विशेषज्ञों ने आरोप लगाया कि दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन के दौरान लोगों को हिरासत में लिया गया, निहत्थे छात्रों पर लाठीचार्ज हुआ और कई प्रदर्शनकारियों को कथित दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। हालांकि, इन सभी आरोपों की स्वतंत्र न्यायिक पुष्टि नहीं हुई है।
संयुक्त राष्ट्र ने पुलिस कार्रवाई पर क्या कहा?
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले तीन महीनों में आयोजित युवा नेतृत्व वाले प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की प्रतिक्रिया कई अवसरों पर जरूरत से अधिक कठोर रही है। विशेषज्ञों ने कहा कि प्रदर्शनकारियों के शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने के बावजूद सुरक्षा एजेंसियों द्वारा बल प्रयोग करने की शिकायतें सामने आई हैं। उन्होंने इसे चिंता पैदा करने वाला व्यापक रुझान बताया।
बयान में भारत सरकार से सार्वजनिक सभाओं पर व्यापक प्रतिबंध हटाने और शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार का सम्मान करने का आग्रह किया गया। विशेषज्ञों ने इंटरनेट सेवाओं में बाधा डालने तथा बायोमेट्रिक तकनीक सहित डिजिटल निगरानी के संभावित दुरुपयोग पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन इसके लिए उठाए गए कदम आवश्यक, वैधानिक और स्थिति के अनुपात में होने चाहिए।
7,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लेने का दावा
संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने अपने बयान में दावा किया कि हाल के प्रदर्शनों के दौरान नई दिल्ली में 7,000 से अधिक युवाओं, पत्रकारों, वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों के सदस्यों को कथित रूप से मनमाने ढंग से हिरासत में लिया गया।
विशेषज्ञों के अनुसार, कई लोगों को दूर स्थित हिरासत केंद्रों में ले जाया गया। कुछ प्रदर्शनकारियों के मोबाइल फोन जब्त करने और उनसे प्रदर्शन संबंधी सामग्री हटाने के आरोप भी सामने आए। बयान में कहा गया कि हिरासत में लिए गए अधिकांश लोगों को लगभग 24 घंटे के भीतर रिहा कर दिया गया। यह संख्या संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों की ओर से उद्धृत रिपोर्टों पर आधारित है। इसे स्वतंत्र रूप से सत्यापित अंतिम सरकारी आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।
विशेषज्ञों ने प्रदर्शनकारियों को चोट पहुंचने, दुर्व्यवहार और महिलाओं के खिलाफ कथित लैंगिक हिंसा की शिकायतों पर विशेष चिंता व्यक्त की। उन्होंने मांग की कि ऐसे आरोपों की जांच बिना देरी के की जाए और उल्लंघन साबित होने पर पीड़ितों को न्याय तथा उचित मुआवजा मिले।
मतदाता सूची विवाद से क्यों बढ़ा विरोध?
