रणनीतियों का बड़ा हिस्सा बनते हैं, तो उन्हें चुनने, सत्यापित करने और रिपोर्ट करने के मानक भी उतने ही महत्वपूर्ण होंगे।
संतुलित विश्लेषण
कार्बन क्रेडिट कंपनियों को उन क्षेत्रों में कुछ लचीलापन प्रदान कर सकते हैं, जहां उत्सर्जन में तत्काल कटौती तकनीकी रूप से कठिन या आर्थिक रूप से महंगी है। इसके अलावा, अच्छी गुणवत्ता वाला कार्बन बाजार ऐसी परियोजनाओं तक निजी पूंजी पहुंचाने में मदद कर सकता है जो ग्रीनहाउस गैसों को कम करने या वातावरण से हटाने का काम करती हैं।
इसके बावजूद कार्बन क्रेडिट की सबसे प्रभावी भूमिका प्रत्यक्ष उत्सर्जन कटौती के पूरक के रूप में हो सकती है, उसके विकल्प के रूप में नहीं।
इंडिया इंक के सामने इसलिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती सही संतुलन बनाने की होगी। कंपनियों को अपने परिचालन से होने वाले उत्सर्जन में तेजी से कमी लाने के साथ यह भी तय करना होगा कि जिन उत्सर्जनों को फिलहाल समाप्त नहीं किया जा सकता, उनके लिए कार्बन क्रेडिट का जिम्मेदारी और पारदर्शिता के साथ किस हद तक इस्तेमाल किया जाए।
आखिरकार, कॉरपोरेट नेट-जीरो प्रतिबद्धताओं की विश्वसनीयता केवल खरीदे गए कार्बन क्रेडिट की संख्या से तय नहीं होगी। असली कसौटी यह होगी कि कंपनियां अपने कुल जलवायु प्रभाव और वास्तविक उत्सर्जन में कितनी मापने योग्य, पारदर्शी और स्थायी कमी ला पाती हैं।
