1993 के बाद पहली बार चुनाव की दिशा में ठोस कदम
महाराष्ट्र के कॉलेज और विश्वविद्यालय एक बड़े बदलाव की ओर बढ़ सकते हैं। राज्य सरकार ने करीब 33 साल बाद छात्र परिषद चुनावों को फिर शुरू करने की संभावनाओं और नियमों का अध्ययन करने के लिए 12 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित की है।
महाराष्ट्र में छात्रों ने आखिरी बार 1993 में प्रत्यक्ष कैंपस चुनाव में हिस्सा लिया था। इसके बाद तीन दशकों से अधिक समय तक राज्य के अधिकांश कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में उस स्वरूप के छात्र चुनाव नहीं हुए।
नई समिति की अध्यक्षता मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. सुहास पेडणेकर करेंगे। समिति को चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी, शांतिपूर्ण और छात्र-केंद्रित बनाने के लिए दिशानिर्देश सुझाने हैं।
1994 में क्यों बंद हुए थे प्रत्यक्ष छात्र चुनाव?
इस कहानी की शुरुआत 2026 से नहीं, बल्कि 1980 और 1990 के दशक के कैंपस राजनीतिक माहौल से होती है।
महाराष्ट्र में छात्र चुनावों के दौरान हिंसा और कानून-व्यवस्था को लेकर चिंताएं बढ़ी थीं। 1989 में मुंबई में चुनाव प्रचार के दौरान NSUI छात्र नेता Owen D'Souza की हत्या भी उस दौर की गंभीर घटनाओं में शामिल थी।
इसके बाद Maharashtra Universities Act, 1994 के तहत प्रत्यक्ष और प्रतिस्पर्धी छात्र संघ चुनावों की पुरानी व्यवस्था समाप्त कर दी गई।
इसलिए 33 साल का अंतर केवल प्रशासनिक देरी का परिणाम नहीं है। इसके पीछे कैंपस हिंसा और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर लंबे समय से चली आ रही चिंताएं भी रही हैं।
2016 में सरकार ने फिर खोला था चुनाव का रास्ता
दो दशक से अधिक समय बाद नीति में बड़ा बदलाव आया।
तत्कालीन उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री Vinod Tawde के कार्यकाल में लाए गए Maharashtra Public Universities Act, 2016 ने छात्र परिषदों के चुनाव के लिए फिर से कानूनी ढांचा उपलब्ध कराया।
कानून की धारा 99 में विश्वविद्यालय विभागों, संबद्ध कॉलेजों और संस्थानों में छात्र परिषदों के गठन और छात्र प्रतिनिधियों के चुनाव का प्रावधान है।
कानून के मुताबिक चुनाव प्रक्रिया, उम्मीदवारों की आचार संहिता, चुनाव कराने वाले अधिकारियों और शिकायत निवारण तंत्र से संबंधित विस्तृत व्यवस्था राज्य सरकार द्वारा निर्धारित की जा सकती है।
यानी 2016 के बाद सवाल यह नहीं रह गया था कि छात्र चुनाव कानूनी रूप से संभव हैं या नहीं; मुख्य चुनौती उन्हें सुरक्षित और व्यावहारिक तरीके से लागू करने की थी।
2019 में चुनाव होने वाले थे, फिर क्यों रुके?
2016 के कानून के बाद कई विश्वविद्यालयों ने 2018-19 में चुनाव कराने की तैयारी शुरू कर दी थी।
लेकिन अगस्त 2019 में राज्य मंत्रिमंडल ने सरकार को कैंपस चुनाव स्थगित करने की शक्ति देने वाले प्रावधान को मंजूरी दी। उस समय विधानसभा चुनाव नजदीक थे और छात्र चुनावों का कार्यक्रम विधानसभा चुनाव की आचार संहिता तथा संभावित कानून-व्यवस्था संबंधी चिंताओं से जुड़ रहा था।
इसके बाद कोविड-19 महामारी और महाराष्ट्र में बदलते राजनीतिक हालात के बीच छात्र चुनावों की वापसी आगे नहीं बढ़ सकी।
अब 2026 में यह मुद्दा दोबारा औपचारिक सरकारी प्रक्रिया में आया है।
12 सदस्यीय समिति क्या करेगी?