भारत में हालिया विरोध प्रदर्शनों का एक प्रमुख कारण चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण, यानी Special Intensive Revision (SIR), रहा है। विपक्षी दलों और प्रदर्शनकारी संगठनों का आरोप है कि पुनरीक्षण के दौरान लगभग 13 करोड़ मतदाता प्रविष्टियां हटाई गईं और इससे गरीब, प्रवासी तथा वंचित समुदायों के पात्र मतदाताओं के अधिकार प्रभावित होने की आशंका पैदा हुई। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों तथा Cockroach Janta Party (CJP) जैसे युवा संगठनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किए हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने पक्षपात के आरोपों से इनकार किया है। आयोग का कहना है कि मृत, स्थानांतरित, दोहरी और अन्य अपात्र प्रविष्टियों को हटाने के उद्देश्य से पुनरीक्षण किया गया। गलत तरीके से नाम हटाए जाने पर पात्र मतदाताओं के लिए आपत्ति और अपील की प्रक्रिया उपलब्ध है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि मतदाता सूची से हटाई गई प्रविष्टियों की संख्या और वास्तविक रूप से मतदान के अधिकार से वंचित हुए पात्र नागरिकों की संख्या एक समान नहीं मानी जा सकती।
दिल्ली में प्रदर्शन और पुलिस की कार्रवाई
10 अक्टूबर को दिल्ली में आयोजित विरोध प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बल तैनात किए गए थे। समाचार एजेंसी Reuters के अनुसार, गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने उस दिन दिल्ली में 2,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने की जानकारी दी थी। राजधानी के कई इलाकों में बैरिकेड लगाए गए, कुछ मेट्रो स्टेशन बंद रहे और मध्य दिल्ली के कुछ हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बाधित हुईं। पुलिस कार्रवाई को लेकर प्रदर्शनकारी संगठनों ने सवाल उठाए, जबकि प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने और प्रतिबंधात्मक आदेशों के पालन की आवश्यकता पर जोर दिया। इससे पहले शिक्षा व्यवस्था और परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने को लेकर भी बड़े छात्र आंदोलन हुए थे। संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने अपने बयान में इन प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया है।
भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय आलोचना पर क्या जवाब दिया?
संयुक्त राष्ट्र की आलोचना पर भारत का रुख पहले से स्पष्ट रहा है। अक्टूबर की शुरुआत में दिल्ली के प्रदर्शनों को लेकर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की टिप्पणियों को भारत ने अनुचित और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताया था।जिनेवा स्थित भारतीय मिशन ने कहा था कि देश का संविधान शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस अधिकार पर उचित कानूनी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
21 अक्टूबर को The Economic Times में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भारत की अधिकारी बरखा ताम्रकार ने भी अप्रमाणित आरोपों को अंतिम निष्कर्ष की तरह प्रस्तुत करने के खिलाफ आगाह किया।
हालांकि, उनका बयान अलग संयुक्त राष्ट्र चर्चा के दौरान दिया गया था। इसे 20 अक्टूबर के विशेषज्ञों के बयान पर सीधी प्रतिक्रिया नहीं माना जाना चाहिए।
क्या अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार नियमों का उल्लंघन हुआ?
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण, निहत्थे सभा का अधिकार देता है। हालांकि, कानून के तहत इन अधिकारों पर कुछ युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों का तर्क है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन को रोकने के लिए व्यापक हिरासत, अत्यधिक बल या अनावश्यक निगरानी जैसे कदम गंभीर मानवाधिकार प्रश्न पैदा करते हैं।उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत व्यापक प्रतिबंधात्मक आदेशों के कथित इस्तेमाल पर भी चिंता व्यक्त की।
यह समझना जरूरी है कि विशेषज्ञों का बयान किसी अदालत का फैसला नहीं है। वे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त स्वतंत्र विशेषज्ञ हैं, जिनका काम मानवाधिकार संबंधी घटनाओं की निगरानी करना और सरकारों के सामने चिंताएं उठाना है।
आगे क्या होगा?
संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने पुलिस और संबंधित सुरक्षा एजेंसियों के आचरण की स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा विस्तृत जांच की मांग की है।
इस घटनाक्रम ने दो महत्वपूर्ण सवाल सामने रखे हैं। पहला, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए? दूसरा, पुलिस कार्रवाई के खिलाफ शिकायतों की ऐसी जांच कैसे हो जिस पर प्रदर्शनकारियों और प्रशासन, दोनों को विश्वास हो? भारत सरकार का पक्ष कानून-व्यवस्था और संवैधानिक सीमाओं पर केंद्रित है, जबकि संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञ नागरिक स्वतंत्रता तथा कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की जवाबदेही पर जोर दे रहे हैं।
अब आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि आरोपों की जांच कैसे होती है, क्या प्रमाण सामने आते हैं और संबंधित संस्थाएं उन पर क्या कार्रवाई करती हैं।
