कमजोर शुरुआत के बाद संभला रुपया
इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया पहले 96.81 प्रति डॉलर के स्तर पर खुला। शुरुआती दबाव के बाद इसमें सुधार आया और यह 96.51 तक पहुंच गया, जो पिछले कारोबारी सत्र के बंद स्तर की तुलना में 22 पैसे की मजबूती दर्शाता है।
इससे पहले गुरुवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 96.73 पर बंद हुआ था। शुरुआती रिकवरी ने संकेत दिया कि बाजार में कुछ सकारात्मक समर्थन मिला, हालांकि वैश्विक जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।
RBI की संभावित दखल से बाजार को मिला सहारा
विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार, भारतीय रिज़र्व बैंक ने सरकारी बैंकों के माध्यम से डॉलर बेचकर रुपये में अत्यधिक गिरावट को रोकने की कोशिश की हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह हस्तक्षेप नहीं होता तो वैश्विक परिस्थितियों के कारण रुपया और अधिक कमजोर हो सकता था। हालांकि RBI आमतौर पर किसी निश्चित विनिमय दर की रक्षा करने के बजाय अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने पर जोर देता है।
कच्चे तेल की कीमतें बनीं सबसे बड़ी चुनौती
वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर के ऊपर कारोबार करता रहा। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता ने तेल की कीमतों को ऊंचा बनाए रखा है।
भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से डॉलर की मांग बढ़ती है, आयात बिल महंगा होता है और रुपये पर अतिरिक्त दबाव बनता है।
शेयर बाजार और विदेशी निवेशकों की बिकवाली का असर
रुपये को समर्थन मिलने के बावजूद घरेलू शेयर बाजार में कमजोरी बनी रही। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली और जोखिम से बचने की वैश्विक प्रवृत्ति ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया।
ऐसी परिस्थितियों में विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बढ़ जाती है, जिससे रुपये के लिए दबाव पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाता।

यह खबर क्यों महत्वपूर्ण है?
रुपये की चाल केवल विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहती। इसका असर ईंधन की कीमतों, आयात लागत, महंगाई, विदेशी व्यापार और निवेशकों के विश्वास पर भी पड़ता है।
यदि रुपया लगातार मजबूत रहता है तो आयातित वस्तुओं की लागत कम हो सकती है, जबकि लगातार कमजोरी से महंगाई बढ़ने का जोखिम रहता है। इसलिए रुपये की हर बड़ी चाल पर उद्योग, निवेशक और नीति निर्माता समान रूप से नजर रखते हैं।
संतुलित विश्लेषण
शुक्रवार की शुरुआती मजबूती से यह संकेत मिलता है कि RBI बाजार में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए सक्रिय रह सकता है। हालांकि केवल केंद्रीय बैंक का हस्तक्षेप लंबे समय तक रुपये को मजबूत बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
जब तक कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, विदेशी पूंजी का बहिर्गमन और घरेलू बाजार की कमजोरी बनी रहती है, तब तक रुपये पर दबाव जारी रह सकता है। आने वाले दिनों में वैश्विक ऊर्जा बाजार और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां रुपये की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
