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राजनीति

दिल्ली में 5 घंटे इंतजार, महज 10 मिनट सुनवाई: आशुतोष रांका और सौरव दास की रिहाई अटकी, हिरासत का छठा दिन

दिल्ली के मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन में रविवार, 18 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं को करीब पांच घंटे तक इंतजार करना पड़ा। उन्हें उम्मीद थी कि पार्टी के दो प्रमुख नेताओं, आशुतोष रांका और सौरव दास की रिहाई का रास्ता साफ हो जाएगा। लेकिन शाम को शुरू हुई सुनवाई महज आठ से दस मिनट में समाप्त हो गई। विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने खुद को मिल रही धमकियों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला दिया, जिसके बाद दोनों नेताओं की रिहाई पर कोई अंतिम फैसला नहीं हो सका।

दिल्ली में 5 घंटे इंतजार, महज 10 मिनट सुनवाई: आशुतोष रांका और सौरव दास की रिहाई अटकी, हिरासत का छठा दिन
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द्वारा साधना गुप्ता

स्रोत: हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया, the indian express , reuters

13 अक्टूबर को हिरासत में लिए गए रांका और दास का मामला 19 अक्टूबर को छठे दिन में पहुंच गया। दोनों को 14 अक्टूबर को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजा गया था। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों, पुलिस की कार्रवाई और कानूनी प्रक्रिया को लेकर नई बहस खड़ी कर दी है।

पांच घंटे का इंतजार, लेकिन सुनवाई कुछ ही मिनट चली

हिंदुस्तान टाइम्स की 19 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, CJP के पदाधिकारी रविवार को मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन पहुंचे थे। दोपहर करीब 12 बजे सुनवाई होने की उम्मीद थी, लेकिन कार्यवाही शाम लगभग पांच बजे शुरू हुई। पार्टी प्रतिनिधियों का कहना है कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट दोपहर करीब डेढ़ से दो बजे के बीच पुलिस स्टेशन पहुंच गए थे। इसके बावजूद मामले की सुनवाई काफी देर बाद हुई।

सुनवाई के दौरान मजिस्ट्रेट महेश कुमार मीणा ने बताया कि उन्हें दोनों नेताओं की रिहाई को लेकर धमकी भरे संदेश मिल रहे हैं। उन्होंने मानसिक दबाव और अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मजिस्ट्रेट ने जान को खतरा बताते हुए इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। इसके चलते रिहाई की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

आखिर क्यों गिरफ्तार हुए आशुतोष रांका और सौरव दास?

यह विवाद 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन से जुड़ा है। दिल्ली पुलिस के अनुसार, आशुतोष रांका, सौरव दास और अजिंक्य शिंदे समेत CJP के लगभग 14 सदस्य उस क्षेत्र में पहुंचे थे, जिसे कुछ दिन पहले आधिकारिक प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया गया था।

पुलिस का आरोप है कि समूह के सदस्यों ने बंद लोहे के गेट और सुरक्षा अवरोधों को पार करके इलाके में प्रवेश किया। अधिकारियों के मुताबिक, कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिसकर्मियों के काम में भी बाधा पहुंचाई। दूसरी ओर, CJP नेताओं का कहना है कि उनका उद्देश्य राष्ट्रीय ध्वज फहराना और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी राजनीतिक मांगों को सामने रखना था।

14 अक्टूबर को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने रांका और दास को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। आदेश में कहा गया कि उन्होंने शांति बनाए रखने के लिए पहले दिए गए बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया था। उस समय पर्याप्त जमानती आश्वासन उपलब्ध नहीं होने का भी उल्लेख किया गया।

जमानती बॉन्ड को लेकर पुलिस और CJP आमने-सामने

CJP की राष्ट्रीय सचिव आफरीन नवाज ने आरोप लगाया कि पार्टी के सदस्य 15 अक्टूबर से लगातार दोनों नेताओं की रिहाई के लिए आवश्यक दस्तावेज और जमानती बॉन्ड जमा कर रहे हैं। उनका कहना है कि अधिकारियों ने कभी फिक्स्ड डिपॉजिट के दस्तावेजों पर आपत्ति जताई, तो कभी जमानत देने वाले व्यक्तियों के दिल्ली के पते को लेकर सवाल उठाए। पार्टी की कानूनी मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह ने भी दावा किया कि औपचारिकताएं पूरी करने के बावजूद सुनवाई लगातार टाली जा रही है। उन्होंने इसे हिरासत बढ़ाने की कोशिश बताया।

