नई दिल्ली, 26 अगस्त 2026: भारत में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ (One Nation, One Election) को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की दिशा में प्रस्तावित कानूनों पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) विचार कर रही है। इसी बीच 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव कराने की संभावनाओं पर चर्चा ने इस मुद्दे को फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है।
ताजा बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक ओर सरकार और इस व्यवस्था के समर्थक इसे चुनावी खर्च तथा बार-बार होने वाले चुनावों से पैदा होने वाली प्रशासनिक बाधाओं को कम करने वाला सुधार बताते हैं, वहीं विपक्ष के कई नेता इसके संघीय ढांचे, राज्यों की स्वायत्तता और व्यावहारिक क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।
2029 को लेकर क्यों बढ़ी चर्चा?
हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, राजनीतिक स्तर पर यह संभावना चर्चा में है कि 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के विधानसभा चुनावों को जोड़ने की दिशा में रास्ता तलाशा जा सकता है। हालांकि इसे अंतिम या स्वीकृत योजना नहीं माना जाना चाहिए। इसके लिए राजनीतिक सहमति के साथ संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करना आवश्यक होगा।
JPC के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने भी कहा है कि यदि आवश्यक सहमति बनती है तो 2029 में एक साथ चुनाव की दिशा में आगे बढ़ने की संभावना हो सकती है। दूसरी तरफ संसदीय समिति की समीक्षा प्रक्रिया अभी जारी है और प्रस्तावित कानून अभी समिति के स्तर पर है।
इसलिए 2029 में पूरे देश में निश्चित रूप से एक साथ चुनाव होंगे, ऐसा कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी।
पी. चिदंबरम ने उठाए संवैधानिक सवाल
बहस को नई धार तब मिली जब वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। उन्होंने इसके संवैधानिक स्वरूप, संघवाद और 2029 तक इसे लागू करने की व्यावहारिकता पर सवाल उठाए हैं।
विरोध करने वाले नेताओं का मुख्य तर्क यह है कि भारत की संसदीय व्यवस्था में केंद्र और राज्यों की सरकारें अलग-अलग परिस्थितियों में अपना बहुमत खो सकती हैं। ऐसी स्थिति में सभी चुनावों का कैलेंडर एक साथ बनाए रखना जटिल हो सकता है।
इसके अलावा आलोचकों को आशंका है कि राष्ट्रीय और राज्य चुनाव एक साथ होने पर स्थानीय मुद्दे बड़े राष्ट्रीय चुनावी विमर्श के नीचे दब सकते हैं।
आखिर क्या है ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’?
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का मूल विचार लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक ही चुनावी चक्र में लाना है।
यह अवधारणा भारत के लिए पूरी तरह नई नहीं है। आजादी के बाद शुरुआती दशकों में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव काफी हद तक एक साथ आयोजित हुए थे। 1952, 1957, 1962 और 1967 के चुनाव इसी व्यवस्था के उदाहरण माने जाते हैं। बाद में कुछ विधानसभाओं और लोकसभा के समय से पहले भंग होने के कारण चुनावी चक्र अलग-अलग होता चला गया।
संसद में कहां तक पहुंचा मामला?
संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किया गया था। इसका उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने के लिए संवैधानिक व्यवस्था तैयार करना है। इसे 19 दिसंबर 2024 को संयुक्त संसदीय समिति के पास विचार के लिए भेजा गया।
समिति विभिन्न राजनीतिक दलों, राज्य सरकारों, अधिकारियों, विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों से विचार-विमर्श कर रही है। समिति को अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय भी दिया गया है।
इसका अर्थ है कि प्रस्ताव अभी कानून बनकर लागू नहीं हुआ है।
समर्थकों के प्रमुख तर्क
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के समर्थकों का कहना है कि देश में अलग-अलग समय पर चुनाव होते रहने से सरकारों, प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था पर लगातार अतिरिक्त जिम्मेदारी आती है।
उनके अनुसार एक साथ चुनाव होने से चुनाव कराने में लगने वाले संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। बार-बार लागू होने वाली चुनावी प्रक्रिया से प्रशासनिक कामकाज में होने वाले व्यवधान को भी कम किया जा सकता है।
JPC ने उद्योग जगत से भी यह आकलन करने को कहा है कि लगातार होने वाले चुनावों से कारोबार, निवेश, श्रमिक उपलब्धता और सरकारी मंजूरियों जैसी गतिविधियों पर कितना आर्थिक प्रभाव पड़ता है।
समर्थकों का एक और तर्क है कि यदि सरकारों को लगातार अगले चुनाव की तैयारी में नहीं रहना पड़े तो उन्हें नीतियों और दीर्घकालिक योजनाओं के क्रियान्वयन पर अधिक ध्यान देने का अवसर मिल सकता है।
विपक्ष और आलोचकों की सबसे बड़ी चिंताएं
विरोध का केंद्र केवल चुनावी खर्च नहीं, बल्कि संविधान और संघवाद है।
भारत में राज्यों की सरकारें अपने स्वतंत्र जनादेश के आधार पर बनती हैं। यदि किसी राज्य की विधानसभा समय से पहले भंग हो जाए या सरकार बहुमत खो दे तो उसके चुनाव को राष्ट्रीय चुनावी कैलेंडर के साथ कैसे जोड़ा जाएगा—यह सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक सवालों में से एक है।
आलोचकों का यह भी कहना है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होने से राष्ट्रीय मुद्दों का प्रभाव मतदाताओं के राज्य-स्तरीय फैसलों पर बढ़ सकता है। इसके विपरीत समर्थकों का तर्क है कि भारतीय मतदाता अलग-अलग स्तर की सरकारों और मुद्दों के बीच अंतर करने में सक्षम हैं।
इसी कारण यह बहस केवल चुनाव कब कराया जाए, इतनी सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह प्रश्न भी है कि चुनावी स्थिरता और संघीय स्वायत्तता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
2029 की राह आसान क्यों नहीं?
यदि 2029 को किसी व्यापक समन्वित चुनावी व्यवस्था का लक्ष्य बनाया जाता है, तो अलग-अलग राज्यों की मौजूदा विधानसभा अवधि सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल होगी।
किसी विधानसभा का कार्यकाल सामान्य समय से पहले समाप्त करने या अलग चुनावी चक्र को लोकसभा के साथ जोड़ने के लिए संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक स्तर पर समाधान निकालना होगा।
यही कारण है कि वर्तमान चर्चा को संभावित रोडमैप और राजनीतिक विचार-विमर्श के रूप में देखना ज्यादा उचित है, न कि 2029 के लिए तय हो चुकी चुनावी व्यवस्था के रूप में।
क्यों महत्वपूर्ण है यह बहस?
अगर ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ लागू होता है तो यह स्वतंत्र भारत की चुनावी व्यवस्था में सबसे बड़े संरचनात्मक बदलावों में से एक हो सकता है।
भारत जैसे विशाल और संघीय लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं हैं। राज्यों के अलग राजनीतिक मुद्दे, क्षेत्रीय दल, स्थानीय प्राथमिकताएं और अलग-अलग जनादेश भारतीय संघीय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
इसलिए किसी भी नई व्यवस्था की सफलता केवल इससे तय नहीं होगी कि उससे कितनी लागत बचती है। यह भी देखना होगा कि वह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, राज्यों की राजनीतिक स्वतंत्रता, जवाबदेही और मतदाताओं की पसंद को किस तरह प्रभावित करती है।
संतुलित विश्लेषण: सुधार या बड़ी संवैधानिक चुनौती?
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के पक्ष और विपक्ष दोनों के पास गंभीर तर्क हैं।
बार-बार चुनाव होने की लागत, प्रशासनिक संसाधनों का इस्तेमाल और चुनावी गतिविधियों के कारण शासन पर पड़ने वाला प्रभाव वास्तविक नीतिगत मुद्दे हैं। यदि एक साथ चुनाव इन समस्याओं को कम कर सकते हैं तो इस विकल्प पर विचार करने का आधार मौजूद है।
लेकिन भारत की संघीय संसदीय प्रणाली को केवल प्रशासनिक दक्षता के आधार पर नहीं बदला जा सकता। सरकार गिरने, विधानसभा भंग होने, मध्यावधि चुनाव और राज्यों के स्वतंत्र जनादेश जैसी परिस्थितियों के लिए स्पष्ट संवैधानिक व्यवस्था आवश्यक होगी।
इसलिए आने वाले महीनों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होगा कि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ अच्छा है या बुरा, बल्कि यह होगा कि क्या ऐसा मॉडल तैयार किया जा सकता है जो चुनावी दक्षता बढ़ाने के साथ भारत के संघीय और लोकतांत्रिक ढांचे को भी सुरक्षित रखे।
