बारिश से नुकसान के बीच कर्ज का सवाल फिर सामने
कर्नाटक में भारी बारिश और बाढ़ से प्रभावित किसानों के लिए राहत की मांग अब कृषि ऋण तक पहुंच गई है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा है कि वह सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को साथ लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलेंगे और किसानों के कर्ज की पूर्ण माफी का अनुरोध करेंगे।
यह अभी कर्ज माफी की घोषणा नहीं है। मुख्यमंत्री ने केंद्र के सामने मांग रखने की योजना बताई है और प्रधानमंत्री के साथ प्रस्तावित बैठक की तारीख भी अभी सामने नहीं आई है।
सिद्धारमैया का कदम ऐसे समय आया है जब राज्य के कई हिस्सों में खराब मौसम से फसलों को नुकसान पहुंचा है। खेतों में पानी भरने और कृषि उत्पादन प्रभावित होने के बाद किसान संगठनों और राजनीतिक दलों के बीच राहत के स्वरूप पर चर्चा तेज हुई है।
विपक्ष को भी साथ ले जाना चाहते हैं मुख्यमंत्री
सिद्धारमैया इस मांग को केवल राज्य की कांग्रेस सरकार के प्रस्ताव के रूप में दिल्ली नहीं ले जाना चाहते। उनकी योजना भाजपा सहित दूसरे दलों के प्रतिनिधियों को भी साथ रखने की है।
सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का राजनीतिक महत्व इसी में है। केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली NDA सरकार है, जबकि कर्नाटक में कांग्रेस सत्ता में है। अगर राज्य के प्रमुख दल कर्ज माफी की मांग पर एक साझा रुख अपनाते हैं, तो केंद्र के सामने इसे राज्यव्यापी मांग के रूप में रखा जा सकेगा।
फिलहाल प्रतिनिधिमंडल में शामिल होने वाले नेताओं की पूरी सूची घोषित नहीं की गई है।
फसल नुकसान और कर्ज राहत दो अलग मुद्दे
हाल की बारिश और बाढ़ इस मांग की तात्कालिक पृष्ठभूमि जरूर हैं, लेकिन फसल नुकसान का मुआवजा और कृषि ऋण माफी वित्तीय रूप से अलग व्यवस्थाएं हैं।
प्राकृतिक आपदा से प्रभावित किसान राहत और मुआवजे के पात्र हो सकते हैं। Loan waiver इससे अलग है। इसमें सरकार को तय करना पड़ता है कि कौन से ऋण माफ होंगे, किन किसानों को लाभ मिलेगा और बैंकों या अन्य ऋणदाता संस्थानों को भुगतान किस तरह किया जाएगा।
यही वजह है कि केवल 'पूर्ण कर्ज माफी' की मांग से योजना का वास्तविक आकार तय नहीं किया जा सकता।
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्ताव में केवल crop loans शामिल करने की मांग होगी या कृषि से जुड़े दूसरे ऋण भी इसके दायरे में लाने की बात होगी। कोई cutoff date, अधिकतम सीमा या पात्रता मानदंड भी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
इन विवरणों के बिना संभावित लाभार्थियों की संख्या या सरकारी खजाने पर पड़ने वाले खर्च का विश्वसनीय अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
कर्नाटक में पहले भी हो चुकी है Loan Waiver की राजनीति
कर्नाटक के लिए कृषि ऋण माफी नया राजनीतिक मुद्दा नहीं है।
2018 में एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार ने किसानों के लिए बड़ी loan waiver योजना की घोषणा की थी। उस योजना में पात्र कृषि ऋण पर तय सीमा तक राहत देने का प्रावधान किया गया था।
देश के कई अन्य राज्यों में भी समय-समय पर कृषि ऋण माफी योजनाएं लागू की गई हैं। हर योजना की शर्तें अलग रही हैं और उनका वित्तीय बोझ संबंधित सरकारों को उठाना पड़ा है।
इसी इतिहास के कारण सिद्धारमैया की मौजूदा मांग का अगला चरण महत्वपूर्ण होगा। अगर केंद्र इस प्रस्ताव पर विचार करता है, तो सबसे पहले योजना के दायरे और वित्तीय जिम्मेदारी पर सहमति की जरूरत पड़ेगी।
बैंक का कर्ज अभी पहले की तरह ही लागू
किसानों के लिए फिलहाल सबसे जरूरी बात यह है कि मुख्यमंत्री की घोषणा से मौजूदा ऋण स्वतः माफ नहीं हुए हैं।
किसी भी कर्ज माफी को लागू करने के लिए औपचारिक सरकारी निर्णय और उसके बाद विस्तृत नियम जरूरी होंगे। पात्र ऋण, लाभार्थी, तारीख और भुगतान व्यवस्था तय किए बिना बैंकिंग स्तर पर किसानों की देनदारी में बदलाव नहीं होता।
इसलिए सिद्धारमैया की घोषणा को राहत योजना लागू होने के बजाय केंद्र से राहत मांगने की राजनीतिक और नीतिगत पहल के रूप में देखा जाना चाहिए।
अब PM Modi के साथ बैठक पर नजर
इस मामले में अगला ठोस घटनाक्रम सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का गठन और प्रधानमंत्री से मुलाकात की तारीख तय होना होगा।
बैठक होने पर यह भी स्पष्ट हो सकता है कि कर्नाटक सरकार केंद्र से किस तरह की वित्तीय भागीदारी चाहती है और प्रस्तावित पूर्ण कर्ज माफी का दायरा क्या होगा।
केंद्र की प्रतिक्रिया भी अहम होगी। यदि प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो असली चर्चा राजनीतिक घोषणा से हटकर पात्रता, लागत और वित्तीय जिम्मेदारी पर आएगी। तब यह साफ होगा कि कर्नाटक के किसानों के लिए राहत का स्वरूप क्या हो सकता है।
