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राजनीति

बिहार में सियासी समीकरण बदले! JDU को हराने वाले दो निर्दलीय MLC का BJP की ओर झुकाव, दल-बदल कानून पर छिड़ा विवाद।

पटना: बिहार की राजनीति में विधान परिषद चुनाव के नतीजों के कुछ ही दिनों बाद एक नया विवाद खड़ा हो गया है। हाल ही में जनता दल यूनाइटेड (JDU) के उम्मीदवारों को हराकर विधान परिषद पहुंचे दो निर्दलीय सदस्य बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) के समर्थन में आ गए हैं। 31 अक्टूबर को दोनों नेताओं ने पटना स्थित BJP कार्यालय में पार्टी के प्रति अपना समर्थन जताया और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में विश्वास व्यक्त किया।

बिहार में सियासी समीकरण बदले! JDU को हराने वाले दो निर्दलीय MLC का BJP की ओर झुकाव, दल-बदल कानून पर छिड़ा विवाद।
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द्वारा साधना गुप्ता

स्रोत: The Indian Express, The New Indian Express, ThePrint, NDTV India, Outlook (PTI), Constitution of India.

हालांकि, इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी पेच भी सामने आया है। शुरुआत में BJP की ओर से दोनों नेताओं के पार्टी में शामिल होने की घोषणा की गई थी, लेकिन विवाद बढ़ने के बाद BJP और दोनों MLC ने कहा कि उन्होंने औपचारिक रूप से पार्टी की सदस्यता नहीं ली, बल्कि BJP को समर्थन दिया है। दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और जन सुराज पार्टी ने इसे संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल का मामला बताते हुए दोनों की सदस्यता रद्द करने की मांग उठाई है।

कौन हैं BJP के समर्थन में आए दोनों निर्दलीय MLC?

इस राजनीतिक घटनाक्रम में पहला नाम बंशीधर ब्रजवासी का है। उन्होंने तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतकर विधान परिषद में अपनी जगह बनाई। उन्होंने JDU के उम्मीदवार अभिषेक झा को हराया। ब्रजवासी के लिए यह लगातार दूसरी जीत है। इससे पहले भी वह इसी निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद पहुंचे थे।

दूसरे नेता राहुल राज हैं, जिन्होंने सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जीत दर्ज की। उन्होंने JDU के उम्मीदवार आनंद पुष्कर को पराजित किया। राहुल राज पहले BJP से जुड़े रहे थे, लेकिन पार्टी से टिकट नहीं मिलने के बाद उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का फैसला किया था। चुनाव जीतने के बाद उनका फिर से BJP के करीब आना बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। दोनों नेताओं की जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि उन्होंने उन निर्वाचन क्षेत्रों में NDA के सहयोगी JDU के उम्मीदवारों को हराया था, जहां गठबंधन के भीतर चुनावी मुकाबला था।

सम्राट चौधरी से मुलाकात के बाद लिया फैसला

31 अक्टूबर को दोनों निर्दलीय MLC ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात की। इसके बाद वे पटना स्थित BJP कार्यालय पहुंचे और पार्टी के नेताओं के साथ बैठक में शामिल हुए। BJP प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी की मौजूदगी में दोनों नेताओं का स्वागत किया गया।

राहुल राज ने BJP के प्रति अपनी पुरानी राजनीतिक निष्ठा का जिक्र करते हुए कहा कि गठबंधन की परिस्थितियों के कारण उन्होंने पहले अलग रास्ता चुना था, लेकिन उनका BJP से जुड़ाव बना रहा। वहीं बंशीधर ब्रजवासी ने कहा कि मुख्यमंत्री के साथ बातचीत के बाद उन्हें लगा कि BJP के साथ रहकर अपने निर्वाचन क्षेत्र और शिक्षकों से जुड़े मुद्दों को बेहतर तरीके से उठा सकेंगे। हालांकि, बाद में दोनों नेताओं ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि उन्होंने BJP को समर्थन दिया है, औपचारिक सदस्यता नहीं ली है। BJP प्रदेश अध्यक्ष ने भी इसी रुख का समर्थन किया।

JDU को क्यों लगा राजनीतिक झटका?

