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राजनीति

जामिया आंदोलन में नया मोड़: तीन सांसदों पर FIR, छात्रसंघ चुनाव बहाली की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक विवाद तक पहुंच गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन की शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने कांग्रेस सांसद इमरान मसूद, इमरान प्रतापगढ़ी और समाजवादी पार्टी के सांसद मोहिबुल्लाह नदवी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। सांसदों पर बिना अनुमति परिसर में प्रवेश करने और माहौल बिगाड़ने के आरोप लगाए गए हैं।

जामिया आंदोलन में नया मोड़: तीन सांसदों पर FIR, छात्रसंघ चुनाव बहाली की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी
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द्वारा साधना गुप्ता

स्रोत: Amar Ujala Hindi News Live, NDTV India, Jansatta, Outlook India, abplive.com

इस बीच सोमवार को विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से छात्रसंघ चुनाव और प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई पर महत्वपूर्ण आदेश जारी होने की खबर आई है। इससे विवाद में बातचीत के जरिए समाधान की संभावना बनी है। हालांकि, सांसदों के खिलाफ पुलिस मामला और छात्रों की मांगों पर प्रशासनिक निर्णय अलग प्रक्रियाएं हैं। छात्रों को दी गई राहत को सांसदों के खिलाफ दर्ज मामले की वापसी नहीं समझा जाना चाहिए।

किस शिकायत पर दर्ज हुई प्राथमिकी?

एनडीटीवी की 25 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, तीनों सांसदों के खिलाफ जामिया नगर थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई। विश्वविद्यालय प्रशासन ने शिकायत में अनधिकृत प्रवेश का आरोप लगाया था। कांग्रेस के लोकसभा सदस्य इमरान मसूद, राज्यसभा सदस्य इमरान प्रतापगढ़ी और रामपुर से सपा सांसद मोहिबुल्लाह नदवी आंदोलन कर रहे छात्रों से मिलने पहुंचे थे। प्रशासन का आरोप है कि उनकी गतिविधियों से परिसर में अशांति बढ़ी।

अमर उजाला के मुताबिक, कार्रवाई विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रोफेसर मोहम्मद महताब आलम रिजवी की शिकायत पर हुई है। रिपोर्ट में बिना अनुमति प्रवेश और छात्रों को भड़काने संबंधी आरोपों का उल्लेख है। इन आरोपों की जांच में घटनाक्रम, उपलब्ध रिकॉर्ड और संबंधित लोगों के बयान महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर किसी सांसद की भूमिका को साबित अपराध के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

छात्रों का आंदोलन किस बात पर था?

जनसत्ता की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शन और भूख हड़ताल 12 अक्टूबर से शुरू हुई थी। छात्रों की प्रमुख मांग जामिया मिल्लिया इस्लामिया स्टूडेंट्स यूनियन को बहाल करना और चुनाव कराना थी। इसके साथ आंदोलनकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई वापस लेने तथा मुख्य प्रॉक्टर को हटाने की मांग भी उठी। इसलिए विवाद केवल चुनाव की तारीख का नहीं, बल्कि प्रशासन और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच भरोसे का भी बन गया था।

जामिया में 2006 से छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए हैं। लंबे अंतराल के कारण चुनाव बहाली का प्रश्न छात्रों के प्रतिनिधित्व से जुड़ा हुआ है। आंदोलनकारी चाहते हैं कि उनकी समस्याएं उठाने के लिए निर्वाचित व्यवस्था हो। विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने परिसर में सामान्य शैक्षणिक गतिविधियां बनाए रखने की चुनौती भी रही। तनाव बढ़ने पर सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला देकर कक्षाएं ऑनलाइन करने का निर्णय लिया गया था।

सांसदों और प्रशासन के पक्ष में अंतर

इमरान प्रतापगढ़ी ने पहले छात्रों से मुलाकात को उनके स्वास्थ्य और मांगों की जानकारी लेने का प्रयास बताया था। एबीपी न्यूज की 22 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने आरोप लगाया कि आंदोलनकारी छात्रों को डराया जा रहा था और उनसे मिलने का रास्ता रोका गया। उन्होंने छात्रसंघ बहाली के समर्थन में बात रखी तथा समिति गठन को पर्याप्त कदम नहीं माना। यह बयान प्राथमिकी दर्ज होने से पहले का है, इसलिए इसे FIR पर उनकी औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं कहा जा सकता।

दूसरी ओर, प्रशासन ने परिसर की सुरक्षा और व्यवस्था बिगड़ने की शिकायत की। छात्र संगठन एसएफआई ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के दौरान बल प्रयोग के आरोप लगाए, जबकि विश्वविद्यालय ने कुछ छात्रों पर सुरक्षाकर्मियों और शिक्षकों को धक्का देने का आरोप लगाया। इन परस्पर विरोधी विवरणों में प्रत्येक पक्ष का दावा अलग रखना आवश्यक है। किसी एक पक्ष के कथन से पूरे घटनाक्रम का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकलता।

बातचीत के लिए समिति, फिर लिखित आदेश

विवाद सुलझाने के लिए विश्वविद्यालय ने सात सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति बनाई थी। जनसत्ता के मुताबिक, कई दौर की बातचीत और आंदोलन वापस लेने की अपील के बाद शिक्षकों तथा गैर-शिक्षण कर्मचारियों की बैठक भी हुई। इसमें कुलपति प्रोफेसर मजहर आसिफ और रजिस्ट्रार शामिल थे। प्रशासन की कोशिश परिसर में सामान्य स्थिति बहाल करने की थी, जबकि छात्र अपनी मांगों पर स्पष्ट और लिखित आश्वासन चाहते थे।

सोमवार को सामने आए आदेश में छात्रसंघ के संविधान की मंजूरी से चुनाव प्रक्रिया को जोड़ा गया है। प्रशासन ने आंदोलन के दौरान जारी निलंबन और कारण बताओ नोटिस वापस लेने तथा सुरक्षाकर्मियों की कार्रवाई की जांच के लिए समिति बनाने की बात कही है। इस प्रकार छात्र प्रतिनिधित्व के साथ आंदोलन के दौरान हुई कार्रवाई की समीक्षा भी समाधान का हिस्सा बनी है।

चुनाव की तारीख और जांच पर रहेगी नजर

आउटलुक की सोमवार सुबह की रिपोर्ट ने समझौते के बाद आंदोलन समाप्त होने की जानकारी दी है। हालांकि, अन्य रिपोर्टों में छात्रों के एक वर्ग द्वारा चुनाव की निश्चित तारीख और अतिरिक्त आश्वासन मांगने की बात आई है। इसलिए पूरे परिसर में विरोध की स्थिति पर एक समान निष्कर्ष निकालने से पहले आगे की पुष्टि जरूरी है।

अब दो घटनाक्रम महत्वपूर्ण होंगे: छात्रसंघ चुनाव संबंधी आदेश का क्रियान्वयन और सांसदों के खिलाफ शिकायत की जांच। चुनाव बहाली की घोषणा तभी ठोस प्रगति बनेगी जब प्रक्रिया और समयसारिणी स्पष्ट हों। वहीं, पुलिस मामले में आगे की कार्रवाई को साक्ष्यों और आधिकारिक जानकारी के आधार पर देखना होगा। छात्र आंदोलन, राजनीतिक समर्थन और कथित अनधिकृत प्रवेश को अलग-अलग समझना इस विवाद की सही तस्वीर सामने रखने के लिए जरूरी है।

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