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राजनीति

CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मुंबई में उद्धव-राज ठाकरे का संयुक्त मार्च, विपक्षी दलों का भी समर्थन

मुंबई में रविवार को शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर संयुक्त मार्च का नेतृत्व करने वाले हैं। कांग्रेस और NCP (SP) ने भी इस प्रदर्शन को समर्थन दिया है।

CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मुंबई में उद्धव-राज ठाकरे का संयुक्त मार्च, विपक्षी दलों का भी समर्थन
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: Hindustan Times / The Indian Express

मुंबई में सुबह 10 बजे ठाकरे बंधुओं का मार्च

महाराष्ट्र की राजनीति में चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर जारी विवाद के बीच उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे रविवार, 4 अक्टूबर को मुंबई में एक साथ सड़क पर उतरने वाले हैं।

यह विरोध मार्च मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे सवालों की पृष्ठभूमि में आयोजित किया जा रहा है।

ताजा कार्यक्रम के अनुसार मार्च सुबह 10 बजे Metro Cinema से शुरू होकर बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) मुख्यालय तक जाएगा। पहले इसे Byculla से शुरू करने की योजना थी, लेकिन पुलिस के अनुरोध के बाद मार्ग में बदलाव किया गया।

कांग्रेस और NCP (SP) का भी समर्थन

यह प्रदर्शन केवल शिवसेना (UBT) और MNS तक सीमित नहीं रहने वाला है। महा विकास आघाड़ी में शिवसेना (UBT) की सहयोगी कांग्रेस और शरद पवार के नेतृत्व वाली NCP (SP) ने भी मार्च को समर्थन दिया है।

NCP (SP) के प्रवक्ता Clyde Crasto ने पार्टी की भागीदारी की पुष्टि की, जबकि कांग्रेस नेता Nana Patole ने भी कहा कि उनकी पार्टी मार्च में शामिल होगी।

इससे प्रदर्शन को महाराष्ट्र में व्यापक विपक्षी लामबंदी के तौर पर देखा जा रहा है।

विवाद के केंद्र में मतदाता सूची और SIR

विरोध का प्रमुख मुद्दा मतदाता सूचियों की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर विपक्ष की आपत्तियां हैं।

उद्धव और राज ठाकरे सहित विपक्षी नेताओं ने चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाए हैं। यहां यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि ये विपक्ष की ओर से लगाए गए आरोप और राजनीतिक दावे हैं; इन्हें स्वतः सिद्ध तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।

ठाकरे नेताओं ने इससे पहले भी मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर संयुक्त प्रदर्शन किया था।

पार्टी के झंडों के बजाय तिरंगे पर जोर

मार्च की घोषणा करते समय राज ठाकरे ने कहा था कि प्रदर्शन में राजनीतिक दलों के झंडों के बजाय तिरंगा प्रमुख रूप से इस्तेमाल किया जाएगा।

उन्होंने प्रदर्शन को किसी एक राजनीतिक दल के खिलाफ अभियान के बजाय चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े सवालों पर केंद्रित बताया था और सत्तारूढ़ दलों सहित अन्य राजनीतिक दलों को भी इसमें शामिल होने का निमंत्रण दिया था।

CJP के प्रदर्शन के बाद बढ़ा राजनीतिक दबाव

ठाकरे बंधुओं का मार्च ऐसे समय हो रहा है जब CJP ने भी मुंबई में CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था।

2 अक्टूबर को शिवाजी पार्क में हुए CJP प्रदर्शन के बाद दिल्ली में भी इसी मुद्दे पर विरोध देखने को मिला। दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया था।

इस तरह चुनाव आयोग और CEC को लेकर विरोध अब अलग-अलग राजनीतिक तथा नागरिक समूहों के प्रदर्शनों का विषय बन चुका है।

उद्धव और राज ठाकरे की बढ़ती राजनीतिक नजदीकी

मार्च का एक दूसरा महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू उद्धव और राज ठाकरे का लगातार एक मंच पर आना है।

दोनों नेता लंबे समय तक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं, लेकिन हाल के मुद्दों पर उनकी सार्वजनिक साझेदारी बढ़ी है। Hindustan Times के अनुसार, हाल में मतभेद कम होने के बाद यह तीसरा मौका है जब दोनों चचेरे भाई किसी मुद्दे पर साथ आए हैं।

इसलिए रविवार का मार्च केवल चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध के रूप में ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की बदलती विपक्षी राजनीति के संकेत के तौर पर भी देखा जा सकता है।

मार्च क्यों महत्वपूर्ण है?

इस प्रदर्शन का महत्व दो स्तरों पर है।

पहला, मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया जैसे मुद्दे सीधे चुनावी व्यवस्था में जनता के भरोसे से जुड़े होते हैं। ऐसे आरोपों पर पारदर्शी जवाब और तथ्यों पर आधारित सार्वजनिक चर्चा लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण होती है।

दूसरा, उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे, कांग्रेस और NCP (SP) जैसे अलग-अलग राजनीतिक पक्षों का एक मुद्दे पर साथ आना महाराष्ट्र में विपक्षी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

हालांकि, प्रदर्शन की राजनीतिक ताकत का वास्तविक आकलन केवल भीड़ या नारों से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि विपक्ष अपने आरोपों के समर्थन में क्या प्रमाण प्रस्तुत करता है और चुनाव आयोग उन सवालों पर क्या प्रतिक्रिया देता है।

इसलिए इस विवाद को रिपोर्ट करते समय राजनीतिक आरोपों, सत्यापित तथ्यों और संस्थागत प्रतिक्रिया के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आवश्यक है।

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