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राजनीति

महिला आरक्षण पर फिर गरमाई सियासत: राहुल गांधी के केंद्र में आते ही BJP और कांग्रेस आमने-सामने

महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर देश में एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। पुणे में छात्राओं से बातचीत के दौरान लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पितृसत्ता पर हमला करते हुए महिलाओं से अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए मजबूती से खड़े होने की बात कही। इसके बाद BJP ने उन्हीं बयानों को महिला आरक्षण के मुद्दे से जोड़ते हुए कांग्रेस से 33% आरक्षण के जल्द क्रियान्वयन का समर्थन करने की मांग की।

महिला आरक्षण पर फिर गरमाई सियासत: राहुल गांधी के केंद्र में आते ही BJP और कांग्रेस आमने-सामने
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: TOI

राहुल गांधी के एक बयान से फिर गरमाई राजनीति

पुणे में 22 अगस्त को आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी ने छात्राओं से बातचीत के दौरान पितृसत्ता, महिलाओं की स्वतंत्रता और समाज में उनके सामने आने वाली बाधाओं पर बात की।

उन्होंने BJP और RSS पर महिलाओं को सीमित करने वाली सोच को बढ़ावा देने का आरोप लगाया और छात्राओं से पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती देने का आह्वान किया।

इसके बाद मुद्दा केवल सामाजिक सोच तक सीमित नहीं रहा। BJP ने राहुल गांधी के बयान को सीधे महिला आरक्षण से जोड़ दिया।

BJP का सवाल—महिलाओं की बात करते हैं तो आरक्षण का समर्थन क्यों नहीं?

BJP महासचिव स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को चुनौती देते हुए कहा कि यदि वे वास्तव में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को मजबूत करना चाहते हैं, तो उन्हें संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण के जल्द क्रियान्वयन का समर्थन करना चाहिए।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी कांग्रेस और राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए उनके सार्वजनिक बयानों और महिला आरक्षण पर पार्टी के रुख के बीच विरोधाभास होने का आरोप लगाया।

BJP की राजनीतिक रणनीति साफ दिखाई देती है—राहुल गांधी के महिला सशक्तिकरण वाले संदेश को आरक्षण के सवाल से जोड़कर कांग्रेस से स्पष्ट जवाब मांगा जा रहा है।

लेकिन कांग्रेस कह रही है—हमने तो 2023 में बिल का समर्थन किया था

कांग्रेस का तर्क बिल्कुल अलग है।

राहुल गांधी ने इसी महीने संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के साथ हुई बहस में याद दिलाया था कि 2023 का महिला आरक्षण कानून संसद में कांग्रेस के समर्थन के साथ पारित हुआ था।

उनका सवाल है कि जब कानून पहले ही पारित हो चुका है, तो उसे लागू करने के लिए अब परिसीमन को नई शर्त की तरह क्यों जोड़ा जा रहा है?

राहुल गांधी ने सरकार से महिला आरक्षण को बिना अतिरिक्त शर्त के लागू करने की मांग की है।

यही वह बिंदु है जहां BJP और कांग्रेस के बीच असली राजनीतिक टकराव दिखाई देता है।

आखिर महिला आरक्षण कानून में है क्या?

सितंबर 2023 में संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया था। इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है।

लेकिन इसका क्रियान्वयन तत्काल नहीं होना था। इसे अगली जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ा गया था।

अब 2026 में राजनीतिक बहस इसी बात पर केंद्रित है कि आरक्षण को किस प्रक्रिया और समयसीमा के तहत लागू किया जाए।

सरकार की ओर से 2029 से महिला आरक्षण लागू करने की दिशा में परिसीमन से जुड़ी व्यवस्था आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है, जबकि कांग्रेस मौजूदा प्रस्तावित ढांचे पर सवाल उठा रही है।

राहुल गांधी और किरेन रिजिजू पहले भी हो चुके हैं आमने-सामने

यह विवाद अचानक शुरू नहीं हुआ है।

अगस्त की शुरुआत में संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और राहुल गांधी के बीच इसी मुद्दे पर तीखी बयानबाजी हुई थी।

रिजिजू ने राहुल गांधी के महिलाओं की स्वतंत्रता पर दिए संदेश के बाद कांग्रेस से महिला आरक्षण को बिना शर्त समर्थन देने को कहा।

राहुल गांधी ने जवाब में कहा कि कांग्रेस पहले ही 2023 के कानून का समर्थन कर चुकी है और सरकार को यह बताना चाहिए कि तीन साल बाद भी इसका क्रियान्वयन क्यों नहीं हुआ।

दोनों नेताओं के बीच बातचीत भी हुई। 5 अगस्त को रिजिजू ने राहुल गांधी से करीब 50 मिनट मुलाकात कर परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों पर चर्चा की, लेकिन कांग्रेस ने अपने रुख में बदलाव नहीं किया।

मामला केवल 33% सीटों का नहीं है

ऊपर से देखने पर बहस बहुत सरल लग सकती है—क्या महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33% आरक्षण मिलना चाहिए?