हालांकि दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों से इनकार किया है।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, प्रस्तुत किए गए कुछ जमानती बॉन्ड में कमियां थीं, इसलिए उन्हें स्वीकार नहीं किया जा सका। अधिकारियों का कहना है कि पूरी प्रक्रिया कानूनी नियमों के अनुसार संचालित की जा रही है। इन परस्पर विरोधी दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

मजिस्ट्रेट को धमकी मिलने के मामले में FIR

रविवार की सुनवाई में नया मोड़ तब आया, जब मजिस्ट्रेट को कथित तौर पर मिल रही धमकियों का मामला सामने आया। इंडियन एक्सप्रेस की 19 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने पुष्टि की कि मजिस्ट्रेट की शिकायत पर नई दिल्ली जिले में आपराधिक धमकी से संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई है।

पुलिस का कहना है कि धमकियों की जांच आवश्यक है और ऐसे माहौल में न्यायिक जिम्मेदारी निभाना मुश्किल हो सकता है। वहीं CJP का तर्क है कि कथित धमकियों की जांच दोनों नेताओं की रिहाई से जुड़ी कार्यवाही से अलग होनी चाहिए। फिलहाल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों से यह स्थापित नहीं होता कि धमकी किसने दी थी। इसलिए किसी व्यक्ति या संगठन को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

दोबारा प्रदर्शन की आशंका भी बनी विवाद का हिस्सा

पुलिस ने सुनवाई के दौरान CJP संस्थापक अभिजीत दिपके के एक बयान का भी उल्लेख किया।

रिपोर्टों के अनुसार, दिपके ने रविवार को कहा था कि पार्टी आगे की रणनीति तय करेगी। पुलिस ने इसे संभावित नए प्रदर्शन से जोड़कर देखा। हालांकि CJP के प्रतिनिधियों ने कहा कि तत्काल किसी नए प्रदर्शन की योजना नहीं बनाई गई है।

यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी राजनीतिक संगठन की भविष्य की रणनीति तय करने की बात अपने आप में गैरकानूनी गतिविधि की पुष्टि नहीं करती। दूसरी तरफ, पुलिस को सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की वास्तविक आशंका की जांच करने का अधिकार है।

तिहाड़ जेल में अलग-अलग रखे गए दोनों नेता

इंडियन एक्सप्रेस की 17 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, सौरव दास को तिहाड़ की जेल संख्या दो और आशुतोष रांका को जेल संख्या चार में रखा गया था।

रिपोर्ट में जेल सूत्रों के हवाले से बताया गया कि दोनों को अलग-अलग उच्च सुरक्षा वाले वार्ड में रखा गया है। उनके आसपास अतिरिक्त निगरानी की व्यवस्था भी की गई थी। दिल्ली पुलिस का कहना है कि दोनों के खिलाफ कार्रवाई सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका और कथित कानूनी उल्लंघनों के आधार पर की गई है।

अब आगे क्या होगा?

इस मामले का संबंध सिर्फ दो नेताओं की रिहाई से नहीं, बल्कि विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की सरकारी जिम्मेदारी के बीच संतुलन से भी है।

भारतीय संविधान शांतिपूर्ण और निहत्थे एकत्र होने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन इस अधिकार पर कानून के अनुसार उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं। इसीलिए इस मामले में दो अलग सवाल महत्वपूर्ण हैं। पहला, क्या जंतर-मंतर में प्रवेश करने और पूर्व बॉन्ड की शर्तों के कथित उल्लंघन पर हिरासत की कार्रवाई उचित थी? दूसरा, क्या रिहाई से संबंधित दस्तावेजों और सुनवाई पर निर्णय समयबद्ध तरीके से लिया गया?

19 अक्टूबर की सुबह तक उपलब्ध रिपोर्टों में दोनों नेताओं की रिहाई की पुष्टि नहीं हुई थी। आगे की कानूनी कार्यवाही और मजिस्ट्रेट को मिली कथित धमकियों की जांच से मामले की स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।

फिलहाल आशुतोष रांका और सौरव दास की हिरासत को लेकर CJP और दिल्ली पुलिस के अलग-अलग दावे सामने हैं। अंतिम निष्कर्ष संबंधित कानूनी प्रक्रिया और जांच के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

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