दिल्ली में चुनाव आयोग तक मार्च निकालने की तैयारी
राजधानी दिल्ली में प्रदर्शनकारियों ने गुरुद्वारा बंगला साहिब से पटेल चौक होते हुए चुनाव आयोग के कार्यालय तक मार्च निकालने की योजना बनाई है। आयोजकों का कहना है कि आंदोलन का उद्देश्य मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाना है।
हालांकि, दिल्ली में सुरक्षा प्रतिबंधों और प्रदर्शन की अनुमति को लेकर स्थिति संवेदनशील बनी हुई है। ऐसे में प्रस्तावित मार्च के रास्ते और पुलिस की कार्रवाई पर भी नजर रहेगी।
प्रकाश राज, प्रशांत भूषण और राकेश टिकैत जैसे बड़े नाम चर्चा में
आंदोलन में कई चर्चित सामाजिक और राजनीतिक हस्तियों के शामिल होने की संभावना जताई गई है। इनमें अभिनेता प्रकाश राज, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, किसान नेता राकेश टिकैत, राजनीतिक अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर, सामाजिक कार्यकर्ता तुषार गांधी और कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके शामिल हैं।
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नेहा बोरा और छात्र नेता आइशी घोष के नाम भी सामने आए हैं। हालांकि, इन सभी की वास्तविक भागीदारी की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
आयोजकों के अनुसार, 14 अक्टूबर को विभिन्न सामाजिक समूहों की बैठक में 200 से अधिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। इसी बैठक में विरोध को व्यापक बनाने का फैसला लिया गया।
संयुक्त किसान मोर्चा भी विरोध में उतरा
संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने भी 23 अक्टूबर को देशभर में जिला, तहसील और ब्लॉक स्तर पर प्रदर्शन का आह्वान किया है।
अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष अशोक धवले ने कहा है कि यह आंदोलन केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें किसानों के अलावा छात्र, युवा, महिलाएं और श्रमिक संगठन भी भाग ले सकते हैं।
बिहार के भभुआ में भी किसान संगठनों ने प्रतिवाद मार्च की घोषणा की है। इससे स्पष्ट है कि आंदोलन के आयोजक राष्ट्रीय राजधानी के साथ छोटे शहरों और जिलों में भी अपनी मांगें पहुंचाना चाहते हैं।
आखिर SIR को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR मतदाता सूचियों की जांच और अद्यतन करने की प्रक्रिया है। चुनाव आयोग के अनुसार, इसका उद्देश्य मृत, स्थानांतरित, अपात्र और दोहराई गई प्रविष्टियों को हटाकर मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना है।
दूसरी ओर, विरोध करने वाले संगठनों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम भी हटाए गए हैं। उनका कहना है कि इससे नागरिकों के मतदान के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, आयोग ने पिछले वर्ष से मतदाता सूचियों से लगभग 13 करोड़ नाम हटाए जाने का विवरण दिया था। हालांकि, यह आंकड़ा अपने आप में 13 करोड़ पात्र मतदाताओं के अधिकार छिनने का प्रमाण नहीं है। आयोग का कहना है कि गलती से हटाए गए पात्र मतदाता दोबारा पंजीकरण करा सकते हैं।
चुनाव आयोग के अंदरूनी मतभेदों से बढ़े सवाल
विवाद को उस समय नया मोड़ मिला जब इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में विभिन्न फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं।
इन खुलासों के बाद विपक्षी दलों ने आयोग की निर्णय प्रक्रिया और पारदर्शिता पर सवाल उठाए। हालांकि, आयोग का पक्ष रहा है कि संस्थागत चर्चा में अलग-अलग विचार सामने आना सामान्य प्रक्रिया है और उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
इस मामले में आरोपों और उपलब्ध दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच की मांग भी उठ रही है।
पहले भी प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई
अक्टूबर के दौरान दिल्ली और मुंबई सहित विभिन्न स्थानों पर चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन हो चुके हैं।
13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका सहित कई लोगों को हिरासत में लिया गया था। बाद में दोनों नेताओं की न्यायिक हिरासत बढ़ाई गई। इसके बाद उनकी रिहाई की खबर भी सामने आई।
दिल्ली में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत लागू प्रतिबंधों के कारण आज के प्रस्तावित मार्च में भी प्रशासनिक अनुमति महत्वपूर्ण होगी।
बीजेपी भी अपने अभियान के साथ मैदान में
इस विरोध प्रदर्शन के बीच भारतीय जनता पार्टी ने भी विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की तैयारी की है।
रिपोर्टों के अनुसार, बीजेपी 23 से 31 अक्टूबर तक 'लोकतंत्र बचाओ, भीड़तंत्र हटाओ' अभियान चलाने जा रही है। पार्टी विभिन्न जिलों में पदयात्राओं और संवाद कार्यक्रमों के जरिए SIR पर अपना पक्ष रखेगी।
बीजेपी और चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में बदलाव के जरिए किसी राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने के आरोपों से इनकार किया है।
क्या इस्तीफा देंगे मुख्य चुनाव आयुक्त?
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग अब सड़क से संसद तक पहुंच चुकी है। 22 अक्टूबर को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने संबंधी कोई नया प्रस्ताव आने पर संसदीय नियमों के अनुसार उसकी जांच की जाएगी।
संवैधानिक व्यवस्था के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए विशेष संसदीय प्रक्रिया अपनानी होती है। केवल राजनीतिक मांग या विरोध प्रदर्शन के आधार पर उन्हें पद से नहीं हटाया जा सकता।
आगे क्या होगा?
23 अक्टूबर का आंदोलन चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता अधिकारों पर चल रही बहस में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन सकता है। अब प्रमुख सवाल यही है कि प्रदर्शन को कितना समर्थन मिलता है, प्रशासन क्या रुख अपनाता है और चुनाव आयोग उठाई गई चिंताओं पर आगे क्या स्पष्टीकरण देता है।
फिलहाल देशव्यापी प्रदर्शन का आह्वान और इसकी तैयारियां पुष्ट हैं, लेकिन सभी स्थानों पर वास्तविक भागीदारी और प्रदर्शन के अंतिम नतीजों की पूरी जानकारी सामने आना बाकी है।
