सुप्रीम कोर्ट ने क्यों रद्द की प्रस्तावित बैठक?
‘One Nation, One Election’ पर विचार कर रही Joint Parliamentary Committee (JPC) और सुप्रीम कोर्ट के जजों के बीच प्रस्तावित मुलाकात को लेकर महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है।
सुप्रीम कोर्ट ने 6 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित उस बैठक से इनकार कर दिया, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और अन्य जजों के साथ simultaneous elections के मुद्दे पर बातचीत की योजना थी। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों के बीच प्रस्ताव पर विचार किए जाने के बाद अदालत के Secretary General के कार्यालय ने संबंधित विभाग को अपने निर्णय की जानकारी दी।
अदालत की ओर से मुख्य कारण यह बताया गया कि प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन भविष्य में सुप्रीम कोर्ट के सामने judicial review का विषय बन सकते हैं। ऐसे में उन्हीं मुद्दों पर पहले से प्रशासनिक स्तर पर चर्चा करना उपयुक्त नहीं माना गया।
6 अक्टूबर को क्या होने वाला था?
संसदीय समिति के सदस्यों के बीच पहले प्रसारित कार्यक्रम में 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की एक “Local Study Visit” का उल्लेख था।
The Indian Express के मुताबिक, एजेंडे में Chief Justice of India और अन्य सुप्रीम कोर्ट जजों के साथ simultaneous elections के मुद्दे पर “informal discussion” का भी जिक्र था। बाद में लोकसभा सचिवालय ने समिति के सदस्यों को सूचित किया कि यह दौरा रद्द कर दिया गया है।
हालांकि JPC के अध्यक्ष और भाजपा सांसद पीपी चौधरी ने कहा था कि प्रस्तावित दौरे का उद्देश्य विधेयक पर जजों से चर्चा करना नहीं, बल्कि समिति के सदस्यों को सुप्रीम कोर्ट और उसकी लाइब्रेरी से परिचित कराना था। उन्होंने कार्यक्रम टलने के पीछे सदस्यों की तारीखों और अन्य कार्यक्रमों का भी उल्लेख किया था।
इसके बाद सामने आई सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक communication ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ जजों ने प्रस्ताव पर विचार किया था और संभावित judicial review को देखते हुए बैठक को उचित नहीं माना गया।
Separation of Powers पर क्यों उठे सवाल?
प्रस्तावित बातचीत पर विपक्ष के कुछ सदस्यों ने आपत्ति जताई थी। उनकी चिंता यह थी कि संसद जिस संवैधानिक संशोधन पर अभी विचार कर रही है, उसकी वैधता को भविष्य में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने प्रस्तावित बातचीत की आलोचना करते हुए इसे separation of powers के सिद्धांत के विपरीत बताया था। उनका तर्क था कि कानून बनाना संसद का काम है, जबकि कानून की संवैधानिक वैधता पर फैसला करना न्यायपालिका का कार्य है। यह सिब्बल का कानूनी और राजनीतिक दृष्टिकोण था; सुप्रीम कोर्ट ने अपनी communication में अलग तौर पर संभावित judicial review को बैठक न करने का कारण बताया।
क्या पहले भी संसदीय समितियां जजों से मिली हैं?
संसदीय समितियों और न्यायपालिका के बीच संवाद पूरी तरह अभूतपूर्व नहीं है। विभिन्न प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था से जुड़े विषयों पर अतीत में संसदीय समितियों की sitting judges के साथ बातचीत हुई है।
मौजूदा मामले में अंतर यह है कि चर्चा का विषय एक ऐसा प्रस्तावित संवैधानिक बदलाव था जो पारित होने के बाद न्यायिक चुनौती का विषय बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने इसी संभावना को अपने निर्णय में महत्वपूर्ण माना।
One Nation, One Election के कौन से विधेयक हैं?
JPC फिलहाल दो प्रमुख विधेयकों की जांच कर रही है—Constitution (One Hundred and Twenty-Ninth Amendment) Bill, 2024 और Union Territories Laws (Amendment) Bill, 2024।
इनका उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए संवैधानिक और कानूनी ढांचा तैयार करना है। दोनों विधेयक दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किए गए थे और बाद में विस्तृत जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति को भेजे गए।
JPC की अध्यक्षता पीपी चौधरी कर रहे हैं और समिति में 39 सदस्य हैं। जुलाई 2026 में लोकसभा ने समिति को अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय भी दिया था।
पूर्व CJI से पहले ही राय ले चुकी है समिति
JPC ने simultaneous elections के संवैधानिक पहलुओं को समझने के लिए कई पूर्व मुख्य न्यायाधीशों से भी विचार लिए हैं।
इनमें पूर्व CJI जेएस खेहर, रंजन गोगोई, डीवाई चंद्रचूड़ और यूयू ललित शामिल हैं। ये सभी सेवानिवृत्त न्यायाधीश हैं, इसलिए उनके साथ परामर्श और मौजूदा सुप्रीम कोर्ट जजों के साथ प्रस्तावित बातचीत की संस्थागत स्थिति अलग है।
One Nation, One Election पर दोनों पक्षों के तर्क
Simultaneous elections के समर्थकों का तर्क है कि बार-बार होने वाले चुनावों से चुनावी खर्च बढ़ता है, Model Code of Conduct बार-बार लागू होता है और प्रशासनिक संसाधनों को लगातार चुनावी प्रक्रिया में लगाना पड़ता है। भाजपा ने इन कारणों को इस प्रस्ताव के समर्थन में प्रमुख आधारों के रूप में रखा है।
विरोध करने वाले दलों और कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों ने संघीय ढांचे, राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल, किसी सदन के समय से पहले भंग होने की स्थिति और Election Commission को मिलने वाली शक्तियों जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए हैं। ये विषय JPC की जांच और व्यापक राजनीतिक-संवैधानिक बहस का हिस्सा हैं।
यह घटनाक्रम क्यों महत्वपूर्ण है?
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय विधेयकों की संवैधानिक वैधता पर कोई फैसला नहीं है। अदालत ने यह नहीं कहा है कि ‘One Nation, One Election’ प्रस्ताव संवैधानिक या असंवैधानिक है।
मौजूदा निर्णय केवल प्रस्तावित बैठक से संबंधित है। अदालत प्रशासन का तर्क है कि जब वही संवैधानिक संशोधन भविष्य में judicial review के लिए सुप्रीम कोर्ट के सामने आ सकते हैं, तब sitting judges का पहले से इस मुद्दे पर प्रशासनिक बातचीत करना उचित नहीं होगा।
इससे संसद और न्यायपालिका की अलग-अलग संवैधानिक भूमिकाओं का सवाल फिर चर्चा में आया है। आगे JPC विधेयकों की जांच जारी रख सकती है, जबकि इन विधेयकों पर अंतिम संसदीय प्रक्रिया अलग चरण में होगी।
