देश की राजनीति में दल-बदल और राजनीतिक पुनर्गठन को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बजाय कॉरपोरेट दुनिया में इस्तेमाल होने वाले "अधिग्रहण", "विलय" और "शत्रुतापूर्ण कब्ज़ा" जैसे तरीकों को राजनीति में अपना रही है। विपक्ष का दावा है कि विभिन्न राज्यों में दूसरे दलों के नेताओं को शामिल कर सरकारें बनाने या राजनीतिक समीकरण बदलने की रणनीति इसी सोच का हिस्सा है।
विपक्षी नेताओं का कहना है कि इस तरह की राजनीति से जनता के जनादेश और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। उनका आरोप है कि विपक्षी दलों को कमजोर करने के लिए लगातार उनके विधायकों और नेताओं को भाजपा में शामिल कराया जा रहा है। इसे लोकतंत्र की स्वस्थ परंपराओं के विपरीत बताया जा रहा है।
वहीं भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि पार्टी में शामिल होने वाले नेता अपनी इच्छा से भाजपा की नीतियों और नेतृत्व पर भरोसा जताकर आते हैं। भाजपा का कहना है कि देशभर में पार्टी का विस्तार जनता के समर्थन और विकास आधारित राजनीति का परिणाम है, न कि किसी प्रकार के दबाव या राजनीतिक अधिग्रहण का। इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है और आने वाले समय में यह बहस और भी गहरा सकती है।
