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राजनीति

CJP नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया, हिरासत बढ़ाने के आदेश को दी चुनौती

नई दिल्ली, 21 अक्टूबर 2026: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रमुख नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत का मामला अब दिल्ली हाई कोर्ट पहुंच गया है। दोनों नेताओं ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसके तहत उनकी पांच दिन की न्यायिक हिरासत समाप्त होने के बाद उसे दो दिन और बढ़ा दिया गया था।

CJP नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया, हिरासत बढ़ाने के आदेश को दी चुनौती
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द्वारा साधना गुप्ता

स्रोत: the indian express, live law, hindustan times, the new indian express, pti , reuters

मंगलवार, 20 अक्टूबर को दाखिल याचिका में दोनों नेताओं ने हिरासत बढ़ाने के फैसले को मनमाना और कानूनी प्रक्रिया के खिलाफ बताया है। उनकी ओर से तत्काल सुनवाई की मांग की गई है। दशहरे की छुट्टियों के कारण मंगलवार को मामले की सुनवाई नहीं हो सकी। अब बुधवार को विशेष सुनवाई की अनुमति मिलने की संभावना पर नजर है।

13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर क्या हुआ था?

पूरा विवाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन से शुरू हुआ।CJP नेताओं ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की थी।दिल्ली पुलिस ने 11 अक्टूबर को जंतर-मंतर को अधिकृत प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया था। इसके बावजूद 13 अक्टूबर को सौरव दास, आशुतोष रांका और उनके सहयोगी राष्ट्रीय ध्वज लेकर वहां पहुंचे।

पुलिस के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने प्रतिबंधों का उल्लंघन किया और कुछ लोग निजी परिसर के रास्ते जंतर-मंतर में दाखिल हुए। इस दौरान कुल 14 लोगों को हिरासत में लिया गया। 14 अक्टूबर को दोनों प्रमुख नेताओं को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया गया।

19 अक्टूबर को हिरासत दो दिन और क्यों बढ़ाई गई?

पांच दिन की हिरासत समाप्त होने के बाद सोमवार, 19 अक्टूबर को दोनों नेताओं को मंदिर मार्ग थाने में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ऋतु राज के सामने पेश किया गया। मजिस्ट्रेट ने पुलिस की ओर से रखी गई आशंकाओं और जमानतदारों से संबंधित दस्तावेजों की जांच के बाद हिरासत दो दिन बढ़ाने का आदेश दिया। आदेश में कहा गया कि दोनों नेताओं ने पहले दिए गए शांति बनाए रखने के बॉन्ड की शर्तों का जानबूझकर उल्लंघन किया। मजिस्ट्रेट ने गैर-अधिसूचित स्थानों पर बार-बार प्रदर्शन आयोजित करने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाए। दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने दावा किया कि उन्होंने सभी आवश्यक दस्तावेज जमा किए थे, लेकिन उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।

हाई कोर्ट में याचिका: किन आधारों पर दी गई चुनौती?

सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से अधिवक्ता अभिक चिमनी के माध्यम से दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। याचिका का मुख्य आधार संविधान का अनुच्छेद 21 है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पर्याप्त कानूनी आधार के बिना उनकी स्वतंत्रता सीमित की जा रही है। उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 135(3) के तहत हिरासत बढ़ाने के आदेश पर सवाल उठाए हैं। याचिका में धारा 140 के अंतर्गत जमानतदारों की जांच से जुड़ी प्रक्रिया का भी उल्लेख है।बचाव पक्ष के मुताबिक, जमानतदारों को अस्वीकार करने के कारण अस्पष्ट थे। उनका कहना है कि अतिरिक्त जमानतदार उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें पेश करने का अवसर नहीं मिला।

याचिका में यह आरोप भी लगाया गया कि मजिस्ट्रेट ने पुलिस की रिपोर्ट पर अत्यधिक निर्भरता दिखाई और स्वतंत्र रूप से पर्याप्त न्यायिक मूल्यांकन नहीं किया। हालांकि, ये याचिकाकर्ताओं के आरोप हैं। हाई कोर्ट द्वारा इन पर अंतिम निष्कर्ष दिया जाना अभी बाकी है।

जमानतदारों को लेकर आखिर क्या विवाद हुआ?

