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विदेशी निवेशकों की बिकवाली से दबाव में शेयर बाजार, Sensex-Nifty में गिरावट

भारतीय शेयर बाजार ने गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026 को कमजोर शुरुआत की। विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली ने बाजार की धारणा पर दबाव बनाए रखा, जबकि कच्चे तेल की कीमतों में नरमी ने गिरावट को कुछ हद तक सीमित किया।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली से दबाव में शेयर बाजार, Sensex-Nifty में गिरावट
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: Reuters, 1 अक्टूबर 2026; बाजार एवं संस्थागत प्रवाह के पूरक आंकड़े Moneycontrol और Business Standard से सत्यापित किए गए हैं।

Sensex और Nifty की कमजोर शुरुआत

मुंबई, 1 अक्टूबर 2026 — भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक गुरुवार को शुरुआती कारोबार में गिरावट के साथ खुले। BSE Sensex 72,192.89 पर खुला, जो पिछले बंद स्तर से 287.40 अंक यानी करीब 0.40% नीचे था। NSE Nifty 50 ने भी 76.75 अंक या लगभग 0.34% की गिरावट के साथ 22,543.70 पर कारोबार शुरू किया।

सुबह करीब 9:44 बजे Nifty 50 लगभग 0.28% गिरकर 22,558.95 पर था, जबकि Sensex करीब 0.12% की कमजोरी के साथ 72,389.51 पर कारोबार कर रहा था। बाजार की कमजोरी के पीछे विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली एक प्रमुख कारण बनी हुई है।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली बनी बड़ी चिंता

भारतीय इक्विटी बाजार से विदेशी पूंजी की निकासी हाल के कारोबारी सत्रों में तेज हुई है। 30 सितंबर को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयरों में ₹10,148.41 करोड़ की शुद्ध बिकवाली की। यह करीब छह महीनों की सबसे बड़ी एक-दिवसीय विदेशी बिकवाली बताई गई।

Reuters के मुताबिक, विदेशी निवेशकों ने बुधवार को करीब 1.06 अरब डॉलर के भारतीय शेयर बेचे। पिछले पांच कारोबारी सत्रों में विदेशी निकासी लगभग 3.6 अरब डॉलर रही, जिससे 2026 में अब तक विदेशी बिकवाली लगभग 27.8 अरब डॉलर तक पहुंच गई।

लगातार FII बिकवाली महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़े विदेशी फंडों की पूंजी निकासी से विशेष रूप से लार्ज-कैप शेयरों और प्रमुख सूचकांकों पर दबाव बढ़ सकता है।

घरेलू संस्थागत निवेशकों ने दिया सहारा

विदेशी निवेशकों की बिकवाली के विपरीत घरेलू संस्थागत निवेशक (DIIs) बाजार में खरीदार बने हुए हैं। 30 सितंबर को DIIs ने लगभग ₹11,272 करोड़ की शुद्ध खरीदारी की। सितंबर के दौरान उनकी संचयी खरीद करीब ₹76,030 करोड़ रही, जबकि इसी अवधि में FII की शुद्ध बिकवाली लगभग ₹44,013 करोड़ रही।

यह अंतर दिखाता है कि घरेलू संस्थागत पूंजी विदेशी बिकवाली के प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित कर रही है। हालांकि, लगातार बड़े विदेशी आउटफ्लो के कारण निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता पर दबाव बना हुआ है।

ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड भी बाजार के लिए चुनौती

विदेशी निवेशकों के रुख के पीछे वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हैं। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ऊंचे स्तर पर बनी हुई है। 10 वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड बुधवार को लगभग 5.29% पर बंद हुई, जो 2007 के बाद के ऊंचे स्तरों के करीब है।

ऊंची अमेरिकी यील्ड उभरते बाजारों के लिए चुनौती बन सकती है क्योंकि इससे अमेरिकी परिसंपत्तियों की सापेक्ष आकर्षकता बढ़ती है। ऐसे माहौल में विदेशी निवेशक भारत सहित दूसरे उभरते बाजारों में अपने जोखिम को कम कर सकते हैं।

कच्चे तेल में नरमी से मिली कुछ राहत

विदेशी बिकवाली के दबाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी भारतीय बाजार के लिए एक सकारात्मक संकेत रही। गुरुवार सुबह Brent crude लगभग 98 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। इसलिए लंबे समय तक ऊंची कच्चे तेल की कीमतें आयात बिल, महंगाई, रुपये और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ा सकती हैं। इसके विपरीत, तेल की कीमतों में लगातार नरमी इन जोखिमों को कम करने में मदद कर सकती है।

लगातार आठवें सप्ताह गिरावट की ओर बाजार

मौजूदा कमजोरी केवल एक कारोबारी सत्र तक सीमित नहीं है। Reuters के अनुसार, Sensex और Nifty लगातार आठवें सप्ताह गिरावट दर्ज करने की दिशा में हैं। अगर ऐसा होता है तो यह करीब 25 वर्षों में भारतीय बेंचमार्क सूचकांकों की सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट की श्रृंखला होगी।

इस सप्ताह अब तक Nifty लगभग 2.3% और Sensex करीब 1.9% नीचे आ चुके हैं।

बाजार के लिए आगे क्या महत्वपूर्ण होगा?

निकट अवधि में निवेशकों की नजर मुख्य रूप से विदेशी निवेश प्रवाह, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की कीमतों, रुपये की चाल और वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर रहने की संभावना है।

मौजूदा स्थिति में दो विपरीत ताकतें दिखाई दे रही हैं। एक तरफ लगातार विदेशी बिकवाली और ऊंची वैश्विक उधारी लागत बाजार पर दबाव बना रही हैं। दूसरी ओर घरेलू संस्थागत खरीदारी और कच्चे तेल में नरमी कुछ सहारा दे रही हैं।

इसलिए शुरुआती गिरावट को किसी एक कारण से जोड़ने के बजाय विदेशी पूंजी प्रवाह, वैश्विक ब्याज दरों और ऊर्जा कीमतों के संयुक्त प्रभाव के रूप में देखना अधिक उचित है।

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