महिला आरक्षण और परिसीमन पर संसद का विशेष सत्र? केंद्र कर रहा विचार
नई दिल्ली: महिला आरक्षण और लोकसभा सीटों के परिसीमन से जुड़ा मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ सकता है। केंद्र सरकार सितंबर में संसद का एक छोटा विशेष सत्र बुलाने के विकल्प पर विचार कर रही है।
ताजा रिपोर्ट के अनुसार, विशेष सत्र के लिए 18 से 20 सितंबर 2026 की संभावित तारीखों पर चर्चा चल रही है। हालांकि अभी इसे अंतिम कार्यक्रम नहीं माना जाना चाहिए। आधिकारिक सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि तारीखें बदल सकती हैं और फिलहाल विचार-विमर्श जारी है।
इससे पहले भी रिपोर्ट सामने आई थी कि सरकार सितंबर के तीसरे सप्ताह में विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है। इसका उद्देश्य महिला आरक्षण से जुड़े उस विधायी प्रयास को आगे बढ़ाना बताया गया है, जो परिसीमन से भी जुड़ा हुआ है।
अभी विशेष सत्र की आधिकारिक घोषणा नहीं
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विशेष सत्र को अभी आधिकारिक रूप से घोषित नहीं किया गया है।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी सूत्रों पर आधारित रिपोर्टों से सामने आई है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि संसद का विशेष सत्र 18 सितंबर से निश्चित रूप से शुरू होगा।
रिपोर्ट में एक अधिकारी के हवाले से कहा गया है:
“Dates can change but a discussion is underway.”
यानी सरकार के स्तर पर चर्चा चल रही है, लेकिन तारीखों में बदलाव संभव है।
महिला आरक्षण और Delimitation क्यों आपस में जुड़े हैं?
इस राजनीतिक बहस की जड़ में महिलाओं के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% सीटें आरक्षित करने का मुद्दा है।
महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया परिसीमन से जुड़ी होने के कारण सीटों की संख्या, निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और राज्यों के प्रतिनिधित्व जैसे कई बड़े संवैधानिक एवं राजनीतिक सवाल इसके साथ जुड़े हैं।
इसी वजह से महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर व्यापक सहमति होने के बावजूद इसे लागू करने के तरीके और परिसीमन के स्वरूप को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद बने हुए हैं।
पहले प्रयास में सरकार को नहीं मिला था जरूरी बहुमत
अप्रैल 2026 के विशेष सत्र में सरकार ने इससे जुड़े विधायी प्रस्तावों को आगे बढ़ाने की कोशिश की थी।
उस दौरान Constitution (131st Amendment) Bill, 2026, Delimitation Bill, 2026 और Union Territories Laws (Amendment) Bill, 2026 जैसे आपस में जुड़े प्रस्ताव सामने आए।
लेकिन संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव लोकसभा में आवश्यक विशेष बहुमत हासिल नहीं कर सका। इसके बाद संबंधित विधायी प्रस्ताव भी आगे नहीं बढ़ पाए।
यही कारण है कि इस बार संभावित विशेष सत्र से पहले सरकार के लिए पर्याप्त राजनीतिक समर्थन जुटाना बेहद महत्वपूर्ण होगा।
दो-तिहाई बहुमत क्यों महत्वपूर्ण?
सामान्य विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने की प्रक्रिया एक जैसी नहीं होती।
संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत कई संवैधानिक संशोधनों के लिए सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
इसलिए केवल साधारण बहुमत के आधार पर सरकार ऐसे संशोधन को पारित नहीं करा सकती।
यही गणित संभावित सितंबर सत्र को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है।
All-Party Meeting का विकल्प भी चर्चा में
विशेष सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाए जाने की संभावना भी सामने आई है।
रिपोर्ट के मुताबिक राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष Mallikarjun Kharge ने प्रधानमंत्री Narendra Modi से परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विषय पर सभी दलों की बैठक बुलाने और प्रस्ताव का अध्ययन करने के लिए पर्याप्त समय देने की मांग की है।
यदि सरकार विशेष सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाती है, तो उसका उद्देश्य विपक्ष की चिंताओं को समझने के साथ-साथ आवश्यक संसदीय समर्थन जुटाना भी हो सकता है।
अगस्त में Kiren Rijiju ने विशेष सत्र की खबरों को किया था खारिज
यह पहली बार नहीं है जब महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर विशेष सत्र की चर्चा सामने आई है।
अगस्त की शुरुआत में ऐसी अटकलें थीं कि 16 से 18 अगस्त के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है।
लेकिन संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju ने उस समय इन रिपोर्टों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया था।
उन्होंने कहा था:
“There is no proposal to have any special session from August 16 to 18 on women's reservation and delimitation bills.”
