UN में जयशंकर ने दुनिया की मौजूदा स्थिति पर क्या कहा?
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क में 81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) को संबोधित करते हुए दुनिया में जारी संघर्षों, आर्थिक दबाव और बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को लेकर गंभीर चिंता जताई।
26 सितंबर को अपने संबोधन में जयशंकर ने कहा कि शांति को केवल युद्ध न होने की स्थिति के रूप में नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार स्थिरता, सुरक्षा और भविष्य को लेकर भरोसा भी शांति के लिए जरूरी हैं।
उन्होंने कहा:
“अगर दुनिया लगातार धमकियों और दबावों का सामना करती रहे, तो हम वास्तव में खाई के किनारे रह रहे हैं। हमें नीचे धकेलने के लिए बस एक और कदम काफी है।”
जयशंकर की यह टिप्पणी किसी निश्चित या तत्काल वैश्विक आपदा की भविष्यवाणी नहीं थी। यह दुनिया में एक साथ बढ़ रहे सैन्य, आर्थिक और रणनीतिक दबावों को लेकर उनकी व्यापक दलील का हिस्सा थी।
‘Weaponisation of Everything’ से जयशंकर का क्या मतलब था?
जयशंकर के भाषण का एक प्रमुख हिस्सा इस बात पर केंद्रित था कि देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा अब पारंपरिक हथियारों और सैन्य ताकत तक सीमित नहीं रह गई है।
उन्होंने कहा:
“संयुक्त राष्ट्र के आठ दशक बाद यह स्वाभाविक हो जाना चाहिए था। इसके बजाय हम वास्तव में हर चीज का weaponisation होते देख रहे हैं।”
जयशंकर ने इस संदर्भ में Finance, Market Access, Supply Chains और Technology का उल्लेख किया।
उन्होंने संसाधनों और connectivity को भी ऐसे क्षेत्रों में शामिल किया जिनका इस्तेमाल रणनीतिक दबाव या leverage के रूप में किया जा सकता है।
उनका तर्क था कि इसी माहौल के कारण देश अपनी आर्थिक निर्भरता कम करने के लिए तेजी से “de-risking and diversifying” की रणनीति अपना रहे हैं।
यानी देश महत्वपूर्ण सप्लाई चेन, टेक्नोलॉजी और संसाधनों के लिए किसी एक स्रोत या देश पर अत्यधिक निर्भरता से बचने की कोशिश कर रहे हैं।
Global South पर ‘4F Crisis’ का दबाव
जयशंकर ने अपने भाषण में विकासशील देशों और Global South की चुनौतियों पर भी विशेष जोर दिया।
उन्होंने चार प्रमुख दबावों को “4F Crisis” के रूप में पेश किया:
Food — भोजन
Fuel — ईंधन
Fertilizer — उर्वरक
Finance — वित्त
जयशंकर ने कहा कि कई ऐसे देश भी वैश्विक संघर्षों की कीमत चुका रहे हैं जो उन संघर्षों से सीधे जुड़े नहीं हैं।
उन्होंने कहा:
“संघर्षों से दूर स्थित देशों को बिना किसी गलती के उसकी कीमत चुकानी पड़ रही है। जिन पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है, अक्सर उनकी आवाज सबसे कम होती है।”
इस मुद्दे का व्यापक आर्थिक महत्व है क्योंकि युद्ध और प्रमुख व्यापारिक मार्गों में व्यवधान से ऊर्जा, खाद्य पदार्थ, उर्वरक और परिवहन की लागत बढ़ सकती है।
इसका प्रभाव कम आय वाले और आयात पर अधिक निर्भर देशों पर अपेक्षाकृत ज्यादा पड़ सकता है।
समुद्री जहाजों पर हमलों को बताया ‘अस्वीकार्य’
जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर भी चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय waterways से गुजरने वाले commercial ships और seafarers को निशाना बनाना स्वीकार्य नहीं है।
जयशंकर ने कहा:
“अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों और नाविकों को निशाना बनाना पूरी तरह अस्वीकार्य है।”
उन्होंने Gulf और Red Sea से लेकर Black Sea तक commercial shipping पर हमलों का जिक्र किया।
विदेश मंत्री ने भारतीय और अन्य देशों के नाविकों की मौतों पर भी चिंता जताई।
