रुपया दो महीने से अधिक के निचले स्तर पर
मुंबई, 6 अक्टूबर 2026: भारतीय रुपये पर दबाव जारी है। मंगलवार को घरेलू मुद्रा लगभग 0.15% कमजोर होकर 96.43 रुपये प्रति अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई। यह दो महीने से अधिक का निचला स्तर है और मई में दर्ज करीब 96.96 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर के भी करीब है।
रुपये की कमजोरी के पीछे किसी एक कारण के बजाय कई घरेलू और वैश्विक कारक काम कर रहे हैं। विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी सबसे महत्वपूर्ण दबावों में शामिल है, जबकि ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और डॉलर की मांग ने स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बनाया है।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली बनी बड़ी वजह
रुपये पर सबसे सीधा दबाव विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की ओर से भारतीय बाजारों से पैसा निकालने के कारण पड़ रहा है।
जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर या बॉन्ड बेचकर अपना पैसा वापस ले जाते हैं, तो उन्हें रुपये को डॉलर या दूसरी विदेशी मुद्रा में बदलना पड़ सकता है। इससे बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर कमजोरी का दबाव पैदा हो सकता है।
Reuters के अनुसार, विदेशी निवेशकों ने 2026 में अब तक भारतीय शेयरों से करीब $27.8 अरब निकाले हैं। भारतीय इक्विटी बाजार भी दबाव में है और हाल में लगातार आठ सप्ताह की गिरावट दर्ज कर चुका है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड क्यों बढ़ा रही रुपये की मुश्किल?
अमेरिका और दूसरे विकसित बाजारों में बॉन्ड यील्ड का ऊंचा रहना भी भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए चुनौती पैदा कर रहा है।
जब अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर निवेशकों को ज्यादा रिटर्न मिलने लगता है, तो कुछ वैश्विक निवेशक जोखिम वाले उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिकी संपत्तियों की ओर जा सकते हैं।
यही कारण है कि मौजूदा दबाव सिर्फ रुपये तक सीमित नहीं है। दूसरे एशियाई बाजार भी वैश्विक बॉन्ड बाजार की अस्थिरता से प्रभावित हुए हैं। अक्टूबर की शुरुआत में रुपया 96.3150 पर बंद हुआ था, जब अमेरिकी यील्ड, महंगे कच्चे तेल और विदेशी बिकवाली ने एक साथ मुद्रा पर दबाव बनाया था।
महंगा कच्चा तेल भी भारत के लिए चिंता
कच्चे तेल की कीमतें रुपये की दिशा के लिए एक और महत्वपूर्ण कारक हैं।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो भारतीय आयातकों को ऊर्जा खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ सकती है।
इससे विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर हो सकता है। साथ ही, लंबे समय तक महंगा तेल भारत के आयात बिल और मुद्रास्फीति के लिए भी चुनौती पैदा कर सकता है।
हाल के दिनों में ऊंची तेल कीमतों और मध्य पूर्व से जुड़ी भू-राजनीतिक चिंताओं ने रुपये पर दबाव बढ़ाया है।
RBI ने गिरावट रोकने के लिए किया हस्तक्षेप?