नई समिति केवल यह तय करने के लिए नहीं बनाई गई है कि चुनाव होने चाहिए या नहीं। इसका काम चुनावों के लिए व्यावहारिक ढांचा तैयार करना भी है।
समिति को एक महीने के भीतर रिपोर्ट देने के लिए कहा गया है। इसके दायरे में चुनाव प्रक्रिया, आचार संहिता, शिकायत निवारण व्यवस्था और अलग-अलग छात्र समूहों का प्रतिनिधित्व शामिल है।
इसके अलावा समिति यह भी देखेगी कि चुनाव प्रक्रिया में बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप और व्यावसायीकरण को कैसे रोका जा सकता है।
समिति में पूर्व कुलपति डॉ. पंडित विद्यासागर, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के पूर्व प्र-कुलपति डॉ. एन. एस. उमराणी और मुंबई विश्वविद्यालय के प्र-कुलपति डॉ. अजय भामरे सहित शिक्षा एवं कानून क्षेत्र से जुड़े सदस्य शामिल हैं। मुंबई विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. प्रसाद कारंडे सदस्य सचिव हैं।
महिला, SC-ST, OBC सहित प्रतिनिधित्व पर भी विचार
नई व्यवस्था में केवल अध्यक्ष या महासचिव जैसे पदों का चुनाव ही मुद्दा नहीं है।
समिति को यह अध्ययन करने के लिए भी कहा गया है कि छात्र परिषदों में महिलाओं, अनुसूचित जाति एवं जनजाति, विमुक्त जाति-भटक्या जमाती, OBC तथा NSS, NCC, खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े छात्रों को उचित प्रतिनिधित्व कैसे दिया जाए।
छात्र परिषदों के बजट, फंड के इस्तेमाल और समय पर ऑडिट के लिए भी पारदर्शी नियम सुझाए जाने हैं।
नवनिर्वाचित प्रतिनिधियों को उनके अधिकारों, जिम्मेदारियों और विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली से परिचित कराने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम पर भी विचार किया जाएगा।
क्या छात्र चुनाव ऑनलाइन भी हो सकते हैं?
यह नई कवायद का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
समिति यह जांचेगी कि नामांकन की जांच, मतदान और शिकायत निवारण जैसी प्रक्रियाओं में डिजिटल या ऑनलाइन व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि महाराष्ट्र ने ऑनलाइन छात्र चुनाव कराने का निर्णय ले लिया है। फिलहाल समिति को इसकी व्यवहार्यता का अध्ययन करना है।
Lyngdoh Committee के नियम क्यों महत्वपूर्ण हैं?
देश में छात्र चुनावों पर चर्चा के दौरान Lyngdoh Committee की सिफारिशें महत्वपूर्ण संदर्भ हैं।
यह समिति 2005 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनाई गई थी और उसने 2006 में अपनी सिफारिशें दी थीं। इसका उद्देश्य छात्र चुनावों में धनबल, बाहरी राजनीतिक प्रभाव और हिंसा जैसी समस्याओं को नियंत्रित करना था।
इनमें उम्मीदवारों के लिए आयु सीमा, न्यूनतम 75% उपस्थिति, चुनाव खर्च की सीमा, आचार संहिता और शिकायत निवारण व्यवस्था जैसे सुरक्षा उपाय शामिल थे।
महाराष्ट्र के सामने अब चुनौती यह होगी कि छात्र प्रतिनिधित्व को वापस लाते समय पुराने दौर की समस्याओं को दोहराने से कैसे रोका जाए।
अभी चुनाव की तारीख घोषित नहीं हुई है
यह इस खबर का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है।
सरकार ने अभी महाराष्ट्र में छात्र चुनाव की तारीख घोषित नहीं की है। उसने फिलहाल चुनावों की वापसी के लिए नियम और कार्यप्रणाली तैयार करने हेतु विशेषज्ञ समिति बनाई है।
इसलिए इसे “महाराष्ट्र में छात्र चुनाव शुरू हो गए” कहना सही नहीं होगा।
सटीक स्थिति यह है कि सरकार ने छात्र चुनावों को पुनर्जीवित करने की औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ाई है।
आखिर 2026 में ही क्यों लौटा यह मुद्दा?
The Indian Express की Decode Politics रिपोर्ट इस कदम को हाल के छात्र आंदोलनों और युवाओं की बढ़ी हुई राजनीतिक सक्रियता की पृष्ठभूमि में देखती है। रिपोर्ट के अनुसार, हाल के छात्र विरोध प्रदर्शनों ने कैंपस प्रतिनिधित्व के लंबे समय से लंबित प्रश्न को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
लेकिन सरकार द्वारा समिति गठित करने का आधिकारिक उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया के लिए सुरक्षित, पारदर्शी और छात्र-केंद्रित नियम तैयार करना है। इसलिए हाल के आंदोलनों को सरकार के निर्णय का एकमात्र सिद्ध कारण मानना उपलब्ध आधिकारिक जानकारी से आगे जाना होगा।
