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RBI ने महंगाई पर जताई चिंता: 5.54% पहुंची खुदरा महंगाई, घरेलू मांग बनी भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत

भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक चुनौतियों के बावजूद मजबूती दिखा रही है, लेकिन बढ़ती महंगाई ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के अक्टूबर 2026 बुलेटिन में प्रकाशित 'State of the Economy' विश्लेषण के अनुसार, घरेलू मांग, सेवा क्षेत्र की गतिविधियां और निर्यात आर्थिक विकास को सहारा दे रहे हैं। दूसरी ओर, पश्चिम एशिया में तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और खाद्य वस्तुओं की बढ़ती महंगाई भविष्य की आर्थिक रफ्तार को प्रभावित कर सकती हैं।

RBI ने महंगाई पर जताई चिंता: 5.54% पहुंची खुदरा महंगाई, घरेलू मांग बनी भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत
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द्वारा साधना गुप्ता

स्रोत: reserve bank of india, times of india , PTI,

23 अक्टूबर को जारी इस बुलेटिन में अर्थव्यवस्था की मजबूती के साथ उन जोखिमों की भी पहचान की गई है, जिनका असर आने वाले महीनों में आम उपभोक्ताओं, कारोबारियों और निवेशकों पर पड़ सकता है।

सितंबर में खुदरा महंगाई बढ़कर 5.54% पहुंची

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2026 में भारत की खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत हो गई। अगस्त में यह 4.83 प्रतिशत थी। खाद्य महंगाई भी सितंबर में बढ़कर 7.74 प्रतिशत पहुंच गई।यह बढ़ोतरी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि महंगाई का दबाव अब केवल कुछ खाद्य वस्तुओं तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा। ईंधन और खाद्य पदार्थों के अलावा अन्य वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी के संकेत मिले हैं।महंगाई का दायरा बढ़ना मौद्रिक नीति के लिए चुनौती है, क्योंकि इससे परिवारों की वास्तविक खरीद क्षमता कमजोर हो सकती है।

खाने-पीने की चीजों की कीमतें बनीं बड़ी चिंता

खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी महंगाई का प्रमुख कारण बनी हुई है। अनाज, दालें, खाद्य तेल और कुछ सब्जियों की कीमतों में दबाव ने घरेलू बजट को प्रभावित किया है।सितंबर के सरकारी आंकड़ों में ग्रामीण खुदरा महंगाई 6.08 प्रतिशत और शहरी महंगाई 4.88 प्रतिशत दर्ज हुई।अक्टूबर बुलेटिन के विश्लेषण में कमजोर और असमान मानसून को कृषि उत्पादन के लिए जोखिम बताया गया है। कुछ क्षेत्रों में कम बारिश के कारण फसलों की पैदावार प्रभावित होने की आशंका है। हालांकि पर्याप्त खाद्यान्न भंडार संभावित आपूर्ति संकट से राहत दिलाने में मदद कर सकता है।

पश्चिम एशिया का तनाव क्यों बढ़ा रहा है जोखिम?

वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने एक और चुनौती है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव बढ़ा है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए तेल महंगा होने पर परिवहन, उत्पादन और आयात लागत बढ़ने की आशंका रहती है।

इन अतिरिक्त खर्चों का कुछ हिस्सा कंपनियां ग्राहकों तक पहुंचा सकती हैं, जिससे महंगाई लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती है। मजबूत अमेरिकी डॉलर और वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता भी भारतीय रुपये तथा विदेशी पूंजी प्रवाह के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।

घरेलू मांग ने अर्थव्यवस्था को कैसे संभाला?

