विज्ञापन - शीर्ष बैनर
Read in English —JantaScope English
राजनीति

मराठा आरक्षण पर 12 सितंबर का अल्टीमेटम: मनोज जरांगे ने मुंबई मार्च की दी चेतावनी

मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे ने कुनबी प्रमाणपत्र सहित लंबित मांगों पर महाराष्ट्र सरकार को 12 सितंबर तक कार्रवाई का समय दिया है। मांगें पूरी नहीं होने पर मुंबई में बड़ा आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दी गई है।

मराठा आरक्षण पर 12 सितंबर का अल्टीमेटम: मनोज जरांगे ने मुंबई मार्च की दी चेतावनी
विज्ञापन

द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: NDTV

मराठा आरक्षण की मांग फिर तेज, मनोज जरांगे ने सरकार को दिया 12 सितंबर तक का समय

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर आंदोलन और राजनीतिक टकराव के केंद्र में आ गया है। आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे पाटिल ने महाराष्ट्र सरकार से कुनबी जाति प्रमाणपत्रों सहित अपनी प्रमुख मांगों पर 12 सितंबर 2026 तक निर्णय लेने को कहा है।

जरांगे ने चेतावनी दी है कि निर्धारित अवधि में मांगें पूरी नहीं होने पर मराठा समुदाय मुंबई की ओर मार्च कर सकता है। आंदोलन की आगे की रणनीति तय करने के लिए 12 सितंबर को अंतरवाली सराटी में मराठा समुदाय की कोर कमेटी की बैठक प्रस्तावित है। मांगें स्वीकार होने की स्थिति में मुंबई में प्रस्तावित अनशन की जरूरत नहीं पड़ेगी।

अंतरवाली सराटी में शुरू किया 11वां अनशन

मनोज जरांगे ने 29 अगस्त को जालना जिले के अंतरवाली सराटी गांव में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। पिछले लगभग तीन वर्षों में यह उनका 11वां अनशन बताया जा रहा है। उन्होंने इसे मराठा आरक्षण आंदोलन का निर्णायक चरण करार दिया है।

इससे पहले जरांगे ने सरकार को 28 अगस्त तक लंबित मांगों पर कार्रवाई करने का समय दिया था। समय-सीमा समाप्त होने के बाद उन्होंने 29 अगस्त से अनशन प्रारंभ किया। आंदोलन के अगले चरण के लिए अब 12 सितंबर की तारीख सामने रखी गई है।

मनोज जरांगे की प्रमुख मांगें क्या हैं?

जरांगे की सबसे महत्वपूर्ण मांग उन पात्र मराठा परिवारों को कुनबी प्रमाणपत्र जारी करने की है, जिनके पारिवारिक अथवा ऐतिहासिक दस्तावेजों में कुनबी पहचान दर्ज होने का दावा किया गया है।

जरांगे और उनके समर्थकों का कहना है कि लगभग 58 लाख ऐतिहासिक अभिलेखों के आधार पर पात्र लोगों को प्रमाणपत्र दिए जाने चाहिए। हालांकि, इस संख्या पर अन्य संगठनों ने सवाल उठाए हैं और इसकी स्वतंत्र या अंतिम सरकारी पुष्टि स्पष्ट नहीं है।

आंदोलन की प्रमुख मांगों में शामिल हैं:

  • ऐतिहासिक कुनबी रिकॉर्ड वाले पात्र मराठा आवेदकों को जल्द प्रमाणपत्र देना।

  • सतारा और अन्य ऐतिहासिक गजट के आधार पर पात्रता निर्धारित करना।

  • जाति प्रमाणपत्र जांच समितियों की भूमिका समाप्त या निलंबित करना।

  • मराठा आरक्षण आंदोलनों के दौरान दर्ज पुलिस मामले वापस लेना।

  • पिछले आंदोलनों में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को सरकारी नौकरी और आर्थिक सहायता देना।

  • आरक्षण के लिए कानून के अनुरूप संशोधित सरकारी प्रस्ताव जारी करना।

जरांगे का आरोप है कि रिकॉर्ड उपलब्ध होने के बावजूद अनेक लोगों को प्रमाणपत्र नहीं मिले या पहले जारी किए गए कुछ प्रमाणपत्र रद्द कर दिए गए।

कुनबी प्रमाणपत्र आरक्षण से कैसे जुड़ा है?

