3 नवंबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग ने पिछले सप्ताह न्यायाधीशों को डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट बनवाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए कहा था। इसके लिए PAN कार्ड, सरकारी पहचान पत्र, फोटो, मोबाइल नंबर और ईमेल जैसी जानकारियां मांगी गई हैं। यह बदलाव ऐसे समय हुआ है, जब आधार प्रमाणीकरण को लेकर न्यायाधीशों और चुनाव आयोग के बीच असहमति के कारण अपीलों के अंतिम आदेश पोर्टल पर अपलोड नहीं हो पा रहे थे।
आधार प्रमाणीकरण को लेकर क्यों हुआ विवाद?
पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़ी अपीलों की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए गए थे। इन ट्रिब्यूनल में कलकत्ता हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश मतदाता सूची से जुड़े विवादों की समीक्षा कर रहे हैं।चुनाव आयोग ने 21 सितंबर को ट्रिब्यूनल के लिए अपने डिजिटल पोर्टल में नया फीचर शुरू किया था। इसके तहत अंतिम आदेश अपलोड करने के लिए न्यायाधीशों को अपने निजी आधार नंबर के जरिए प्रमाणीकरण करना जरूरी कर दिया गया। न्यायाधीशों ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई और 24 सितंबर को पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पत्र लिखकर आधार प्रमाणीकरण हटाने की मांग की। न्यायाधीशों का तर्क था कि न्यायिक आदेश जारी करने के लिए उन्हें अपने निजी आधार विवरण का इस्तेमाल करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। इस तकनीकी और प्रशासनिक असहमति के चलते ट्रिब्यूनल के न्यायाधीश पोर्टल पर अंतिम आदेश अपलोड नहीं कर पा रहे थे। हालांकि, कुछ मामलों में ऑफलाइन काम जारी रहने की जानकारी सामने आई थी।
अब PAN कार्ड से कैसे होगी डिजिटल पहचान?
इस समस्या को दूर करने के लिए चुनाव आयोग ने डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) का विकल्प सामने रखा है। इसके लिए न्यायाधीशों को निजी एजेंसी के माध्यम से अपनी पहचान सत्यापित करानी होगी। रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रक्रिया में PAN कार्ड और सरकारी पहचान पत्र की रंगीन कॉपी, फोटो, सक्रिय मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी की जरूरत होगी। इसके अलावा OTP और वीडियो वेरिफिकेशन के जरिए भी पहचान की पुष्टि की जाएगी। डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट तैयार करने के लिए सरकारी अधिसूचित दर के अनुसार करीब 2,300 रुपये का खर्च बताया गया है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य न्यायाधीशों को आधार नंबर का इस्तेमाल किए बिना डिजिटल रूप से प्रमाणित आदेश जारी करने की सुविधा देना है। चुनाव आयोग की ओर से उठाया गया यह कदम लंबित अपीलों की सुनवाई को दोबारा गति देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, नई व्यवस्था लागू होने और पोर्टल पर आदेश अपलोड होने की प्रक्रिया को सुचारु बनाने के बाद ही इसका वास्तविक असर स्पष्ट होगा।
37 लाख से ज्यादा अपीलें अब भी लंबित
इस पूरे विवाद की गंभीरता का अंदाजा लंबित मामलों की संख्या से लगाया जा सकता है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 17 सितंबर 2026 तक पश्चिम बंगाल के 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल में लगभग 38.31 लाख अपीलें दर्ज की गई थीं। इनमें से करीब 1.26 लाख मामलों का ही निपटारा हुआ था। वहीं, 37 लाख से अधिक अपीलें लंबित थीं। इनमें वे मतदाता भी शामिल हैं, जिन्होंने मतदाता सूची से अपना नाम हटाए जाने के खिलाफ अपील की है। कुछ मामले ऐसे भी हैं जिनमें मतदाता सूची में दूसरे लोगों के नाम शामिल किए जाने को चुनौती दी गई है।
3 नवंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, 19 में से 17 ट्रिब्यूनल ने 1,26,194 मामलों का निपटारा किया था, जबकि दो ट्रिब्यूनल न्यायाधीशों के इस्तीफे के बाद खाली थे। इतनी बड़ी संख्या में लंबित मामलों के कारण मतदाताओं को अपने नाम और मतदान के अधिकार से जुड़े फैसले का इंतजार करना पड़ रहा है।
SIR प्रक्रिया में क्यों हटाए गए लाखों नाम?