इसलिए सितंबर को लेकर सामने आई मौजूदा रिपोर्टों को भी आधिकारिक घोषणा होने तक संभावित योजना के रूप में ही देखना जरूरी है।
Monsoon Session के बाद Parliament का prorogation क्यों महत्वपूर्ण?
संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त हुआ था, लेकिन ताजा रिपोर्ट के मुताबिक इसके बाद संसद को औपचारिक रूप से prorogue नहीं किया गया।
इस स्थिति का प्रक्रियात्मक महत्व है। सरकार आवश्यकता पड़ने पर लोकसभा और राज्यसभा को दोबारा बैठक के लिए बुला सकती है।
कांग्रेस पहले ही संसद को prorogue नहीं किए जाने को संभावित विशेष सत्र से जोड़कर अपनी आशंकाएं जाहिर कर चुकी है।
Delimitation पर विपक्ष की सबसे बड़ी चिंता क्या है?
महिला आरक्षण के साथ सबसे विवादास्पद पहलू परिसीमन है।
परिसीमन का अर्थ मोटे तौर पर जनसंख्या और अन्य संवैधानिक मानदंडों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व की संरचना को दोबारा निर्धारित करना है।
दक्षिण भारत के कई नेताओं और विपक्षी दलों ने आशंका जताई है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होने पर उन राज्यों की तुलनात्मक राजनीतिक ताकत प्रभावित हो सकती है जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया है।
यही वजह है कि बहस केवल महिलाओं के लिए 33% आरक्षण तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि परिसीमन किस आधार पर होगा और उसके बाद विभिन्न राज्यों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व कैसा रहेगा।
कांग्रेस की क्या मांग है?
कांग्रेस अध्यक्ष Mallikarjun Kharge ने प्रधानमंत्री से सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है।
विपक्ष का तर्क है कि परिसीमन जैसे दूरगामी प्रभाव वाले विषय पर पर्याप्त अध्ययन और राजनीतिक परामर्श होना चाहिए।
इससे पहले कांग्रेस नेता Sonia Gandhi भी परिसीमन को महिला आरक्षण से जुड़ी बहस का अधिक गंभीर पहलू बता चुकी हैं और सरकार के प्रस्तावित तरीके की आलोचना कर चुकी हैं।
ये विपक्ष के राजनीतिक दावे और आपत्तियां हैं; इन्हें सरकार की आधिकारिक स्थिति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
महिला आरक्षण पर मूल कानून क्या कहता है?
भारत की संसद ने 2023 में Nari Shakti Vandan Adhiniyam पारित किया था, जिसका उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटें आरक्षित करना है।
लेकिन आरक्षण का वास्तविक क्रियान्वयन परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ा होने के कारण यह सवाल लगातार बना रहा कि महिला आरक्षण जमीन पर कब और किस चुनाव से लागू होगा।
2026 में इस प्रक्रिया को तेज करने के प्रयासों ने परिसीमन, सीटों की संख्या और राज्यों के प्रतिनिधित्व पर एक नई राजनीतिक बहस खड़ी कर दी।
सितंबर का संभावित सत्र क्यों होगा महत्वपूर्ण?
यदि सरकार सितंबर में विशेष सत्र बुलाती है, तो यह केवल महिला आरक्षण पर चर्चा तक सीमित राजनीतिक घटना नहीं होगी।
इसके साथ कम से कम तीन बड़े सवाल जुड़े होंगे—महिला आरक्षण को कब लागू किया जाए, परिसीमन किस आधार पर किया जाए और नई व्यवस्था में राज्यों का प्रतिनिधित्व किस तरह निर्धारित हो।
सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती आवश्यक संवैधानिक बहुमत जुटाना होगी। विपक्ष के लिए मुख्य मुद्दा परिसीमन की प्रक्रिया और राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन रहेगा।
फिलहाल 18-20 सितंबर की तारीखें संभावित हैं, अंतिम नहीं। इसलिए विशेष सत्र की औपचारिक घोषणा और उसके एजेंडे का इंतजार करना महत्वपूर्ण होगा।
