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राजनीति

महिला आरक्षण पर BJP–Congress में नई जंग, संसद सत्र अब भी औपचारिक रूप से खत्म नहीं

महिला आरक्षण को लागू करने के तरीके और उससे जुड़े परिसीमन के सवाल पर BJP और Congress के बीच राजनीतिक टकराव फिर तेज हो गया है। 13 अगस्त को लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद भी मानसून सत्र के औपचारिक सत्रावसान में हुई देरी ने नई अटकलों को जन्म दिया है।

महिला आरक्षण पर BJP–Congress में नई जंग, संसद सत्र अब भी औपचारिक रूप से खत्म नहीं
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: TOI

नई दिल्ली: महिला आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। संसद के मानसून सत्र की कार्यवाही समाप्त होने के बाद भी इसके औपचारिक सत्रावसान यानी prorogation में देरी और महिला आरक्षण को जल्द लागू करने से जुड़ी राजनीतिक बहस ने सत्तारूढ़ BJP और मुख्य विपक्षी दल Congress के बीच नए आरोप-प्रत्यारोप को जन्म दिया है।

लोकसभा और राज्यसभा को 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था। हालांकि, इसके कई दिन बाद तक सत्र के औपचारिक सत्रावसान की अधिसूचना जारी नहीं होने से राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हुई कि क्या सरकार मौजूदा सत्र के भीतर ही किसी महत्वपूर्ण विधायी पहल की संभावना खुली रखना चाहती है। सामान्यतः स्थगन और सत्रावसान के बीच का अंतर कम होता है, हालांकि अतीत में लंबे अंतराल के उदाहरण भी रहे हैं।

महिला आरक्षण को लेकर विवाद क्यों बढ़ा?

विवाद का केंद्र केवल महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत राजनीतिक आरक्षण का सिद्धांत नहीं, बल्कि इसे लागू करने की प्रक्रिया और परिसीमन से उसका संबंध भी है।

2023 का नारी शक्ति वंदन अधिनियम लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का संवैधानिक आधार तैयार कर चुका है। मौजूदा राजनीतिक बहस इस बात पर केंद्रित है कि आरक्षण को कब और किस परिसीमन व्यवस्था के साथ लागू किया जाए।

2026 में सरकार ने महिला आरक्षण को आगे बढ़ाने के लिए संसद में संशोधन से जुड़ी पहल की थी। अप्रैल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसदों से इस दिशा में प्रस्तावित संशोधन का समर्थन करने की अपील करते हुए महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने को लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण बताया था।

BJP का Congress पर हमला

BJP ने Congress पर सवाल उठाया है कि यदि विपक्ष वास्तव में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने का समर्थन करता है, तो महिला आरक्षण को जल्द लागू करने की सरकारी कोशिश का समर्थन क्यों नहीं किया जा रहा।

हालिया राजनीतिक बयानबाजी में BJP नेताओं ने Rahul Gandhi और Congress पर महिला सशक्तिकरण की बात करने और आरक्षण से जुड़ी सरकारी पहल पर अलग रुख अपनाने का आरोप लगाया है। Smriti Irani ने भी Congress नेतृत्व को 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के मुद्दे पर सरकार का साथ देने की चुनौती दी।

Congress की आपत्ति आरक्षण से ज्यादा परिसीमन पर

Congress का पक्ष अलग है। पार्टी महिला आरक्षण के सिद्धांत का समर्थन करती है, लेकिन उसका कहना है कि इसके कार्यान्वयन को ऐसी परिसीमन प्रक्रिया से नहीं जोड़ा जाना चाहिए जिससे राज्यों के बीच संसदीय प्रतिनिधित्व का संतुलन बदलने की आशंका पैदा हो।

Congress के आधिकारिक मंच पर भी महिला आरक्षण के समर्थन के साथ प्रतिनिधित्व में हिस्सेदारी को लेकर आपत्ति दर्ज की गई है। पार्टी का तर्क है कि मौजूदा 543 लोकसभा सीटों के ढांचे में ही एक-तिहाई महिला आरक्षण लागू करने का रास्ता निकाला जाना चाहिए।

दक्षिण भारत के कुछ दलों ने भी परिसीमन को लेकर चिंता व्यक्त की है। उदाहरण के तौर पर DMK ने महिला आरक्षण के प्रति अपना समर्थन दोहराते हुए कहा है कि ऐसी परिसीमन व्यवस्था स्वीकार नहीं की जा सकती जिससे दक्षिणी राज्यों के हित प्रभावित हों।

संसद सत्र के औपचारिक समापन में देरी पर सवाल

Congress नेता Jairam Ramesh ने मानसून सत्र के सत्रावसान में देरी पर सवाल उठाते हुए इसे सामान्य प्रक्रिया से अलग बताया और सरकार की मंशा पर राजनीतिक सवाल खड़े किए। Congress की ओर से यह आशंका जताई गई कि देरी किसी संवैधानिक संशोधन या परिसीमन से जुड़ी नई कोशिश से संबंधित हो सकती है। सरकार की ओर से विशेष सत्र बुलाने की अटकलों को पहले खारिज किया जा चुका है।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। संसद का अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होना (adjournment sine die) और उसका औपचारिक सत्रावसान (prorogation) अलग संवैधानिक प्रक्रियाएं हैं। सत्रावसान राष्ट्रपति द्वारा सरकार की सलाह पर किया जाता है।

यह मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण है?

महिला आरक्षण की बहस भारत में केवल लैंगिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रह गई है। इसका सीधा संबंध भविष्य के लोकसभा चुनावों, निर्वाचन क्षेत्रों की संरचना और राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ता जा रहा है।

यदि महिला आरक्षण को नई परिसीमन व्यवस्था के साथ लागू करने की कोशिश होती है, तो बहस इस बात पर भी केंद्रित होगी कि लोकसभा की सीटों का राज्यों के बीच वितरण किस आधार पर किया जाए। यही कारण है कि महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने के व्यापक समर्थन के बावजूद इसे लागू करने की प्रक्रिया पर राजनीतिक सहमति बनाना कठिन साबित हो रहा है।

संतुलित विश्लेषण

BJP के लिए महिला आरक्षण को जल्द लागू करना महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर एक बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। सरकार का तर्क है कि लंबे समय से लंबित महिला प्रतिनिधित्व को वास्तविकता में बदलने के लिए राजनीतिक दलों को सहयोग करना चाहिए।

दूसरी तरफ Congress और कुछ क्षेत्रीय दलों की आपत्ति महिला आरक्षण के मूल उद्देश्य के बजाय उसके साथ जुड़ी परिसीमन प्रक्रिया पर केंद्रित है। उनके लिए सवाल यह है कि महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाते समय राज्यों के मौजूदा राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर क्या असर पड़ेगा।

इसलिए मौजूदा विवाद को केवल “महिला आरक्षण के समर्थन बनाम विरोध” के रूप में देखना अधूरा होगा। असली राजनीतिक मतभेद आरक्षण के समय, क्रियान्वयन के तरीके और परिसीमन के स्वरूप को लेकर है।

आने वाले दिनों में संसद सत्र के औपचारिक सत्रावसान और सरकार की अगली विधायी रणनीति से यह स्पष्ट हो सकता है कि यह विवाद फिलहाल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहता है या किसी नई संसदीय पहल में बदलता है।

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