The Indian Express और LiveLaw की रिपोर्टों के अनुसार, मजिस्ट्रेट ने जमानतदारों के पहचान संबंधी दस्तावेजों में विसंगतियां पाई थीं। एक मामले में जमानत दस्तावेज की तस्वीर आधार कार्ड से मेल नहीं खाने का उल्लेख किया गया, जबकि दूसरे जमानतदार की व्यक्तिगत जानकारी पर सवाल उठाए गए।

मजिस्ट्रेट ने इन कारणों से नए जमानतदार प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। बचाव पक्ष का कहना है कि ऐसी विसंगतियों की उचित जांच की जा सकती थी और केवल इस आधार पर दोनों नेताओं को हिरासत में रखना आवश्यक नहीं था। याचिका में दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व फैसले का हवाला देते हुए व्यक्तिगत बॉन्ड पर रिहाई की संभावना पर भी जोर दिया गया है।

दिल्ली पुलिस ने दोनों मामलों की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी

हिरासत विवाद के बीच दिल्ली पुलिस ने सौरव दास और आशुतोष रांका से जुड़े दो मामलों की जांच क्राइम ब्रांच को स्थानांतरित कर दी है। समाचार एजेंसी PTI के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, दोनों मामले 13 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शनों से संबंधित हैं। इनमें जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस में हुई घटनाओं की जांच शामिल है। पुलिस का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करके कानून-व्यवस्था के लिए समस्या पैदा की। वहीं, CJP नेताओं का कहना है कि उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी राजनीतिक मांगें उठाई थीं।

ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और नवीन पटनायक ने उठाए सवाल

मामले ने अब व्यापक राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया है। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दोनों नेताओं की हिरासत की आलोचना करते हुए तत्काल रिहाई की मांग की है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी हिरासत को अनावश्यक बताते हुए सरकार पर राजनीतिक दबाव डालने का आरोप लगाया। ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने कहा कि राष्ट्रीय ध्वज फहराने से संबंधित घटना में इतनी लंबी हिरासत की समीक्षा होनी चाहिए। ये विपक्षी नेताओं की राजनीतिक प्रतिक्रियाएं हैं। हिरासत की वैधता पर अंतिम निर्णय न्यायालय को करना है।

विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की शक्तियों पर भी उठे सवाल

इस मामले ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की भूमिका को लेकर कानूनी चर्चा फिर तेज कर दी है। विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए निवारक कार्रवाई कर सकते हैं। हालांकि, उनकी शक्तियां न्यायिक मजिस्ट्रेट से अलग होती हैं और वे आपराधिक मुकदमों का नियमित परीक्षण नहीं करते।

इसलिए मामला केवल दो व्यक्तियों की रिहाई तक सीमित नहीं है। इसमें यह सवाल भी शामिल है कि संभावित कानून-व्यवस्था संबंधी आशंकाओं के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता कितने समय तक प्रतिबंधित की जा सकती है। कानूनी दृष्टि से आवश्यक है कि निवारक कार्रवाई में निर्धारित प्रक्रिया और संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन किया जाए।

21 अक्टूबर को क्या होगा?

बुधवार को दोनों नेताओं की बढ़ाई गई हिरासत की अवधि समाप्त होनी है। दिल्ली हाई कोर्ट में दशहरे के कारण नियमित कामकाज बंद है और सामान्य सुनवाई 26 अक्टूबर से शुरू होने की जानकारी सामने आई है। CJP की कानूनी टीम विशेष सुनवाई कराने का प्रयास कर रही है। हालांकि, बुधवार सुबह 10:30 बजे तक उपलब्ध रिपोर्टों में हाई कोर्ट द्वारा विशेष पीठ गठित करने या दोनों नेताओं की रिहाई का कोई पुष्ट नया आदेश सामने नहीं आया था। अब अगला महत्वपूर्ण सवाल यह है कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट दोनों नेताओं की रिहाई का आदेश देते हैं या हिरासत से संबंधित कोई नया निर्णय लिया जाता है।

इस मामले में अदालत का अगला कदम न केवल सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि विरोध प्रदर्शन, निवारक हिरासत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक कानूनी सवालों को भी प्रभावित कर सकता है।

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