लेकिन मौजूदा राजनीतिक विवाद इससे ज्यादा जटिल है।

दोनों प्रमुख दल महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने का सार्वजनिक रूप से समर्थन करते हैं। असहमति मुख्य रूप से इसे लागू करने की प्रक्रिया, परिसीमन से इसके संबंध और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के नए ढांचे को लेकर है।

इसलिए इसे केवल “एक पार्टी आरक्षण के पक्ष में और दूसरी विरोध में” देखना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

महिलाओं के लिए असली सवाल—आरक्षण जमीन पर कब दिखेगा?

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच एक बुनियादी सवाल पीछे छूट सकता है।

महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में वास्तविक 33% प्रतिनिधित्व कब मिलेगा?

2023 में कानून पारित होना ऐतिहासिक राजनीतिक कदम था। लेकिन किसी भी कानून का वास्तविक प्रभाव तब दिखाई देता है जब उसका असर चुनावी मैदान और निर्वाचित सदनों में नजर आने लगे।

इसीलिए मौजूदा विवाद केवल BJP और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बढ़त हासिल करने की लड़ाई नहीं है। इसका सीधा संबंध भारत में भविष्य के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से है।

संतुलित विश्लेषण: दोनों पक्षों के अपने राजनीतिक तर्क

BJP के पास यह कहने का राजनीतिक आधार है कि यदि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए नई संवैधानिक और परिसीमन संबंधी प्रक्रिया आवश्यक है, तो विपक्ष को इसे आगे बढ़ाने में सहयोग करना चाहिए।

वहीं कांग्रेस का सवाल भी महत्वपूर्ण है—जब 2023 में महिला आरक्षण कानून सर्वसम्मति से पारित हो चुका है, तो उसके क्रियान्वयन को ऐसी प्रक्रिया से क्यों जोड़ा जाए जिस पर खुद व्यापक राजनीतिक मतभेद मौजूद हैं?

यही कारण है कि विवाद अब केवल महिला आरक्षण नहीं, बल्कि परिसीमन और भविष्य में लोकसभा की संरचना जैसे बड़े संवैधानिक सवालों से भी जुड़ गया है।

2029 की राजनीति के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?

महिला मतदाता भारतीय चुनावों में लगातार अधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति बन रही हैं। कई राज्यों में महिला-केंद्रित कल्याण योजनाएं चुनावी रणनीति का प्रमुख हिस्सा बन चुकी हैं।

अगर 2029 के चुनाव से महिला आरक्षण लागू करने की दिशा में ठोस कदम आगे बढ़ते हैं, तो भारतीय राजनीति की तस्वीर बड़े स्तर पर बदल सकती है।

लोकसभा और विधानसभाओं में महिला उम्मीदवारों और निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या में बड़ा इजाफा हो सकता है।

इसी वजह से आज दिखाई दे रही BJP-कांग्रेस की बहस आने वाले चुनावों की राजनीति से अलग करके नहीं देखी जा सकती।

निष्कर्ष

राहुल गांधी के पुणे कार्यक्रम से शुरू हुई ताजा बयानबाजी ने महिला आरक्षण की पुरानी बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है।

BJP राहुल गांधी से कह रही है कि महिलाओं के अधिकारों की बात को 33% राजनीतिक आरक्षण के समर्थन में बदलें। कांग्रेस जवाब दे रही है कि उसने आरक्षण कानून का समर्थन पहले ही कर दिया था और अब सरकार बताए कि इसके क्रियान्वयन को परिसीमन से क्यों जोड़ा जा रहा है।

राजनीतिक आरोप आने वाले दिनों में और तेज हो सकते हैं, लेकिन इस पूरी बहस की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी किसी पार्टी की बयानबाजी नहीं होगी।

असली कसौटी यह होगी कि संसद में पारित 33% महिला आरक्षण आखिर चुनावी व्यवस्था में कब और किस रूप में दिखाई देता है।


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