भारत ने नागरिकों की सुरक्षा के साथ ऊर्जा और व्यापार के निर्बाध प्रवाह की जरूरत पर जोर दिया।
Shipping और Seafarers की सुरक्षा के लिए भारत की पहल
समुद्री सुरक्षा को लेकर भारत और Liberia ने Group of Friends on the Safety and Security of Shipping and Seafarers नाम से एक पहल शुरू की है।
इसका उद्देश्य commercial shipping और समुद्री कर्मचारियों के सामने बढ़ते सुरक्षा खतरों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक ध्यान केंद्रित करना है।
जयशंकर के अनुसार इसकी पहली बैठक में 25 देशों ने हिस्सा लिया।
यह मुद्दा वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया के merchandise trade का बड़ा हिस्सा समुद्री रास्तों से होता है।
Ukraine पर बोले—‘Endless War’ अब खत्म होना चाहिए
जयशंकर ने Ukraine में जारी युद्ध पर भी भारत का पक्ष रखा।
उन्होंने संघर्ष को गंभीर चिंता का विषय बताते हुए शांति की दिशा में प्रयासों का समर्थन दोहराया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टिप्पणी का उल्लेख करते हुए जयशंकर ने कहा:
“Endless war must give way now to an end to war.”
यानी लगातार चलता युद्ध अब युद्ध की समाप्ति का रास्ता दे।
उन्होंने कहा कि युद्ध समाप्त करने के प्रयासों के साथ-साथ seafarers की सुरक्षा और food, grain तथा energy की आवाजाही पर भी ध्यान देना जरूरी है।
भारत ने Ukraine युद्ध के दौरान विभिन्न पक्षों से कूटनीतिक संपर्क बनाए रखते हुए बातचीत और diplomacy के जरिए समाधान की बात दोहराई है।
Israel-Palestine पर Two-State Solution का समर्थन
जयशंकर ने Israel-Palestine मुद्दे पर भारत के पहले से घोषित रुख को दोहराया।
उन्होंने कहा:
“हम दृढ़ता से मानते हैं कि टिकाऊ और स्थायी शांति के लिए two-state solution आवश्यक है।”
भारत लंबे समय से एक संप्रभु, स्वतंत्र और व्यवहार्य Palestinian state के समर्थन की बात करता रहा है, जो Israel के साथ सुरक्षित और मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर शांतिपूर्वक अस्तित्व में रहे।
जयशंकर ने Palestinians के लिए भारत की humanitarian assistance का भी उल्लेख किया।
आतंकवाद पर क्या कहा?
विदेश मंत्री ने आतंकवाद को लेकर भी भारत का पक्ष रखा।
उन्होंने कहा:
“आतंकवाद के प्रति हमारी zero-tolerance approach में किसी तरह की कमजोरी नहीं होनी चाहिए।”
इसके बाद उन्होंने कहा:
“आतंकवाद के खिलाफ अपनी रक्षा करने के हमारे अधिकार का इस्तेमाल किया जाएगा।”
जयशंकर ने अपने संबोधन में Pakistan की भी आलोचना की और उसे आतंकवाद से जोड़ते हुए भारत की लंबे समय से चली आ रही चिंताओं को दोहराया।
यह भारत सरकार की स्थिति है। Pakistan भारत के कई व्यापक आरोपों को खारिज करता रहा है और दोनों देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग दावे पेश करते रहे हैं।
AI को लेकर भी बढ़ रही चिंता
जयशंकर के भाषण में Technology और Artificial Intelligence भी महत्वपूर्ण विषय रहे।
उन्होंने संकेत दिया कि टेक्नोलॉजी को कभी मुख्य रूप से विकास और प्रगति के अवसर के रूप में देखा जाता था, लेकिन अब इसके साथ नई चिंताएं भी जुड़ रही हैं।
AI को लेकर misinformation, bias, security और technological inequality जैसे मुद्दे वैश्विक चर्चा का हिस्सा बन चुके हैं।
भारत का रुख है कि देशों को अपनी राष्ट्रीय जरूरतों और प्राथमिकताओं के अनुरूप AI ecosystem विकसित करने की क्षमता मिलनी चाहिए।
भारत Global South के साथ AI और digital technology में सहयोग बढ़ाने पर भी जोर देता रहा है।
UN में सुधार की मांग फिर क्यों उठी?
