समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, सोमवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 94.9250 के स्तर पर बंद हुआ। शुक्रवार को यह 94.96 पर बंद हुआ था। इस तरह रुपये में मामूली सुधार जरूर दर्ज हुआ, लेकिन शुरुआती बढ़त बरकरार नहीं रह सकी।
शुरुआती मजबूती के बाद क्यों कमजोर पड़ा रुपया?
सोमवार के कारोबारी सत्र में रुपया 94.76 से 94.96 प्रति डॉलर के दायरे में रहा। शुरुआती कारोबार में डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति मजबूत दिखाई दी, लेकिन दिन बढ़ने के साथ घरेलू शेयर बाजार की गिरावट ने विदेशी मुद्रा बाजार की धारणा भी प्रभावित की।
बाजार कारोबारियों के मुताबिक, आयात करने वाली कंपनियों की डॉलर खरीद ने रुपये की बढ़त सीमित कर दी। कई भारतीय कंपनियां विदेशों से कच्चा माल, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और ऊर्जा उत्पाद खरीदती हैं। इनका भुगतान अक्सर अमेरिकी डॉलर में होता है। ऐसी कंपनियां भविष्य में विनिमय दर बदलने से होने वाले संभावित नुकसान को कम करने के लिए पहले से डॉलर खरीदती हैं या हेजिंग करती हैं। यही मांग विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये पर दबाव बढ़ा सकती है।
शेयर बाजार की गिरावट ने बढ़ाई चिंता
सोमवार को भारतीय शेयर बाजार में व्यापक बिकवाली देखने को मिली। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 50 सूचकांक 1.11 प्रतिशत गिरकर 22,888.95 पर बंद हुआ। वहीं, बीएसई सेंसेक्स 876.37 अंक यानी 1.17 प्रतिशत टूटकर 73,852.90 पर पहुंच गया।
बाजार की गिरावट में निजी क्षेत्र की बैंकों और सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। एचडीएफसी बैंक के शेयर में लगभग 2.3 प्रतिशत और एक्सिस बैंक में 4.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। निफ्टी आईटी सूचकांक भी 1.3 प्रतिशत कमजोर हुआ। इन क्षेत्रों में विदेशी संस्थागत निवेशकों की बड़ी हिस्सेदारी है। इसलिए इनमें तेज गिरावट विदेशी पूंजी प्रवाह को लेकर चिंता बढ़ा सकती है। जब विदेशी निवेशक भारतीय परिसंपत्तियां बेचकर अपना पैसा बाहर ले जाते हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ने की संभावना रहती है। हालांकि, किसी एक दिन शेयर बाजार में गिरावट का अर्थ यह नहीं है कि उसी अनुपात में विदेशी पूंजी बाहर निकली है।
कच्चे तेल में गिरावट के बावजूद रुपये को सीमित राहत
रुपये के लिए सोमवार को एक सकारात्मक संकेत अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों से मिला। रॉयटर्स के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड की कीमतों में लगभग 2 प्रतिशत की गिरावट आई और यह करीब 108 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा रूस पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी छूट देने के फैसले से तेल की वैश्विक आपूर्ति संबंधी चिंताएं कुछ कम हुईं।
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर भारतीय कंपनियों को आयात के लिए अधिक डॉलर की जरूरत पड़ती है। इसके विपरीत, तेल सस्ता होने से आयात बिल और डॉलर की मांग पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन सोमवार को तेल की कीमतों में नरमी के बावजूद रुपये में बड़ी तेजी नहीं आ सकी। इससे स्पष्ट हुआ कि घरेलू शेयर बाजार की कमजोरी और आयातकों की डॉलर खरीद फिलहाल महत्वपूर्ण कारक बने हुए हैं।
RBI के कदमों से पिछले सप्ताह मजबूत हुआ था रुपया
भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल के दिनों में रुपये को स्थिर रखने और विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव कम करने के लिए कई उपाय किए हैं। इनमें कुछ विदेशी मुद्रा लेनदेन पर नियम सख्त करना, बैंकों के लिए डॉलर खरीद की लागत बढ़ाना और सरकारी तेल विपणन कंपनियों को डॉलर उपलब्ध कराने के लिए विशेष व्यवस्था करना शामिल है। इन उपायों के बाद पिछले सप्ताह रुपये में करीब 2 प्रतिशत की मजबूती दर्ज हुई थी। मार्च के बाद यह रुपये का सबसे बेहतर साप्ताहिक प्रदर्शन रहा।
हालांकि, नई व्यवस्थाओं के कारण कुछ आयातकों के लिए भविष्य की डॉलर जरूरतों की हेजिंग महंगी भी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि RBI के कदम अल्पकालिक अस्थिरता कम कर सकते हैं, लेकिन रुपये की दीर्घकालिक दिशा विदेशी निवेश, तेल की कीमतों और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगी।
ब्याज दरों पर भी बाजार की नजर
रुपये की दिशा तय करने में RBI की मौद्रिक नीति महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। केंद्रीय बैंक ने 7 अक्टूबर 2026 को रेपो दर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी करके इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया था। यह लगभग चार वर्षों में पहली ब्याज दर वृद्धि थी।
अब निवेशकों की नजर अक्टूबर की मौद्रिक नीति समिति की बैठक के विस्तृत विवरण पर है। वैश्विक बैंक ANZ के विश्लेषकों का अनुमान है कि दिसंबर में RBI रेपो दर में फिर 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर सकता है। हालांकि, विदेशी मुद्रा बाजार में दबाव बना रहने पर 50 आधार अंकों की बढ़ोतरी या अतिरिक्त मौद्रिक कदमों की संभावना भी बढ़ सकती है। यह विश्लेषकों का अनुमान है, RBI की घोषित भविष्य की नीति नहीं।
आम लोगों और कारोबार पर क्या असर पड़ेगा?
रुपये की कमजोरी का प्रभाव केवल शेयर बाजार या विदेशी मुद्रा कारोबार तक सीमित नहीं रहता। डॉलर महंगा होने से विदेशों में पढ़ाई, अंतरराष्ट्रीय यात्रा और आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है। जिन कंपनियों को विदेशी मुद्रा में भुगतान करना पड़ता है, उनके खर्च भी प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, डॉलर में कमाई करने वाले निर्यातकों को कमजोर रुपये से कुछ लाभ मिल सकता है। हालांकि, यह फायदा उनके आयात खर्च और विदेशी मुद्रा जोखिम पर निर्भर करता है।
आगे कैसी रह सकती है रुपये की चाल?
विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार, निकट भविष्य में रुपये के 94 से 95.50 प्रति डॉलर के दायरे में रहने का अनुमान है। हालांकि, यह कोई निश्चित स्तर नहीं है। अमेरिका के मध्यावधि चुनाव, पश्चिम एशिया में तनाव, अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें और विदेशी निवेशकों का रुख रुपये की दिशा प्रभावित कर सकते हैं।
मंगलवार, 20 अक्टूबर को स्थानीय अवकाश के कारण भारतीय वित्तीय बाजार बंद रहेंगे। फिलहाल सोमवार का कारोबार यही संकेत देता है कि RBI के हालिया प्रयासों से रुपये को कुछ स्थिरता मिली है, लेकिन शेयर बाजार की कमजोरी और डॉलर की मांग के कारण मजबूत रिकवरी की राह अभी आसान नहीं है।