Reuters के अनुसार, बाजार सहभागियों का मानना है कि Reserve Bank of India (RBI) ने मंगलवार को विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये की गिरावट को सीमित करने की कोशिश की।
केंद्रीय बैंक आमतौर पर रुपये के लिए किसी निश्चित बाजार स्तर की सार्वजनिक रूप से रक्षा करने की घोषणा नहीं करता। उसका हस्तक्षेप अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने और बाजार की स्थितियों को व्यवस्थित रखने पर केंद्रित हो सकता है।
हालांकि, विदेशी निवेश की लगातार निकासी और डॉलर की मजबूत मांग बनी रहती है तो केवल हस्तक्षेप से रुपये की दिशा को लंबे समय तक बदलना मुश्किल हो सकता है।
2026 में रुपया करीब 7% कमजोर
रुपये की मौजूदा गिरावट केवल कुछ दिनों की कहानी नहीं है।
Reuters के मुताबिक, भारतीय मुद्रा 2026 में डॉलर के मुकाबले करीब 7% कमजोर हो चुकी है। विदेशी पूंजी की निकासी के साथ वैश्विक बॉन्ड बाजार में बिकवाली ने मुद्रा पर लगातार दबाव बनाए रखा है।
भारतीय कंपनियां भी संभावित मुद्रा कमजोरी से बचने के लिए ज्यादा हेजिंग कर रही हैं। सितंबर में आयातकों द्वारा बुक किए गए करेंसी हेज रिकॉर्ड $77 अरब तक पहुंच गए, Reuters ने क्लियरिंग-हाउस डेटा के आधार पर बताया।
यह दिखाता है कि कंपनियां भी भविष्य में विनिमय दर में उतार-चढ़ाव के जोखिम को गंभीरता से ले रही हैं।
कमजोर रुपया आम लोगों को कैसे प्रभावित कर सकता है?
रुपये की गिरावट का असर सिर्फ करेंसी ट्रेडर्स तक सीमित नहीं रहता।
अगर रुपया लंबे समय तक कमजोर रहता है, तो डॉलर में भुगतान किए जाने वाले आयात महंगे हो सकते हैं। इसमें कच्चा तेल, कुछ इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनरी और दूसरी आयातित वस्तुएं शामिल हो सकती हैं।
विदेश में पढ़ाई या यात्रा करने वाले भारतीयों के लिए भी डॉलर महंगा होने से खर्च बढ़ सकता है।
लेकिन कमजोर रुपये का प्रभाव पूरी तरह नकारात्मक नहीं होता। डॉलर में कमाई करने वाले कुछ निर्यातकों और IT कंपनियों को रुपये में आय बदलने पर फायदा मिल सकता है। इसका वास्तविक लाभ कंपनी की लागत, हेजिंग और कारोबार की संरचना पर निर्भर करता है।
क्या रुपया 100 प्रति डॉलर तक जा सकता है?
रुपये के 100 प्रति डॉलर तक पहुंचने की आशंका बाजार में चर्चा का विषय बन सकती है, लेकिन मौजूदा पूर्वानुमान इसे निश्चित परिणाम नहीं मानते।
Reuters के हालिया सर्वे में किसी भी विश्लेषक ने सर्वे की अवधि के भीतर रुपये के 100 प्रति डॉलर के पार जाने का अनुमान नहीं लगाया। सर्वे का मध्य अनुमान अगले एक वर्ष में लगभग 97.50 प्रति डॉलर था, जबकि कुछ बड़े बैंकों ने सितंबर 2027 तक लगभग 99 का अनुमान दिया।
ये केवल पूर्वानुमान हैं, गारंटी नहीं। मुद्रा की वास्तविक दिशा वैश्विक ब्याज दरों, तेल, पूंजी प्रवाह, व्यापार, मुद्रास्फीति और RBI की नीतियों सहित कई कारकों पर निर्भर करेगी।
अब बाजार की नजर RBI पर
रुपये की कमजोरी ऐसे समय आई है जब निवेशकों की नजर RBI की आगामी मौद्रिक नीति बैठक पर भी है।
बाजार यह देखेगा कि केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति, रुपये, तरलता और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों के बीच किस तरह संतुलन बनाता है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण संकेत विदेशी निवेशकों की गतिविधि, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, डॉलर की दिशा और कच्चे तेल की कीमतों से मिलेंगे।
रुपये का दो महीने से अधिक के निचले स्तर पर पहुंचना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल मुद्रा बाजार की कमजोरी नहीं दिखाता—यह भारत से विदेशी पूंजी की निकासी और चुनौतीपूर्ण वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों के संयुक्त प्रभाव को भी दर्शाता है।