महाराष्ट्र में कुनबी समुदाय अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC श्रेणी में शामिल है। किसी मराठा परिवार के ऐतिहासिक दस्तावेजों में कुनबी वंशावली प्रमाणित होने पर पात्र सदस्य OBC प्रमाणपत्र और उससे जुड़े आरक्षण लाभ के लिए आवेदन कर सकते हैं।

जरांगे का आंदोलन मराठा समुदाय के लिए लागू अलग SEBC आरक्षण से आगे जाकर कुनबी पहचान के माध्यम से OBC लाभ की मांग पर केंद्रित है। यही कारण है कि यह मामला केवल प्रशासनिक प्रमाणपत्र वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि मौजूदा OBC आरक्षण व्यवस्था और उसमें उपलब्ध अवसरों से भी जुड़ा है।

जाति जांच समितियां समाप्त करने की मांग पर विवाद

जरांगे ने जाति प्रमाणपत्रों की जांच करने वाली समितियों को समाप्त करने की मांग की है। उनका तर्क है कि ऐतिहासिक अभिलेख उपलब्ध होने के बाद बार-बार जांच करने से प्रमाणपत्र मिलने में अनावश्यक देरी होती है।

इस मांग का विरोध भी सामने आया है। महाराष्ट्र के मंत्री छगन भुजबल ने कहा है कि जाति प्रमाणपत्रों की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जांच समितियां आवश्यक हैं। उनका तर्क है कि सत्यापन प्रक्रिया हटने पर अपात्र लोगों के आरक्षित श्रेणियों में प्रवेश करने का खतरा पैदा हो सकता है।

राष्ट्रीय OBC महासंघ के अध्यक्ष बबनराव तायवाडे ने 58 लाख नए कुनबी रिकॉर्ड मिलने के दावे पर सवाल उठाया है। उनके अनुसार, इनमें से बड़ी संख्या पुराने रिकॉर्ड की है और मराठवाड़ा में नए मिले रिकॉर्ड की संख्या इससे काफी कम है।

इस विवाद से स्पष्ट है कि मामला केवल प्रमाणपत्र जारी करने की गति का नहीं, बल्कि रिकॉर्ड की प्रामाणिकता और मौजूदा OBC समुदायों के अधिकारों का भी है।

महाराष्ट्र सरकार ने क्या कहा?

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है कि सरकार उन मांगों पर चर्चा करने को तैयार है जो कानून और संविधान के अनुरूप हों तथा सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन न करती हों।

सरकार ने कुनबी रिकॉर्ड और पारिवारिक वंशावली की पहचान करने वाली सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति संदीप शिंदे समिति का कार्यकाल 30 जून 2027 तक बढ़ाया है। प्रशासन का कहना है कि कुछ जिलों में मराठा-कुनबी वंशावली खोजने का काम अभी पूरा नहीं हुआ है।

सरकार का यह कदम रिकॉर्ड खोजने की प्रक्रिया जारी रखने का संकेत देता है, लेकिन इससे प्रमाणपत्रों की गति, पात्रता के नियम और जांच समितियों को समाप्त करने जैसी सभी मांगों का समाधान नहीं होता।

