विज्ञापन - शीर्ष बैनर
Read in English —JantaScope English
राजनीति

चुनावी हेरफेर के आरोपों के बीच कांग्रेस चुनाव क्यों लड़ रही है? बहिष्कार पर तेज हुई बहस

चुनावी हेरफेर और मतदाता सूची में गड़बड़ी के कांग्रेस के आरोपों के बीच सवाल उठ रहा है कि पार्टी चुनावों का बहिष्कार क्यों नहीं करती। जानिए कांग्रेस का तर्क, चुनाव आयोग और भाजपा का पक्ष तथा चुनाव बहिष्कार को लेकर जारी बहस।

चुनावी हेरफेर के आरोपों के बीच कांग्रेस चुनाव क्यों लड़ रही है? बहिष्कार पर तेज हुई बहस
विज्ञापन

द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: Reuters, The Indian Express, NDTV, Election Commission of India reports.

नई दिल्ली, 2 अक्टूबर 2026: भारत की चुनावी प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के आरोपों के बीच अब एक नया राजनीतिक सवाल चर्चा के केंद्र में आ गया है—यदि विपक्ष मानता है कि चुनावी व्यवस्था में गंभीर गड़बड़ियां हैं, तो वह उन्हीं चुनावों में हिस्सा क्यों ले रहा है?

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी हाल के महीनों में मतदाता सूचियों और चुनावी प्रक्रिया को लेकर लगातार गंभीर आरोप लगाते रहे हैं। कांग्रेस ने अलग-अलग राज्यों में कथित “वोट चोरी” और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दे उठाए हैं। चुनाव आयोग ने चुनावी हेरफेर के आरोपों से इनकार किया है और अपनी प्रक्रियाओं का बचाव किया है।

इस विवाद के बीच कांग्रेस से पूछा जा रहा है कि क्या चुनावों का बहिष्कार उसके आरोपों के अनुरूप अगला कदम होना चाहिए। कांग्रेस और विपक्ष से जुड़े कुछ नेताओं का जवाब है कि बहिष्कार से चुनावी प्रक्रिया में उनकी निगरानी और राजनीतिक भागीदारी ही कमजोर हो सकती है।

राहुल गांधी से पूछा गया—चुनाव का बहिष्कार क्यों नहीं?

हाल में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गांधी से सीधे पूछा गया कि यदि कांग्रेस चुनावों को लेकर इतने गंभीर आरोप लगा रही है तो पार्टी चुनावों का बहिष्कार क्यों नहीं करती।

गांधी ने इस सवाल को “distraction” बताते हुए कहा कि वह इससे ध्यान नहीं भटकाना चाहते। उन्होंने चुनाव बहिष्कार की घोषणा नहीं की। इससे पहले भी कांग्रेस ने चुनाव प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां उठाने के बावजूद चुनावी मुकाबलों में हिस्सा जारी रखा है।

इस प्रतिक्रिया के बाद बहस और तेज हो गई कि चुनाव लड़ते रहने और चुनावी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाने की रणनीतियां एक-दूसरे के साथ कैसे मेल खाती हैं।

कांग्रेस के आरोप क्या हैं?

राहुल गांधी और कांग्रेस ने मतदाता सूची में संशोधन, नाम हटाए जाने और Special Intensive Revision (SIR) जैसी प्रक्रियाओं को लेकर सवाल उठाए हैं।

राहुल गांधी ने हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर SIR प्रक्रिया के जरिए लोकतांत्रिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए और जांच की मांग की। ये कांग्रेस और गांधी के आरोप हैं; इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

Reuters के मुताबिक, व्यापक मतदाता सत्यापन अभियान के दौरान बड़ी संख्या में नाम प्रारंभिक सूचियों से बाहर रहने के बाद प्रक्रिया पर राजनीतिक और न्यायिक जांच बढ़ी है। चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची में बदलाव कानूनी प्रक्रिया के तहत किए गए हैं और राजनीतिक पक्षपात के आरोपों को उसने खारिज किया है।

फिर चुनाव बहिष्कार की मांग कहां से आई?

चुनाव न लड़ने की मांग केवल कांग्रेस के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से नहीं आई है।

Cockroach Janta Party (CJP) के संस्थापक अभिजीत डिपके ने विपक्ष से सवाल किया कि यदि वह चुनावों को “rigged” मानता है, तो फिर लगातार उनमें हिस्सा क्यों लेता है। उन्होंने तर्क दिया कि चुनाव में भागीदारी जारी रखने से उस प्रक्रिया को वैधता मिलने का जोखिम है जिस पर विपक्ष खुद सवाल उठा रहा है।

इस तर्क ने राजनीतिक बहस को दो अलग प्रश्नों में बांट दिया है—क्या चुनाव में भाग लेना व्यवस्था को स्वीकार करना है, या उसी व्यवस्था के भीतर रहकर उसे चुनौती देने का तरीका?