इस घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि दोनों MLC ने चुनाव में JDU उम्मीदवारों को हराया था। अब चुनाव जीतने के बाद उनका BJP के समर्थन में आना NDA के अंदर राजनीतिक संतुलन को लेकर सवाल खड़े कर रहा है। बिहार में BJP और JDU दोनों सत्ता गठबंधन के महत्वपूर्ण सहयोगी हैं। ऐसे में JDU के उम्मीदवारों को हराने वाले निर्दलीय नेताओं का BJP के करीब जाना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

हालांकि, इस घटनाक्रम को BJP और JDU के बीच सीधे टकराव का प्रमाण नहीं माना जा सकता। दोनों दलों की ओर से गठबंधन में किसी औपचारिक टूट या विवाद की पुष्टि नहीं की गई है। लेकिन यह जरूर है कि विधान परिषद में दोनों सहयोगी दलों की राजनीतिक स्थिति और आपसी समन्वय पर चर्चा शुरू हो गई है।

दल-बदल कानून के घेरे में कैसे आए दोनों MLC?

इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची है, जिसे दल-बदल विरोधी कानून के नाम से जाना जाता है। इस कानून के तहत यदि कोई निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करता है, तो उसकी विधान परिषद या विधानसभा की सदस्यता अयोग्य घोषित की जा सकती है। दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2(2) में इस प्रावधान का उल्लेख है। वहीं, सदस्य की अयोग्यता से जुड़े मामले में फैसला संबंधित सदन के सभापति या अध्यक्ष करते हैं। उनके फैसले की न्यायिक समीक्षा भी संभव है।

यही कारण है कि दोनों नेताओं के BJP में शामिल होने की शुरुआती घोषणा के बाद कानूनी विवाद खड़ा हो गया। अब सवाल यह है कि क्या केवल किसी राजनीतिक दल को समर्थन देना और औपचारिक रूप से उसकी सदस्यता लेना कानून की नजर में एक समान है? इस मामले में वास्तविक स्थिति तय करने के लिए दोनों नेताओं के दस्तावेज, उनके सार्वजनिक बयान और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच महत्वपूर्ण होगी।

तेजस्वी यादव ने उठाई सदस्यता रद्द करने की मांग

दोनों निर्दलीय MLC के BJP के साथ जुड़ने की खबर सामने आने के बाद RJD नेता और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होना संविधान की दसवीं अनुसूची का उल्लंघन है। तेजस्वी ने दोनों MLC की सदस्यता रद्द करने की मांग की और BJP पर संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी करने का आरोप लगाया।

वहीं, जन सुराज पार्टी ने भी इस मामले को गंभीरता से उठाया। 2 नवंबर को पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने बिहार विधान परिषद के सभापति राम बचन राय से मुलाकात कर दोनों सदस्यों की अयोग्यता की मांग की। पार्टी का कहना है कि चुनाव जीतने के तुरंत बाद राजनीतिक दल में शामिल होने का फैसला दल-बदल कानून के दायरे में आता है। कांग्रेस और RJD की ओर से भी इस मामले में आपत्ति जताई गई है।

BJP के सामने अब क्या है चुनौती?

BJP के लिए यह मामला केवल दो अतिरिक्त नेताओं के समर्थन तक सीमित नहीं है। अब पार्टी को यह स्पष्ट करना होगा कि दोनों MLC की राजनीतिक स्थिति क्या है और क्या उनका समर्थन संविधान के प्रावधानों के अनुरूप है। दूसरी तरफ विधान परिषद के सभापति के सामने भी एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल है। यदि औपचारिक सदस्यता लेने के पर्याप्त प्रमाण सामने आते हैं, तो दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता का मामला विचाराधीन हो सकता है। फिलहाल इस मामले में अंतिम फैसला आना बाकी है। इसलिए दोनों नेताओं की विधान परिषद सदस्यता को समाप्त मानना जल्दबाजी होगी।

बिहार की राजनीति में आगे क्या होगा?

बिहार की राजनीति में यह घटनाक्रम कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। एक तरफ BJP को दो निर्दलीय MLC का समर्थन मिला है, तो दूसरी तरफ JDU के उम्मीदवारों को हराने वाले इन नेताओं के फैसले ने NDA के भीतर राजनीतिक समीकरणों को चर्चा में ला दिया है। वहीं, RJD और जन सुराज इस मुद्दे को संवैधानिक नियमों और लोकतांत्रिक मर्यादाओं से जोड़कर उठा रहे हैं। आने वाले दिनों में विधान परिषद के सभापति का रुख इस विवाद की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज केवल BJP को बाहर से समर्थन देंगे या उनकी औपचारिक राजनीतिक सदस्यता को लेकर विवाद आगे भी जारी रहेगा? बिहार की राजनीति में इस घटनाक्रम पर सभी दलों की नजर बनी हुई है।

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