शुरुआती बढ़त भाजपा की, अंतिम जीत कांग्रेस के नाम
मतगणना के शुरुआती चरणों में भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहले मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहे थे। बुधवार को पहली वरीयता के मतों की गिनती के दूसरे दौर के बाद उन्हें 60,924 वोट मिले थे। उस समय अभिजीत वंजारी के पास 56,630 मत थे और दोनों के बीच 4,294 वोटों का अंतर था। निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराले को 24,249 मत मिले थे।
लेकिन किसी प्रत्याशी को निर्धारित जीत का कोटा नहीं मिलने के कारण मुकाबला वहीं समाप्त नहीं हुआ। इसके बाद वरीयता मतों के हस्तांतरण और उम्मीदवारों के क्रमिक निष्कासन की प्रक्रिया आगे बढ़ी। बाद के दौर में वंजारी ने अंतर कम किया और अंततः कोहले को पीछे छोड़ दिया। यह घटनाक्रम बताता है कि ऐसे चुनावों में शुरुआती बढ़त को अंतिम परिणाम मानना सही नहीं होता।
चालीस घंटे से अधिक चली मतगणना
नागपुर के मानकापुर स्थित विभागीय क्रीड़ा संकुल में मंगलवार, 27 अक्टूबर को सुबह आठ बजे मतगणना शुरू हुई थी। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, गिनती के लिए 84 टेबल लगाए गए थे। प्रक्रिया चालीस घंटे से अधिक चली और गुरुवार तड़के परिणाम स्पष्ट हुआ।
लोकसत्ता की रिपोर्ट के मुताबिक, निर्वाचन निर्णय अधिकारी और विभागीय आयुक्त विजयलक्ष्मी बिदरी ने वंजारी को जीत का प्रमाणपत्र प्रदान किया। लंबी मतगणना के दौरान अलग-अलग चरणों के आंकड़े सामने आते रहे, जिससे मुकाबले को लेकर उत्सुकता बनी रही। अंतिम परिणाम समझने के लिए प्रारंभिक रुझानों और पूरी हुई मतगणना के आंकड़ों में अंतर करना आवश्यक है।
वरीयता मतों ने कैसे बदली तस्वीर?
इस मुकाबले में पहली पसंद के वोटों से ही विजेता तय नहीं हुआ। लोकसत्ता के अनुसार, जीत के लिए निर्धारित शुरुआती कोटा 75,438 मतों का था। कोई उम्मीदवार यह संख्या हासिल नहीं कर पाया, इसलिए अगली वरीयताओं की गिनती आवश्यक हुई।
आसान शब्दों में, ऐसी प्रक्रिया में मतदाता की दूसरी और आगे की पसंद भी परिणाम को प्रभावित कर सकती है। नागपुर में बाद के दौर की गिनती पूरी होने पर वंजारी के कुल मत कोहले से अधिक रहे और उन्हें विजयी घोषित किया गया। इसलिए उनकी जीत को केवल पहली वरीयता के वोटों से समझना अधूरा होगा। चुनाव का निर्णायक हिस्सा बाद की गणना में सामने आया।
भाजपा के लिए नागपुर का परिणाम क्यों महत्वपूर्ण?
नागपुर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गृह नगर है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय भी यहीं स्थित है। रिपोर्टों के मुताबिक, फडणवीस और गडकरी ने भाजपा उम्मीदवार के समर्थन में व्यापक प्रचार किया था। इसके बावजूद पार्टी यह सीट वापस नहीं जीत सकी।
इस निर्वाचन क्षेत्र से गडकरी का पुराना संबंध भी परिणाम का राजनीतिक महत्व बढ़ाता है। वह जुलाई 1990 से मई 2014 तक नागपुर स्नातक सीट से विधान परिषद सदस्य रहे थे। इस पृष्ठभूमि में कांग्रेस का सीट बरकरार रखना भाजपा के लिए समीक्षा का विषय बनता है। हालांकि, यह विशिष्ट निर्वाचन क्षेत्र का परिणाम है; इसे नागपुर के प्रत्येक मतदाता की राजनीतिक राय नहीं माना जा सकता।
वंजारी ने संगठन और गठबंधन को दिया श्रेय
अभिजीत वंजारी ने जीत का श्रेय कांग्रेस, महा विकास आघाड़ी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की एकजुटता को दिया। उन्होंने दावा किया कि उनके अभियान को 48 संगठनों का समर्थन मिला था। उनके मुताबिक, समर्थक संगठनों के कार्यकर्ताओं की भूमिका इस सफलता में महत्वपूर्ण रही।
यह उनकी प्रतिक्रिया है; उपलब्ध परिणाम अपने आप यह साबित नहीं करते कि किस संगठन से कितने वोट मिले। फिर भी, उनका बयान बताता है कि कांग्रेस इस जीत को साझा अभियान और स्थानीय संपर्क की सफलता के रूप में पेश कर रही है। वंजारी ने पिछला चुनाव भी जीता था, जब उन्होंने भाजपा के संदीप जोशी को हराया था।
महाराष्ट्र के व्यापक परिणामों में क्या है संदेश?
महाराष्ट्र की पांच विधान परिषद सीटों के परिणामों में महा विकास आघाड़ी को तीन और महायुति को दो सीटें मिलीं। कांग्रेस की नागपुर जीत के अलावा शरद पवार की पार्टी ने पुणे और छत्रपति संभाजीनगर स्नातक सीटों पर सफलता हासिल की। भाजपा ने पुणे शिक्षक तथा एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने अमरावती शिक्षक सीट जीती।
राजनीतिक विश्लेषण के तौर पर नागपुर का नतीजा विपक्ष के लिए उत्साह और भाजपा के लिए संगठनात्मक समीक्षा का अवसर है। लेकिन जीत या हार का कारण केवल बड़े नेताओं का प्रचार बताना पर्याप्त नहीं होगा। उम्मीदवार की स्वीकार्यता, स्थानीय संपर्क और वरीयता मतों का वितरण समझने के लिए विस्तृत आंकड़ों की जरूरत है। फिलहाल स्पष्ट तथ्य यही है कि कांग्रेस ने अपनी सीट बचाई और भाजपा की शुरुआती बढ़त अंतिम जीत में नहीं बदल सकी।