इन चुनौतियों के बीच भारत की सबसे बड़ी ताकत घरेलू मांग बनी हुई है। उपभोक्ता खर्च, निजी निवेश और सेवा क्षेत्र की गतिविधियों से आर्थिक विकास को समर्थन मिल रहा है। बैंकिंग, संचार, परिवहन और अन्य सेवाओं में गतिविधियां व्यापक आर्थिक रफ्तार बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। RBI के विश्लेषण के अनुसार, उद्योग और सेवा क्षेत्र से जुड़े उच्च आवृत्ति वाले आर्थिक संकेतक मजबूती दर्शाते हैं। हालांकि लगातार बढ़ती महंगाई घरेलू खपत के लिए जोखिम बन सकती है। आवश्यक वस्तुओं पर अधिक खर्च होने से परिवार दूसरी खरीदारी कम कर सकते हैं।

निर्यात और विदेशी निवेश से मिली राहत

भारतीय अर्थव्यवस्था के बाहरी क्षेत्र से भी सकारात्मक संकेत मिले हैं। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में वस्तु निर्यात में दोहरे अंकों की वृद्धि दर्ज हुई, जिससे व्यापार घाटा कम करने में मदद मिली। अगस्त में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, बाहरी वाणिज्यिक उधारी और विदेशों से आने वाली धनराशि के प्रवाह में भी मजबूती देखी गई। विदेशी मुद्रा भंडार में पर्याप्त उपलब्धता बाहरी आर्थिक झटकों को संभालने में उपयोगी हो सकती है। हालांकि वैश्विक बाजारों में अचानक बदलाव का प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं होता।

RBI ने रेपो रेट बढ़ाकर 5.50% किया

महंगाई के जोखिमों को देखते हुए RBI की मौद्रिक नीति समिति ने 7 अक्टूबर 2026 को रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत अंक की वृद्धि की थी। इसके बाद प्रमुख नीतिगत दर 5.50 प्रतिशत हो गई। समिति ने अपना नीतिगत रुख भी बदलकर 'Calibrated Tightening' किया। इसका उद्देश्य बढ़ती महंगाई और महंगाई संबंधी उम्मीदों को नियंत्रित करना है। रेपो रेट बढ़ने से बैंकों के लिए धन की लागत प्रभावित हो सकती है। हालांकि होम लोन, कार लोन या व्यक्तिगत कर्ज की EMI पर वास्तविक असर संबंधित बैंक की ब्याज दर और ऋण की शर्तों पर निर्भर करेगा।

विकास दर को लेकर क्या है अनुमान?

RBI ने अक्टूबर की मौद्रिक नीति समीक्षा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक GDP वृद्धि का अनुमान 7.1 प्रतिशत रखा था। वित्त वर्ष की पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था ने 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की थी। मजबूत घरेलू खपत और निवेश आर्थिक विकास को समर्थन दे रहे हैं, लेकिन ऊंची ऊर्जा कीमतें, कमजोर मानसून तथा वैश्विक व्यापार संबंधी अनिश्चितताएं भविष्य की वृद्धि पर दबाव डाल सकती हैं। इसीलिए विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखना नीति निर्माताओं की प्राथमिक चुनौती है।

आम लोगों और निवेशकों पर क्या पड़ेगा असर?

अगर खाद्य और ईंधन की कीमतें ऊंची रहती हैं, तो परिवारों की मासिक बचत प्रभावित हो सकती है। वहीं अधिक लागत और ब्याज दरों का दबाव कारोबारियों की निवेश योजनाओं पर असर डाल सकता है। शेयर बाजार में भी ब्याज दरों, कंपनियों की कमाई और विदेशी निवेश के रुझान महत्वपूर्ण रहेंगे। हालांकि मजबूत घरेलू मांग और आर्थिक गतिविधियां कंपनियों के कारोबार को सहारा दे सकती हैं।

मजबूत अर्थव्यवस्था, लेकिन सतर्कता जरूरी

RBI के अक्टूबर बुलेटिन से भारतीय अर्थव्यवस्था की मिली-जुली तस्वीर सामने आती है। एक तरफ घरेलू मांग, निवेश और सेवाओं का विस्तार विकास को गति दे रहा है, वहीं बढ़ती महंगाई और वैश्विक तनाव नई चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं। आने वाले महीनों में खाद्य कीमतों, कच्चे तेल, मानसून के प्रभाव और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों पर विशेष नजर रहेगी। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखते हुए महंगाई को नियंत्रित करना है, ताकि अर्थव्यवस्था की मजबूती का लाभ आम परिवारों तक भी पहुंच सके।

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