मराठा आरक्षण की कानूनी पृष्ठभूमि

महाराष्ट्र सरकार ने 2024 में मराठा समुदाय को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग यानी SEBC के रूप में 10 प्रतिशत अलग आरक्षण देने वाला कानून बनाया था। यह आरक्षण सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में लागू किया गया, लेकिन इसकी संवैधानिक वैधता को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। आरक्षण के अंतर्गत होने वाली नियुक्तियां और प्रवेश अदालत के अंतिम निर्णय के अधीन हैं।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने मई 2021 में वर्ष 2018 के मराठा आरक्षण कानून के प्रमुख प्रावधान निरस्त कर दिए थे। अदालत का निष्कर्ष था कि 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा पार करने के लिए आवश्यक असाधारण परिस्थितियां स्थापित नहीं की गई थीं।

इसी कानूनी इतिहास के कारण सरकार मराठा आरक्षण से जुड़ी किसी भी नई कार्रवाई को न्यायिक आदेशों और संवैधानिक सीमाओं से जोड़कर देख रही है।

यह घटनाक्रम क्यों महत्वपूर्ण है?

मराठा समुदाय महाराष्ट्र की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में प्रभावशाली भूमिका रखता है। समुदाय के अनेक परिवार शिक्षा, कृषि संकट और सरकारी रोजगार में सीमित अवसरों का हवाला देते हुए लंबे समय से आरक्षण की मांग कर रहे हैं।

दूसरी ओर, OBC संगठनों को आशंका है कि बड़ी संख्या में मराठाओं को कुनबी प्रमाणपत्र मिलने से पहले से सीमित आरक्षण हिस्से में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इसलिए इस मुद्दे का प्रभाव केवल मराठा समुदाय तक सीमित नहीं रह सकता।

आंदोलन के मुंबई पहुंचने की स्थिति में इसका असर राज्य की राजनीति, यातायात, कानून-व्यवस्था और सरकार पर पड़ने वाले सामाजिक दबाव पर भी दिखाई दे सकता है।

संतुलित विश्लेषण: समाधान का रास्ता क्या हो सकता है?

जिन आवेदकों के पास वास्तविक और सत्यापन योग्य कुनबी रिकॉर्ड हैं, उनके मामलों का समयबद्ध निपटारा प्रशासन की जिम्मेदारी है। लंबे समय तक आवेदन लंबित रहने से लोगों में अविश्वास और असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।

लेकिन पूरी सत्यापन व्यवस्था समाप्त करना भी गंभीर सवाल खड़े करता है। गलत प्रमाणपत्र जारी होने से आरक्षण का लाभ वास्तविक पात्र व्यक्तियों तक नहीं पहुंच पाएगा और भविष्य में कानूनी विवाद बढ़ सकते हैं।

व्यावहारिक समाधान के लिए सरकार को प्राप्त रिकॉर्ड, जारी प्रमाणपत्रों, लंबित मामलों और अस्वीकृत आवेदनों के स्पष्ट आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। एक समयबद्ध तथा पारदर्शी अपील प्रणाली भी बनाई जा सकती है, जिसमें गलत तरीके से रोके या रद्द किए गए प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच हो।

इसके साथ ही मराठा और OBC प्रतिनिधियों को संवाद में शामिल करना जरूरी है। ऐसा समाधान ही टिकाऊ होगा जो पात्र मराठा परिवारों की शिकायतों का निपटारा करे, मौजूदा OBC समुदायों के अधिकार सुरक्षित रखे और न्यायालय की संवैधानिक सीमाओं का पालन करे।

12 सितंबर के बाद क्या होगा?

अब सबकी नजर 12 सितंबर की समय-सीमा पर है। अगर सरकार और आंदोलनकारियों के बीच कोई स्वीकार्य समझौता नहीं होता, तो जरांगे के नेतृत्व में मुंबई मार्च या नया अनशन घोषित किया जा सकता है।

आने वाले दिनों में सरकार की ओर से होने वाली बातचीत, कुनबी प्रमाणपत्रों पर प्रशासनिक निर्णय और अंतरवाली सराटी की प्रस्तावित बैठक इस आंदोलन की अगली दिशा निर्धारित करेंगे।


साझा करें
विज्ञापन - मध्य लेख
विज्ञापन - नीचे