SIR यानी Special Intensive Revision चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और उसमें मौजूद गलतियों को दूर करना है। इसमें मृत मतदाताओं, स्थायी रूप से स्थान बदल चुके लोगों और एक से अधिक स्थानों पर दर्ज नामों की जांच की जाती है।
पश्चिम बंगाल में इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम जांच के दायरे में आए। चुनाव आयोग की प्रक्रिया और न्यायिक अधिकारियों की जांच के बाद करीब 27.16 लाख मतदाताओं को अयोग्य मानते हुए सूची से बाहर किया गया था।
हालांकि, इस कार्रवाई पर कई सवाल भी उठे। प्रभावित मतदाताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें पर्याप्त सुनवाई का अवसर नहीं मिला, उनके दस्तावेजों पर ठीक से विचार नहीं किया गया या उन्हें गलत तरीके से नोटिस भेजे गए। कई लोगों ने अपने पक्ष में शैक्षणिक प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र और अन्य सरकारी दस्तावेज भी पेश किए। इसी विवाद के कारण सुप्रीम कोर्ट ने प्रभावित मतदाताओं को अपील का अवसर देने के लिए अलग-अलग ट्रिब्यूनल गठित करने का निर्देश दिया था।
न्यायाधीशों ने पोर्टल की दूसरी कमियों पर भी उठाए सवाल
आधार प्रमाणीकरण ही एकमात्र समस्या नहीं थी। ट्रिब्यूनल के न्यायाधीशों ने चुनाव आयोग के पोर्टल की अन्य तकनीकी सीमाओं पर भी आपत्ति जताई थी।न्यायाधीशों का कहना था कि पोर्टल पर केवल 13 निर्धारित दस्तावेजों को स्वीकार करने की सुविधा है, जबकि किसी मतदाता की पात्रता तय करने के लिए अन्य प्रासंगिक दस्तावेजों पर भी विचार किया जाना चाहिए।
इसके अलावा, अतिरिक्त दस्तावेज अपलोड करने, पक्षकारों को नोटिस भेजने और ऑनलाइन सुनवाई जैसी सुविधाओं को लेकर भी समस्याएं सामने आई थीं।न्यायाधीशों ने ट्रिब्यूनल के मौजूदा कार्यस्थल पर भी चिंता जताई थी। कोलकाता के बाहरी इलाके जोका में स्थित केंद्र तक पहुंचने में लंबा समय लगता है। कुछ न्यायाधीशों ने बेहतर सुविधाओं और अधिक सुविधाजनक स्थान पर ट्रिब्यूनल स्थानांतरित करने की मांग की थी।अब चुनाव आयोग पोर्टल में बदलाव और ट्रिब्यूनल के कामकाज को सुविधाजनक बनाने के उपायों पर विचार कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद शुरू हुई थी अपीलों की व्यवस्था
पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर विवाद बढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप किया था। अदालत ने मतदाता सूची से हटाए गए लोगों को अपनी पात्रता साबित करने और फैसले को चुनौती देने का अवसर देने के लिए अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाने का निर्देश दिया था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि ट्रिब्यूनल केवल चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित दस्तावेजों तक सीमित न रहें, बल्कि मामले के अनुसार अन्य प्रासंगिक दस्तावेजों पर भी विचार कर सकें। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि किसी भी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से बाहर न रहे। लेकिन तकनीकी समस्याओं और प्रशासनिक अड़चनों ने इस पूरी प्रक्रिया को धीमा कर दिया।
क्या अब मतदाताओं को मिलेगी राहत?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि डिजिटल सिग्नेचर की नई व्यवस्था लागू होने के बाद लंबित अपीलों का निपटारा कितनी तेजी से हो पाएगा। चुनाव आयोग के सामने लाखों मामलों को समयबद्ध तरीके से निपटाने की चुनौती है।
वहीं, प्रभावित मतदाताओं के लिए यह सिर्फ तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा मामला है। किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में होना उसके मतदान के अधिकार के इस्तेमाल के लिए बेहद जरूरी है।
बंगाल का SIR विवाद अब चुनाव आयोग, न्यायिक व्यवस्था और राजनीतिक दलों के बीच जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बन चुका है। एक तरफ चुनाव आयोग मतदाता सूची को व्यवस्थित करने की बात कर रहा है, तो दूसरी तरफ विपक्ष और प्रभावित मतदाता प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग कर रहे हैं।
फिलहाल चुनाव आयोग के डिजिटल सिग्नेचर वाले नए कदम से ट्रिब्यूनल का काम दोबारा शुरू होने की उम्मीद है। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या इस तकनीकी बदलाव के बाद 37 लाख से अधिक लंबित अपीलों का निपटारा तेजी से हो पाएगा और क्या प्रभावित मतदाताओं को उनका मतदान का अधिकार वापस मिल सकेगा?
