देश के चार प्रमुख राज्यों में मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की विधान परिषदों की कुल 28 सीटों के लिए सुबह आठ बजे से वोटों की गिनती शुरू हुई। इन सीटों पर 23 अक्टूबर को मतदान कराया गया था। चुनाव आयोग के निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार पूरी निर्वाचन प्रक्रिया 31 अक्टूबर तक संपन्न होनी है। मतगणना के साथ भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और विभिन्न क्षेत्रीय दलों की निगाहें चुनावी नतीजों पर टिकी हैं।
उत्तर प्रदेश में 11 सीटों पर सबसे बड़ा मुकाबला
चारों राज्यों में सबसे अधिक 11 सीटें उत्तर प्रदेश की हैं। इनमें पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं। कुल 152 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। लगभग 14.81 लाख पंजीकृत मतदाताओं के लिए 72 जिलों में 2,697 मतदान केंद्र बनाए गए थे।लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ और इलाहाबाद-झांसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के साथ छह शिक्षक सीटों पर भी राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।
प्रदेश में मुख्य मुकाबला बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच माना जा रहा है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले इन नतीजों को दोनों दलों की संगठनात्मक तैयारियों के एक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता आधार विधानसभा चुनावों से अलग होता है। इसलिए इन परिणामों को विधानसभा चुनाव का सीधा पूर्वानुमान मानना उचित नहीं होगा।
बिहार में आठ सीटों पर गठबंधन और बगावत की चुनौती
बिहार विधान परिषद की आठ सीटों पर भी मतगणना हो रही है। इनमें चार स्नातक और चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं। पटना, दरभंगा, तिरहुत और कोसी स्नातक क्षेत्रों के साथ पटना, दरभंगा, तिरहुत तथा सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के परिणाम घोषित होने हैं। यहां राजनीतिक मुकाबला उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़ और गठबंधन की रणनीति के कारण दिलचस्प हो गया है।
पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र विशेष चर्चा में है। रिपोर्टों के अनुसार, जेडीयू विधायक अनंत सिंह ने अपनी पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार के बजाय जन सुराज के उम्मीदवार अनुज सिंह का समर्थन किया है। इससे मुकाबले में राजनीतिक बगावत का पहलू भी जुड़ गया है।बिहार में इन चुनावों के परिणाम यह संकेत दे सकते हैं कि शिक्षित और शिक्षक मतदाता वर्ग के बीच किस दल की पकड़ मजबूत है।
महाराष्ट्र में पांच सीटों पर महायुति और महाविकास आघाड़ी आमने-सामने
महाराष्ट्र विधान परिषद की पांच सीटों पर कुल 182 उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं। इनमें पुणे, नागपुर और औरंगाबाद संभाग की स्नातक सीटें तथा पुणे और अमरावती की शिक्षक सीटें शामिल हैं।
राज्य में बीजेपी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन और विपक्षी महाविकास आघाड़ी के बीच महत्वपूर्ण मुकाबला है। हालांकि, कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में बागी और निर्दलीय उम्मीदवारों की मौजूदगी प्रमुख दलों की रणनीति को प्रभावित कर सकती है।
पुणे स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में बीजेपी की डॉ. स्मिता जाधव, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार गुट की हर्षदा देशमुख-जाधव और बागी उम्मीदवार सुनील मोदी के बीच मुकाबला चर्चा में है।
पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भी कई प्रमुख उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। यहां शिक्षकों से संबंधित मुद्दों के साथ उम्मीदवारों का स्थानीय संपर्क महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
कर्नाटक में कांग्रेस के सामने बीजेपी-जेडीएस गठबंधन
कर्नाटक विधान परिषद की चार सीटों पर सत्ताधारी कांग्रेस और बीजेपी-जेडीएस गठबंधन के बीच राजनीतिक मुकाबला है।इनमें कर्नाटक दक्षिण-पूर्व और पश्चिम स्नातक निर्वाचन क्षेत्र तथा उत्तर-पूर्व और बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं।कर्नाटक में इन चुनावों के जरिए कांग्रेस की संगठनात्मक क्षमता और विपक्षी गठबंधन के आपसी तालमेल की परीक्षा होगी। बीजेपी और जेडीएस के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उनका गठबंधन मतदाताओं तक कितना प्रभावी ढंग से पहुंच पाया है। इन चार सीटों के नतीजे राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों को समझने में उपयोगी संकेत दे सकते हैं।
सामान्य विधानसभा चुनावों से कैसे अलग हैं ये चुनाव?
विधान परिषद के स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की चुनावी प्रक्रिया विधानसभा चुनावों से अलग है। इनमें संबंधित निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में पंजीकृत पात्र स्नातक और शिक्षक मतदान करते हैं।
मतदाता उम्मीदवारों को वरीयता के क्रम में चुनते हैं। इस कारण मतगणना की प्रक्रिया भी सामान्य विधानसभा चुनाव से अलग होती है और कुछ सीटों पर परिणाम आने में अधिक समय लग सकता है।
विधान परिषद राज्य की विधायिका का उच्च सदन है। इसके सदस्य सामान्यतः छह वर्ष के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं। यह सदन विधायी चर्चा, समीक्षा और विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधित्व में भूमिका निभाता है।
बागी उम्मीदवार बदल सकते हैं चुनावी समीकरण
इन चुनावों की एक बड़ी विशेषता बागी और निर्दलीय उम्मीदवारों की मौजूदगी है। बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।कई निर्वाचन क्षेत्रों में स्थानीय प्रभाव रखने वाले उम्मीदवार राजनीतिक दलों के आधिकारिक प्रत्याशियों को चुनौती दे रहे हैं। ऐसे में परिणाम केवल दलगत समर्थन पर निर्भर नहीं होंगे, बल्कि उम्मीदवार की व्यक्तिगत लोकप्रियता और मतदाताओं से सीधे संपर्क का असर भी दिखाई दे सकता है।राजनीतिक दलों के लिए यह चुनाव अपने संगठन में असंतोष और गठबंधन के भीतर समन्वय का आकलन करने का अवसर भी है।
