रुपया 95.95 के आसपास खुला
बुधवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 95.95 पर खुला, जबकि पिछले कारोबारी सत्र में यह करीब 95.98 पर बंद हुआ था। एक दिन पहले रुपया कारोबार के दौरान 96.15 तक कमजोर हुआ था, जिसके बाद इसमें सुधार देखने को मिला।
हालांकि यह बढ़त सीमित रही और सुबह के कारोबार में रुपया करीब 95.97 प्रति डॉलर के आसपास था।
Fed की दर बढ़ोतरी की उम्मीदों में कमी
रुपये को सबसे अहम बाहरी सहारा अमेरिकी मौद्रिक नीति को लेकर बदलती उम्मीदों से मिला है।
न्यूयॉर्क फेड के अध्यक्ष जॉन विलियम्स की टिप्पणियों के बाद बाजार में अक्टूबर में अमेरिकी ब्याज दर बढ़ने की संभावना कम हुई। ऊंची अमेरिकी ब्याज दरें आमतौर पर डॉलर को समर्थन देती हैं और भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा सकती हैं।
ऐसे में दर बढ़ोतरी की उम्मीद कम होना रुपये सहित अन्य उभरती बाजार मुद्राओं के लिए कुछ राहत दे सकता है।
तेल की कीमतें क्यों हैं रुपये के लिए महत्वपूर्ण?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर भारतीय आयातकों की डॉलर की मांग बढ़ सकती है, जिससे रुपये पर दबाव पड़ता है।
हाल में कच्चे तेल की कीमतें अपनी ऊंचाई से कुछ नीचे आईं, जिससे रुपये को समर्थन मिला। हालांकि Brent crude अभी भी $100 प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है। इसलिए तेल की मौजूदा स्थिति को रुपये के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं माना जा सकता।
RBI की भूमिका भी अहम
बाजार में भारतीय रिजर्व बैंक की गतिविधियों पर भी नजर बनी हुई है। हाल के सत्रों में सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर की बिक्री देखी गई है, जिसे बाजार सहभागियों ने रुपये में अत्यधिक कमजोरी रोकने के प्रयास से जोड़ा है।
96 रुपये प्रति डॉलर का स्तर फिलहाल बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तर बना हुआ है।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली बनी चुनौती
वैश्विक संकेतों में कुछ सुधार के बावजूद रुपये के सामने घरेलू बाजार से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
29 सितंबर को विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से शुद्ध रूप से करीब ₹9,980 करोड़ की निकासी की। लगातार विदेशी पूंजी बाहर जाने की स्थिति में डॉलर की मांग बढ़ सकती है, जिससे रुपये पर फिर दबाव पड़ने का जोखिम रहता है।
आगे किन संकेतों पर रहेगी नजर?
रुपये की अगली दिशा केवल Fed की ब्याज दर संबंधी उम्मीदों पर निर्भर नहीं करेगी। बाजार की नजर अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों, Fed अधिकारियों की टिप्पणियों, कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेश प्रवाह और RBI की मुद्रा बाजार में गतिविधियों पर रहेगी।
यदि अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर दबाव कम होता है और तेल की कीमतें नीचे आती हैं, तो रुपये को अतिरिक्त सहारा मिल सकता है। इसके विपरीत, तेल में फिर तेज उछाल या विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली रुपये पर दोबारा दबाव बढ़ा सकती है।
निष्कर्ष
फिलहाल रुपये को दो मोर्चों से कुछ राहत मिली है—अमेरिकी ब्याज दरों में तत्काल बढ़ोतरी की आशंका कम हुई है और कच्चा तेल हालिया ऊंचाई से नीचे आया है।
लेकिन तस्वीर अभी पूरी तरह बदली नहीं है। तेल $100 प्रति बैरल से ऊपर है, विदेशी निवेशकों की निकासी जारी है और डॉलर की घरेलू मांग बनी हुई है। इसलिए आने वाले सत्रों में रुपये की चाल वैश्विक ब्याज दरों, तेल और विदेशी पूंजी प्रवाह के बीच संतुलन से तय होने की संभावना है।