कांग्रेस पक्ष का तर्क: बहिष्कार से मैदान खाली होगा

कांग्रेस से जुड़े नेताओं की ओर से इसके विपरीत तर्क सामने आया है।

Congress Working Committee के स्थायी आमंत्रित सदस्य गुरदीप सिंह सप्पल ने कहा कि चुनावों का बहिष्कार करने से विपक्ष के पास बूथ स्तर पर मौजूद रहने और परिणामों को अदालत में चुनौती देने जैसे अवसर कम हो जाएंगे। उनका तर्क है कि चुनाव न लड़ना कथित अनियमितताओं को रोकने के बजाय निगरानी करने वाले विपक्षी प्रतिनिधियों को ही प्रक्रिया से बाहर कर सकता है।

तृणमूल कांग्रेस सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने भी चुनाव बहिष्कार के विचार का विरोध करते हुए तर्क दिया कि विपक्ष के मैदान छोड़ने का सीधा राजनीतिक लाभ सत्तारूढ़ दल को मिल सकता है।

चुनाव बहिष्कार का इतिहास क्या बताता है?

चुनावों का बहिष्कार राजनीतिक विरोध का पुराना तरीका है, लेकिन इसके परिणाम अलग-अलग परिस्थितियों में अलग रहे हैं।

NDTV द्वारा उद्धृत 2010 के Brookings Institution के एक अध्ययन में 1990 से 2009 के बीच 171 चुनाव बहिष्कारों का विश्लेषण किया गया था। उस अध्ययन का निष्कर्ष था कि सफल परिणाम वाले बहिष्कार बहुत कम थे और कई मामलों में विपक्ष को चुनावी मैदान छोड़ने का नुकसान उठाना पड़ा।

भारत में भी चुनाव बहिष्कार के उदाहरण रहे हैं। 1992 के पंजाब विधानसभा चुनाव में कई अकाली गुटों ने हिस्सा नहीं लिया था और मतदान प्रतिशत काफी कम रहा था। हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर किसी प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी द्वारा लोकसभा चुनाव का पूर्ण बहिष्कार आधुनिक भारतीय चुनावी राजनीति में सामान्य रणनीति नहीं रही है।

विवाद अब केवल चुनाव परिणामों तक सीमित नहीं

मौजूदा विवाद का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बहस केवल EVM या किसी एक चुनाव परिणाम पर केंद्रित नहीं है। मतदाता सूची में संशोधन, नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया तथा चुनाव आयोग की भूमिका भी राजनीतिक विवाद के केंद्र में आ गई है।

कर्नाटक में कांग्रेस के विरोध के बाद राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कथित फर्जी bulk Form-7 applications से जुड़े मामलों में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने का आश्वासन दिया है। कांग्रेस का आरोप है कि इन आवेदनों के जरिए मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाने का प्रयास हुआ।

इस तरह के मामलों की जांच और उनके अंतिम निष्कर्ष यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि विशिष्ट शिकायतों में वास्तविक अनियमितता हुई या नहीं।

भाजपा और चुनाव आयोग का पक्ष

भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि विपक्ष चुनावी हार के लिए संस्थाओं को जिम्मेदार ठहरा रहा है। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस से उसके आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत पेश करने की मांग भी की है।

चुनाव आयोग ने भी राजनीतिक पक्षपात और चुनावी हेरफेर के आरोपों से इनकार किया है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची में संशोधन निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के अनुसार किया जा रहा है।

इसलिए कांग्रेस द्वारा लगाए गए आरोपों, चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण और विशिष्ट मतदाता-सूची विवादों में सामने आने वाले दस्तावेजी या न्यायिक निष्कर्षों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।

कांग्रेस के सामने रणनीतिक सवाल

कांग्रेस के सामने फिलहाल दो समानांतर रास्ते दिखाई देते हैं—एक ओर चुनावी प्रक्रिया के खिलाफ राजनीतिक और कानूनी चुनौती जारी रखना और दूसरी ओर उन्हीं चुनावों में उम्मीदवार उतारकर सत्ता के लिए मुकाबला करना।

चुनाव बहिष्कार के समर्थक इसे कांग्रेस के आरोपों की तार्किक परिणति मानते हैं। इसके विपरीत, बहिष्कार का विरोध करने वाले नेताओं का तर्क है कि चुनाव न लड़ने से विपक्ष अपना प्रतिनिधित्व, बूथ स्तर की मौजूदगी और परिणामों को चुनौती देने की क्षमता कमजोर कर सकता है।

इस बहस का कोई स्वतः सिद्ध निष्कर्ष नहीं है। चुनावी अनियमितताओं के आरोपों की सत्यता का निर्धारण उपलब्ध साक्ष्य, संस्थागत जांच और जहां लागू हो वहां न्यायिक समीक्षा पर निर्भर करेगा; जबकि चुनाव लड़ना या बहिष्कार करना राजनीतिक दलों की रणनीतिक पसंद है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह बहस?

मुद्दा केवल कांग्रेस की चुनावी रणनीति का नहीं है। चुनावी व्यवस्था में जनता का भरोसा किसी भी लोकतंत्र के लिए बुनियादी महत्व रखता है।

गंभीर आरोप लगाए जाने पर उनका प्रमाण के आधार पर परीक्षण होना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना चुनावी संस्थाओं द्वारा अपनी प्रक्रियाओं के बारे में पारदर्शिता बनाए रखना।

आने वाले चुनावों में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की भागीदारी जारी रहती है या उनकी रणनीति बदलती है, यह अलग राजनीतिक प्रश्न है। फिलहाल कांग्रेस चुनाव बहिष्कार की घोषणा करने के बजाय चुनावी प्रक्रिया को लेकर अपने आरोपों और विरोध अभियान को आगे बढ़ा रही है।

साझा करें
विज्ञापन - मध्य लेख
विज्ञापन - नीचे