जयशंकर ने मौजूदा वैश्विक समस्याओं को भारत की लंबे समय से चली आ रही reformed multilateralism की मांग से भी जोड़ा।
उनका तर्क था कि दुनिया तेजी से multipolar हो रही है, लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की संरचना आज की राजनीतिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को पर्याप्त रूप से नहीं दर्शाती।
उन्होंने कहा:
“मानवता के बड़े हिस्से को इस प्रक्रिया से बाहर नहीं रखा जा सकता।”
भारत लंबे समय से United Nations Security Council में स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है।
भारत का तर्क है कि मौजूदा Security Council structure आज दुनिया की आबादी और geopolitical influence के वितरण को पर्याप्त रूप से represent नहीं करता।
हालांकि Security Council में बदलाव एक जटिल प्रक्रिया है और इसके लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति तथा UN Charter के तहत आवश्यक प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
‘खाई के किनारे’ वाली चेतावनी का असली मतलब क्या है?
जयशंकर की “edge of an abyss” टिप्पणी को उसके पूरे भाषण के संदर्भ में समझना महत्वपूर्ण है।
उन्होंने किसी एक घटना को लेकर यह दावा नहीं किया कि दुनिया तुरंत किसी निश्चित वैश्विक तबाही की ओर बढ़ रही है।
उनकी दलील कई दबावों को एक साथ जोड़ती है—युद्ध, समुद्री व्यापार में बाधा, technology restrictions, supply-chain vulnerabilities, आर्थिक दबाव और देशों के बीच घटता भरोसा।
इसी तरह “weaponisation of everything” का मतलब केवल सैन्य हथियार नहीं था।
उनका संदर्भ उन परिस्थितियों से था जहां finance, technology, markets, resources और supply chains जैसी आर्थिक या रणनीतिक निर्भरताओं का इस्तेमाल दूसरे देशों पर प्रभाव या दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है।
निष्कर्ष
संयुक्त राष्ट्र में जयशंकर का संबोधन दुनिया की मौजूदा स्थिति को केवल युद्ध और शांति के नजरिए से नहीं देखता।
भारत के विदेश मंत्री ने संघर्षों के साथ आर्थिक दबाव, कमजोर होती supply chains, समुद्री व्यापार की सुरक्षा, technology competition और Global South पर पड़ रहे प्रभाव को एक बड़ी वैश्विक चुनौती के रूप में पेश किया।
भारत ने अपने समाधान के रूप में active conflicts में restraint और de-escalation, international shipping की सुरक्षा, आतंकवाद के प्रति zero tolerance, Global South की समस्याओं पर अधिक ध्यान और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार पर जोर दिया।
जयशंकर के भाषण का केंद्रीय संदेश यह था कि आज geopolitical competition केवल battlefield तक सीमित नहीं है—यह finance, trade, technology, supply chains और resources तक फैल चुकी है।
Disclaimer: यह लेख एस. जयशंकर के UNGA संबोधन और उपलब्ध आधिकारिक/विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित समाचार विश्लेषण है। जहां राजनीतिक या कूटनीतिक दावे हैं, उन्हें संबंधित पक्ष के बयान के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
