इस बैठक की अध्यक्षता अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो कर रहे हैं। इसमें रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव, चीन के वरिष्ठ राजनयिक प्रतिनिधि और भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर सहित कई देशों के प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं। इस बैठक का उद्देश्य दिसंबर में होने वाले G20 नेताओं के शिखर सम्मेलन की प्राथमिकताओं और एजेंडे की तैयारी करना भी है।
अमेरिका की प्राथमिकताएं और चीन के साथ मतभेद
अमेरिका इस बैठक में आर्थिक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रमुख मुद्दा बनाना चाहता है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए ऊर्जा, खाद्य पदार्थों और जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति व्यवस्था को सुरक्षित रखना जरूरी है। इसके साथ ही समुद्री रास्तों पर व्यापारिक जहाजों की निर्बाध आवाजाही भी अमेरिका की प्राथमिकताओं में शामिल है।
हालांकि, चीन के साथ अमेरिका के संबंधों में व्यापार और सुरक्षा को लेकर लगातार मतभेद बने हुए हैं। अमेरिकी शुल्क नीतियों और चीन की दक्षिण चीन सागर में गतिविधियों को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव है। दक्षिण चीन सागर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य या राजनीतिक टकराव अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आपूर्ति व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
अमेरिका की चिंता केवल चीन तक सीमित नहीं है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, लाल सागर और काला सागर जैसे समुद्री मार्गों की सुरक्षा भी बैठक के महत्वपूर्ण विषय हैं। इन रास्तों से ऊर्जा और अन्य जरूरी वस्तुओं का बड़ा हिस्सा दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचता है। ऐसे में इन क्षेत्रों में अस्थिरता का असर तेल की कीमतों, परिवहन लागत और महंगाई पर पड़ सकता है।
रूस की मौजूदगी से बढ़ी कूटनीतिक चुनौती
इस बैठक में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की मौजूदगी भी काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद पश्चिमी देशों और मॉस्को के बीच संबंध बेहद तनावपूर्ण रहे हैं। रूस पर कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाए गए हैं और यूरोप के कई देश उसकी नीतियों का विरोध करते रहे हैं।
ऐसे माहौल में अमेरिका द्वारा रूस को G20 बैठक में शामिल होने का निमंत्रण देना कुछ पश्चिमी देशों के लिए असहज स्थिति पैदा कर रहा है। लावरोव की मौजूदगी से यूक्रेन युद्ध पर एक साझा रुख तैयार करना मुश्किल हो सकता है। रूस का कहना है कि वैश्विक आर्थिक संस्थाओं में सुधार होना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अलग-अलग देशों की भूमिका को अधिक महत्व मिलना चाहिए।
रूस के प्रतिनिधिमंडल को अमेरिका में वीजा मिलने में भी शुरुआती दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। हालांकि, बाद में यह समस्या सुलझ गई और लावरोव बैठक में शामिल होने के लिए अटलांटा पहुंच गए। इससे यह साफ है कि कूटनीतिक बातचीत के रास्ते खुले रखने की कोशिशों के बावजूद दोनों देशों के बीच अविश्वास बना हुआ है।
यूक्रेन और ईरान का संघर्ष भी एजेंडे पर
G20 बैठक के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान से जुड़ा क्षेत्रीय संघर्ष शामिल हैं। यूक्रेन युद्ध के कारण यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक खाद्य बाजार पर लंबे समय से असर पड़ रहा है। वहीं, ईरान से जुड़े संघर्ष ने मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ा दिया है।
अमेरिका और उसके सहयोगियों की ईरान को लेकर रणनीति तथा संभावित सैन्य कार्रवाई की आशंकाएं क्षेत्रीय देशों की चिंता बढ़ा रही हैं। यदि मध्य-पूर्व में तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर तेल की आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पड़ सकता है।
इन परिस्थितियों में समुद्री रास्तों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और खाद्य सुरक्षा पर सभी देशों के बीच सहमति बनाना जरूरी है। लेकिन अलग-अलग देशों के राजनीतिक हित और विदेश नीति के दृष्टिकोण इस दिशा में बड़ी बाधा बन सकते हैं।
भारत की भूमिका और एस. जयशंकर की भागीदारी
इस बैठक में भारत की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर अटलांटा में G20 विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा ले रहे हैं। भारत की प्राथमिकताओं में ऊर्जा सुरक्षा, मजबूत आपूर्ति श्रृंखला, आर्थिक विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे मुद्दे शामिल हैं।
भारत लंबे समय से यह रुख अपनाता रहा है कि वैश्विक समस्याओं का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए निकाला जाना चाहिए। भारत के लिए यह बैठक इसलिए भी अहम है क्योंकि रूस, अमेरिका और चीन तीनों के साथ उसके अलग-अलग रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं।
बैठक के दौरान भारत को इन देशों के साथ अपने हितों पर चर्चा करने और वैश्विक आर्थिक स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। इसके अलावा, G20 के इतर भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्रियों की क्वाड बैठक भी प्रस्तावित है।
क्या G20 देश किसी साझा नतीजे पर पहुंच पाएंगे?
G20 दुनिया की प्रमुख विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं का मंच है। इसका उद्देश्य वैश्विक आर्थिक स्थिरता, विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है। लेकिन यह कोई सैन्य गठबंधन नहीं है और इसके सभी सदस्य देशों की विदेश नीति भी एक जैसी नहीं है। इसलिए किसी बड़े राजनीतिक या सुरक्षा मुद्दे पर सभी देशों की सहमति बनाना आसान नहीं होता।
अटलांटा की बैठक में भी रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान, चीन के साथ व्यापारिक मतभेद और समुद्री सुरक्षा जैसे विषयों पर साझा रुख बनना चुनौतीपूर्ण दिखाई दे रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इस बैठक में व्यावहारिक सहयोग और साझा आर्थिक हितों पर ध्यान देने की कोशिश की जाएगी।
अब सभी की नजर दिसंबर में मियामी में होने वाले G20 नेताओं के शिखर सम्मेलन पर है, जिसकी मेजबानी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप करेंगे। अटलांटा की बैठक यह संकेत दे सकती है कि बड़े वैश्विक मतभेदों के बावजूद प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं आर्थिक और सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर कितना सहयोग कर सकती हैं।
फिलहाल, इस बैठक की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि क्या अमेरिका, चीन और रूस जैसे प्रभावशाली देश अपने मतभेदों को किनारे रखकर वैश्विक चुनौतियों पर बातचीत का रास्ता निकाल पाएंगे या दुनिया की राजनीति में बढ़ती प्रतिस्पर्धा G20 की सामूहिक भूमिका को और कमजोर करेगी।
